बराबरी चाहिए या सिर्फ़ इज्जत ?

06 Mar 2018 #Gender Issues

क्लास 5th में थी जब पापा का ट्रांसफर गाँव में हुआ। ऐसा गाँव जिसको हम भुच्च देहात कहते हैं। जहाँ ट्रांसफर्मर उड़ने के बाद महीने भर ठीक नहीं होता था और जब हो जाता था तो पूरा गाँव लग्घी लगा कर, हीटर में खाना पका कर, फिर से उसे खराब कर देता। जब हम वहाँ पहुंचे तो सबसे बड़ी समस्या थी, मेरी पढ़ाई। परिवार को साथ रखने के ध्येय के साथ पापा मुझे कोट- टाई वाले कान्वेंट से उठा कर लाये थे। जब गाँव पहुंचे तो इकलौता ढंग का स्कुल 30 किमी दूर, और बीच में हड्डिया खड़खड़ा देने वाली लालू की सड़क। खण्डहर बनने की राह पर अग्रसर, मनहूस से दिखने वाले दो कमरे व आम के पेड़ के निचे गुलजार होते सरकारी स्कूल को छांटने के बाद एकमात्र स्कुल था,"ऑख्सफोड पब्लिक इस्कूल"। साला अपने देश में कोई जिला नहीं हैं, जहाँ एक-आध Oxford या Cambridge ना उग आया हो। नवोदय जाने से पहले बस कुछ महीने काटने थे तो हो गया एडमिशन। वहाँ अंग्रेजी में खनखनाती मैम नहीं थी पर पान चबाते सर जरूर थे। वैसे सर जो PTA के नाम पर हक से रविवार के दिन कभी भी साईकिल घुमाते हुए आपके घर आ जाते हैं। तो आये एक दिन। कुछ पॉजिटिव- कुछ निगेटिव फीडबैक दिया। फिर अगले दिन जब स्कुल पहुँची तो मुझे स्टाफ रूम में बुलाया। दो शिक्षक और बैठे थे वहाँ। गुटखा से पिलियाये दांत दिखाते हुए उस मास्टर साहब का सवाल था," तुम्हारे पापा घर पर काम करते हैं?" मैं सकपकाई, दिमाग पर जोर डाला। याद आया कि जब कल सर आये थे तो पापा उस समय कपड़े धो कर तार पर लगा रहे थे। " हाँ, म्मी की मदद करते हैं।" "सभी कामों में?मतलब कपड़े-बर्तन सब? म्मी की तबियत ठीक नहीं रहती?" "नहीं, ठीक ही रहती है।" मेरा जवाब सुन कर उन तीनों ने पहले मुझे देखा। फिर एक-दूसरे को। और फिर उनके होठ व्यंग्यात्मक मुस्कान देने की कोशिश में कुछ ऐसे सिकुड़े मानो पुरानी कब्जियत ने हिलोरे मारा हो। " काफी ज्यादा मॉडर्न परिवार हैं तुम्हारा तो।" मुझे समझ आ गया था कि मतलब कुछ और था इस वाक्य का। जब बाहर निकली तो पीछे ठहाकों की आवाज थी।पर वो आखिरी बार नहीं था जब ऐसा कुछ सुना था मैंने। पुरुषप्रधान समाज का सबसे पहला कैरेक्टर होता हैं काम का बंटवारा। एक महिला होकर आप भले ही कन्धे से कन्धा मिलाते हुए MNC में बड़े पोस्ट पर हो लेकिन घर पर बर्तन धोना आपकी जिम्मेदारी ही रहेगी। क्या लड़के काम नहीं करते घर का ? बिलकुल करते हैं। अगर वो अपनी माँ के कहने पर झाड़ू- पोंछा कर दे तो एक आदर्श बेटा होते हैं पर बीवी के रहते हुए यही काम करना उनपर "जोरू के गुलाम" का टैग लगा देता हैं। औरतों की बड़ी तादाद हैं जो इस बात की शिकायत नहीं करता कभी। कारण- उन्हें आज तक दिखा ही नहीं कि पिता भी माँ की तरह ही घर सम्भाल सकते हैं। ये थोड़ी अकल्पनीय चीज हो जाती है हमारे समाज में। जो बेचारे लड़के मदद करना चाहते हैं(out of प्यार and care) वो भी इस बात को एक्सेप्ट नहीं करते कि वो मंगलवार को बीवी साड़ी धो दिए थे भले ही बीवी बिना दिमाग लगाये रोज इनकी चड्डी धोती रहे। "बिना दिमाग लगाये" भई ये है दुनिया के सारी मुसीबत का जड़। अगर आप औरत हैं, तो यकीन मानिये आपको बहुत सारी बातें सोचने ही नहीं दी गयी हैं।आपको यह भले बता दिया जाएगा की बिल शेयर करो लेकिन ये सोचने का मौका कम दिया जाएगा की झाड़ू-पोछा और बर्तन जैसी चीजे भी शेयर होनी चाहिए। जैसा की बराबरी हमेशा जिम्मेदारी से ही आती हैं तो दो जिम्मेदारी जरूर लेने की कोशिश करें -अपनी आर्थिक जिम्मेदारी और अपने घर के पुरुषों को अघराया भैंसा बनने से बचाने की जिम्मेदारी। दोनों में से किसी एक में भी चूकेंगी तो समाज में इज्जत मिलेगी बस, बराबरी नहीं। Megha Maitrey

-By ThatMate