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06 Mar 2018 #Mental health

आज एक ऐसे मनोवैज्ञानिक समस्या पर बात करूंगी जो हमारे इतने करीब है और इतना ज्यादा है कि हम इस पर ध्यान नहीं देते..ठीक वैसे ही जैसे हम सडक से गुजरते हुए हमसे रोज टकराने वाले हजारों ऐसे लोगों पर ध्यान नहीं देते जिनके लिए दो टाइम खाना भी लग्जरी हैं..हम आदि हो चुके हैं..पर जब गौर करेंगे तो विश्व के सबसे बुद्धिमान स्पेसिज द्वारा बसायी गयी ऐसी दुनिया जहाँ तीन सबसे धनी लोगों की सम्पत्ति को मिलाया जाए तो वह 48 गरीब देशों से ज्यादा है, जहाँ करीब एक अरब लोग कुपोषण के शिकार हैं और करोड़ो मोटापे के, में कुछ तो abnormal है..इसी abnormality को हम मनोविज्ञान की भाषा में Humania कह सकते है..यह समस्या आपको पश्चिमी सभ्यता की देन है ..''पाने की चाहत'' से उपजा यह एक ऐसा पागलपन है जो इन्सान की सम्वेदनाओ को मार देती है..मनोविज्ञान एक रिलेटिव विषय है इसीलिए आज इस Psychological abnormality को समझना हमारे लिए मुश्किल हैं पर हमारे पूर्वजो के लिए नहीं था.. हर इन्सान की कुछ बेसिक जरूरते होती हैं..सबसे पहली जरूरतें जिन्हें हम biological या primary needs कहतें है उसके अंतर्गत खाना- पीना और सेक्स आता है..हमारी secondary needs के अंतर्गत psychological और social needs आतें हैं..जब ये जरूरतें इन्सान पर एक हद से ज्यादा हावी होने लगे तो एक बड़ी ही विकृत मानसिकता उभर कर आती है और इस बात को हमारे देश का हर पुराना विद्वान समझता था ..अगर आप पुराने भारतीय दर्शन को उठाये तो आपको एक पैटर्न नजर आएगा.. यहाँ ''इक्षाओ या needs '' पर हावी होने पर जोर दिया गया है और प्रकृति को साथ लेकर चलने के लिए कहा गया है..इसे हम Collectivistic मनोविज्ञान कहते है..लेकिन पश्चिमी संस्कृति का मनोविज्ञान individualistic हैं जो इक्षाओ को पाकर दुनिया पर हावी होने की बात करता है..यही बेसिक अंतर है की हमारे इतिहास में ज्यादतर युद्ध खुद को बचाने के लिए करना पडा जबकि पश्चिम ने युद्ध दूसरों को गुलाम बनाने के लिए किया.. जब प्रकृति ने हर जिव की रचना इस प्रकार की कि वह अपनी बेसिक जरूरतें पूरी करने के बाद मस्त रहता है तो फिर सबसे intelligent जिव ही ऐसा क्यू निकला कि उसकी इक्षाओ का अंत ही नहीं हैं?? उसे लगने लगा कि खुश रहने के लिए पाना जरूरी हैं- हमेशा कोई नयी चीज..पश्चिम के तमाम अचीवमेंट और सक्सेस गुरु आये जिन्होंने ''9 mind-blowing tips for success'' जैसे कुछ वाहियात किताबें देकर materialistic achievement का महिमंडन कर दिया...कम से कम यह सोच भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं थी..यहाँ अचीवमेंट का मतलब खुद की बुराइयों पर विजय पाना था.. पर हमने हमारी संस्कृतिक सोच और उसके pros and cones को समझने के बजाय collectivistic मानसिकता से पीछा छुड़ाना चाहा और individualistic की ओर भागे क्यूकी उसके खोखलेपन में ग्लैमर ज्यादा था.. नतीजा यह है कि सिर्फ पाने के इस दौड़ में लोग पिछे छुटते चले जाते हैं ..आज पश्चिमी देशो की सबसे बड़ी महामारी ''अकेलेपन'' को बताया जा रहा है..अगर हमने पुराने भारती दर्शन पर लात मारी तो मनोवैज्ञानिक समस्याओं की बाढ़ आ जायेगी समाज में क्यूकी हम बेसिक इंसानी नेचर को ही चैलेंज कर देंगे जो कहती हैं ,''humans are social animal by nature.'' Megha Maitrey