मैं वो हूँ ...

31 Jul 2019 #Gender Issues

मैं वही लड़की हूँ, पंजाबी बाघ के बस स्टैंड पर जिसकी सलवार का नाड़ा अचानक टूट गया था और वह भयंकर असहज हो गयी थी। वही हूँ जिसने पहली बार पीरियड्स होने पर ये बात मम्मी तक से छुपा ली थी खुद से ये कहकर कि "मैं खुद इसे सम्भाल लूँगी" पर असल कारण तो मम्मी के आगे इस बात को कुबूल न करके शायद इस बात को नकारना था कि "अब तो हर महीने यही होने वाला है"। वही हूँ जिसने अपने साथ हुए चाइल्ड एब्यूज को घरवालों से शर्मिंदगी के कारण कभी छुपा लिया था जबकि मैं बड़े लाड़ प्यार में पली थी, और बड़े भरोसेमंद माहौल में रही थी।फिर भी नही कह पायी थी। वही हूँ जो कॉलेज से गांधी स्मृति ट्रिप पर गयी थी और एक ही जगह बैठी रही सिर्फ इसलिए कि हल्के रंग के सूट पर गाढ़े रंग का लाल दाग लग गया था।

वही हूँ जो कभी वीट हेयर रिमूवल खरीदने तो दुकान पर गयी थी पर पुरुष दुकानदार को देखकर बिना लिए ही झिझक में वापस आ गयी थी एक गैर ज़रूरी हेयर क्लिप लेकर। वही हूँ जो अपने पहले प्रेमी के लिए गुलाम की तरह थी।जहाँ निर्णय का कोई भी अधिकार मेरे पास नही था। वही हूँ जो हर वक़्त इस बात को लेकर चौकन्ना रहती थी कि कहीं किसी लड़के के साथ मेरा नाम घर पर सुनने में न आ जाए। वही हूँ जिसने पहली बार पॉर्न देखने के लिए पहले अपनी सहेली को मनाया कि वह अपने बॉयफ्रेंड से अपने फोन में लेकर आए तब हम समाज से अलग किसी खोपचे में बैठकर देखेंगे और ये बात अपनी बड़ी बहन से भी महीनों बाद शेयर की कि "मैंने पॉर्न देखी"।

लेकिन अब?

अब... वो हूँ जो जीन्स की खुली ज़िप भी बड़े आराम से क्लास में खड़ी होकर बन्द कर चुकी है। वो हूँ जो भाई के साथ डेंगू के चेकअप के लिए गयी थी तो डॉ पूछ बैठा "पीरियड्स रेगुलर हैं?" और जब बड़ा भाई ये सवाल सुनकर वहां से हटने लगा तो मैंने ही हाथ पकड़कर रोक लिया था ये सोचकर कि "अपने खुद के भाई के आगे सहज नही रहूंगी तो और किसके सामने सहज रहूंगी" और फिर पीरियड्स पर ही डॉ ने कई सारे सवाल पूछे और बड़े सामान्य रूप से मेरे द्वारा उनका जवाब भी दिया गया। वो हूँ, जिससे मम्मी ने पूछा कि मूड क्यों ख़राब है तो मैं खुलकर बता पायी कि "मेट्रो में एक लड़का इरेक्ट लिंग को मुझसे टच कराने की कोशिश कर रहा था, झाड़ तो दिया उसको लेकिन झाड़ भर देने से तो मन शांत होता नही न"।वही हूँ जो चाइल्ड एब्यूज होने के बाद भी आज कुंठित नही है। वो हूँ जो अचानक शुरू हुए पीरियड की वजह से चेयर पर लग गए खून को बड़ी सहजता से बीसों लोगों की उपस्थिति में साफ़ कर के क्लास से निकली। वो हूँ जो H.C.G टेस्ट किट और कंडोम बस उन्हें देखने की जिज्ञासा वश तीन पुरुष दुकानदारों से खरीद लायी।

वो हूँ जो प्रेमी को भी हर अधिकार दे देना नगवार समझती हूँ, जहाँ मालिक मजदूर का सम्बन्ध नही बल्कि समानता का सम्बन्ध है। वो हूँ जो in a relationship का स्टेटस पब्लिकली बड़ी सहजता से डाल सकती हूँ और घर में खुलकर अपने प्रेम सम्बन्ध पर बात कर सकती हूँ। वो हूँ जो अब सेक्स पर आधारित जानकारियों वाली किताबें खुद खरीद कर ले आती हूँ और मम्मी को भी सलाह दे देती हूँ कि "खाली समय में देख लिया करो इन किताबों को"। ये क्या है? शायद इसे सहजता कहते हैं। लम्बे समय से बच्चों के द्वारा अपने लिए एक सवाल सुन रही हूँ "आपके अब तक के जीवन की उपलब्धि क्या रही है" वो ये सुनना चाहते हैं कि कब कब मैंने किस किस क्षेत्र में टॉप किया है, ताकि इससे उनको टॉप करने की प्रेरणा मिले। और मैं उनको यही बताती आयी हूँ कि मेरा बदलाव मेरी उपलब्धि है, मैंने हर दिन खुद को बदला है।मैं हर दिन पहले दिन की तुलना में कुछ सहज हुई हूँ, कुछ सामान्य हुई हूँ।

एक शब्द में कहूँ तो "सहजता" मेरी उपलब्धि है। वास्तव में मैं चाहती हूँ कि वो अपनी उपलब्धियों में किसी उच्च पद की नौकरी या टॉप करने को शामिल न करें बल्कि अपने एक शानदार व्यक्तित्व को अपनी उपलब्धि में गिनें, उनके पास "तब" और "अब" का एक स्पष्ट सकारात्मक अंतर रहे। कुछ दिनों में बारहवीं का रिजल्ट आने वाला है, उन्हें ये बात समझ आनी चाहिए कि टॉप कर लेना उनकी उपलब्धि नही या फिर कम अंक आना उनके पूरे जीवन के लिए निर्णायक नही हो सकता।

-By ThatMate