'प्रेम' की कोई सीमा नहीं।

06 Mar 2018 #LGBT

प्राकृतिक सेक्स और अप्राकृतिक सेक्स। मूलत: समस्या इस नाम से ही शुरू होती है। प्राकृतिक क्या है? एक डॉक्टर की नजर में प्राकृतिक 'सेक्स' पुरूष और नारी के मध्य ही संभव है। शरीर की संरचना, हॉर्मोन, और सेक्स से जुड़े प्राकृतिक स्नाव (सीक्रीशन) उसी हिसाब से बने हैं। हाँ! अगर 'सेक्स' की जगह 'प्रेम' डाल दें, तो ऐसी कोई सीमा नहीं। कोई भी प्रेम अप्राकृतिक नहीं कहा जा सकता। प्रेम में पुरूष, नारी, पशु-पक्षी सब आ जाएँगें। लोग अपना जीवन बस एक तोते के साथ भी गुजार लेते हैं, उससे बातें करते हैं, उसी से मोहब्बत करते हैं। और यह मैं व्यंग्य की तरह नहीं कह रहा। प्रेम और 'सेक्स' का मौलिक विभाजन आवश्यक है। अब तकनीकी संरचना पर आता हूँ। मान लें कि पुरूष-पुरूष में प्रेम हो जाए, नारी-नारी में प्रेम हो जाए, और अब वो 'सेक्स' करना चाहें तो प्राकृतिक रूप से ये कैसे संभव है? अप्राकृतिक रूप से करने से कई चिकित्सकीय समस्याएँ हैं, और जब हल है, तो ऐसा करना क्यों? इस तरह के किसी भी संबंध में 'ऐक्टिव' और 'पैसिव', दो तरह के लोग होते हैं। 'ऐक्टिव' पुरूष की भूमिका में, 'पैसिव' नारी की भूमिका में। हालांकि अदला-बदली भी संभव है, पर अमूमन मनोवैज्ञानिक रूप से नहीं होता। एक व्यक्ति आज मानसिक तौर पर पुरूष है, कल नारी बन जाए, वापस परसों पुरूष बन जाए, यह कठिन है। इसी तर्क से निर्णय आसान है। मेरे एक परिचित के मित्र नॉर्वे में 'सेक्स-चेंज' करवा कर प्रसन्न हैं। अब काफी कुछ प्राकृतिक 'सेक्स' संभव है। अब पूरी की पूरी योनि की रचना 'प्लास्टिक सर्जरी' के द्वारा की जा सकती है। हॉरमोन में बदलाव किए जा सकते हैं। यह सुलभ है। चूँकि 'सेक्स-लाइफ' मनुष्य के जीवन में कम से कम तीन-चार दशक का मामला है, आवश्यक है कि वह प्राकृतिक रूप से ही हो। पर प्रश्न यह उठ सकता है कि गर पुरूष को नारी ही बना कर प्रेम करना था, तो सीधे नारी से ही प्रेम क्यों नहीं? उत्तर बहुत ही स्पष्ट है। प्रेम शरीर से नहीं, मन से होता है। हृदय से होता है। वो डॉक्टर नहीं बदल सकते। वो 'सेक्स-चेंज' के बाद भी यथावत है। तो एक लेस्बियन युगल भले ही शारीरिक संरचना से पुरूष-नारी बन गए हों, मन से दोनों आजीवन नारी ही रहेंगें। और स्वस्थ रहेंगें। किसी भी ऐसी बीमारी से ग्रसित नहीं होंगें, जो समलैंगिक संबंध से जुड़ी है। हालांकि कई बीमारियाँ 'मल्टीपल पार्टनर' से जुड़ी हैं, पर उसके लिए समलैंगिक होना आवश्यक नहीं। इसका अर्थ समस्या प्रेम नहीं व्यभिचार है, विश्वास की कमी है। वो इन संबंधों में भी उतनी ही आवश्यक है जितनी पुरूष-नारी के संबंध में। Dr. Praveen Jha

-By ThatMate