Why is menstruation still a taboo?

हाँ मैं एक लड़की हूँ और मुझे पीरियड्स होते हैं!!!!

लोगो के सोचने से की ये ‘गन्दी चीज’ है मुझे फर्क नही पड़ता।
मैं इस सच को बखूबी जानती हूँ और अपने आप पर  आपकी इस गिरी सोच के कारण बिलकुल भी शर्म नही कर सकती।
वो नजरें जिनसे सो कॉल्ड समाज के लोग एक सेनेटरी नैपकिन के पैक को खरीदती लड़की को देखते है । हाँ मैं उन नजरों में नजर  डाल सीधे देखती हूँ।
मुझे नही आती शर्म इसे एक्सेप्ट करने में की हर महीने 5 दिन  इन्ही नैपकिन  के सहारे हम तुम्हारे कंधे से कन्धा मिल कर चलने का हौसला रखते हैं।

मैं मध्य प्रदेश  से हूँ।
राजधानी भोपाल में मेडिकल कॉलेज में डाक्टरी पढ़ रही हूँ और पैदायशी शहडोल की है।।
भोपाल में  सरकारी  मेडिकल कॉलेज के सरकारी हॉस्टल में रहती हूँ।
जहां कई जगहों से  आई हर  तरह  की लड़कियां हैं।
कुछ बेहद शांत ……कुछ  फटाक से आंसर करने वाली।
कई पूजा पाठ और भक्ति भाव वाली। तो कुछ बस हमेशा किताबों के बीच “नैना” बनी हुई।

पूरा एम पी का कल्चर  समेटे है मेरा हॉस्टल। होमियोपैथी  आयुर्वेद और यूनानी मेडिसिन्स की  लड़कियाँ रह रहीं हैं इस हॉस्टल में।
तकरीबन 200 लड़कियों के इस हॉस्टल में मैं 3 सालों से रह रही हूँ।
मैंने डॉक्टर्स को हमेशा बड़ी इज्जत से देखा है, सभी देखते हैअफ्टरॉल।
डॉक्टर यानी ईश्वर का रूप।
जो की साइंटिफिक के साथ स्पिरिचुअल भी है।

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मैंने  बचपन से अपने आस पास मेंसेस को लेकर एक अजीब सा माहौल देखा है। मेरी स्कुल की कुछ साथियों को उन दिनों खेलने तक नहीं जाने दिया जाता था। वो किचन नहीं जा सकती थी।
मेरी दादी एक बेहद रूढ़िवादी महिला हैं।जिन्होंने मेरी माँ और अपनी बेटियों से इन सारे टैबूज़ को हर तरीके से फॉलो करवाया है।
वैसे इस तरह न जाने कितनी दादी और नानी ने बच्चियों के बचपन को आइसोलेट किया होगा।
मैंने जब ये सोचा था की बड़े होकर डॉक्टर बनूंगी तो  सबसे पहले शायद यही ख्याल आया था की डॉक्टर बनकर ये पता करुँगी क्यों ये हर महीने आ जाते है।।
खैर
मेडिकल कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल में तकरीबन 200 लड़कियों के साथ रह रही हूँ मैं।
मेरी सारी हॉस्टल मेट्स भावी डॉक्टर हैं…
आने वाली पीढ़ी की जन्मदात्री होंगी ये (इनमे से कुछ न जाने कितने प्यारे बच्चों को डिलीवर करवाएँगी।)

ये  सभी साइंस जानती हैं, पढ़ती हैं, इंसानी शरीर को जानती हैं, फिर भी  मेंसेस के टैबू में अभी तक है।
मेडिकल कॉलेज यानि विज्ञान। तकनीक । तथ्य ।
पर सब कुछ सही तरह जानने के बाद भी अभी तक इन्हें अपने पवित्रतम चक्र पर शर्मिंदगी होती है।
अभी तक इनके भगवान ‘उन दिनों’ में छुए जाने से अपवित हो जाते है ।
इन बारे में मैंने कइयों से बात भी की…
आखिर क्यों ये शर्मिंदगी??
क्यों आप इस खूबसूरत प्रक्रिया को नहीं एक्सेप्ट करतीं??
आपका  कैसा ईश्वर है जो आपके  छुए जाने से रोकता है??

ईश्वर तो पिता सामान हैं न तो क्या आप अपने पिता से भी उन दिनों बात नहीं करती?

जवाब सिर्फ एक ही आता है “हमारे घर में मानते हैं “

मेरे घर में भी ऐसा ही माहौल था कभी ।।
पर फिर भी मेरी माँ ने इन तमाम फालतूपने को मानने से मना किया। उन्हें तो पता तक नहीं था की आखिर क्यों ये पीरियड्स होते हैं।

Nepal: Protecting Futures

यह बेहद अजीब बात है।
जिस चीज़ के लिए आप अपने घर में सारी प्रोसेस समझा, इसके पीछे का पूरा लॉजिक बता अपने बड़ों को बदल सकती थी, आपने उनका कहा मान लिया।
उन्होंने कहा उस दौरान ये मत करना वो मत करना और आपने बिना कोई सवाल किए बिना रीज़न जाने मान लिया?
एक डॉक्टर की बात कोई नहीं नेग्लेक्ट करता पर फिर भी आपने भ्रांतियां ही बनाये रखी । किसी को भी नहीं समझाया!

आपके परिवार में ये चलता  आया है क्योंकि उन्हें ये पता नहीं की ये दिन सो कॉल्ड पाप नहीं पवित्र हैं।

अगर ये  चीज़े किसी और जगह होती तो मुझे कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता  मैं कम से कम  उन्हें समझाती तो।पर मेडिकल कॉलेज की लड़कियां??
मैंने मेरे कितने इंजीनियरिंग के दोस्तों  के इस बारे में डाउट दूर किये हैं।  पर जो इसे प्रॉफेशनली पढ़ रहीं है  वो आज भी कंप्रेस्ड थिंकिंग की हैं। वे जो की पूरे शरीर का क्रिया विज्ञान जानती हैं।
कई लोगो से इस बारे में बात की तो उन्होंने क्लीयरली ये एक्सेप्ट किया की ये हर जगह है। चाहे वो उनकी  HOD हों।
चाहे वो उनके यहां की स्वीपर ।
ये मान्यताएं वही पुरानी ही मानेंगे।
ये चाँद तक जाएंगी पर अगर बीच में पीरियड्स आये तो चंद्र देवता क्षमा कह कर रॉकेट से ही कूद जाएँगी।
(वैसे स्पेस में मेंसेस को  सप्रेस किया जाता है)

मेरी एक 12 साल की भतीजी है। वो अब बड़ी हो रही है।
माँ ने उसकी सहेलियों को और  उसे समझाने के लिए मुझे कहा था। कुछ एक दो को थोडा नॉलेज था ।
फिर उनसे पूछने में उन्होंने शर्म के साथ बस बोला छी पीरियड्स।
अरे यार क्यों हम छी करना सिखा रहे हैं इन्हें।
यह जानने के बावजूद की यह सांस लेने और छोड़ने जैसी ही नेचुरल  प्रक्रिया है
क्या ये हमारी जिम्मेदारी नहीं बनती की हम उन पुरानी वर्जनाओं को तोड़े जो की फ़ालतू  हैं।

मेरे हॉस्टल में कई बार विकास को लेकर बहस छिड़ती है ।
कई बार बात ये उठती है की हमको समाज के लिए कुछ करना है।
क्या इस टैबू को तोड़ना समाज को विकसित नही करेगा?
जहाँ आप  अपने स्त्रीत्व पर  खुद पर बजाय शर्म के गर्व कर सकेंगी।

क्या ये मुमकिन है?

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