Dhat Syndrome!

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अमरीकी नाइट-क्लबों में एक ‘ग्राइंड डांस’ की परंपरा है, जिसमें अनजान पुरूष-महिला चिपक कर नृत्य करते हैं। अक्सर भारतीय यह नृत्य नहीं कर पाते, बीच में ही स्खलित हो जाते हैं।

मानें न मानें, यह संस्कृति से जुड़ी है। दिल्ली की बसों में चिपकने की चाहत हो, या छुप कर नहाते देखने की, भारतीय पुरूषों का sex-threshold काफी कम है। हल्का सा cleavage दिखना भी कामोत्तेजक है।

यह क्या हो गया है कामसूत्र के देश को? क्यूँ गोवा जाते हैं तो nude beach की खोज में निकल पड़ते हैं? क्या एक महिला को बस नग्न देखकर अाप स्खलित हो सकते हैं? और शायद इसलिए दुपट्टों का आविष्कार हुआ, या हर स्त्री परिधान की ‘नेक-लाइन’ पर खास ध्यान दिया जाने लगा।

एक खास ऊँचाई से ऊपर कपड़े बस कामोत्तेजक ही नहीं, कईयों को स्खलित भी कर सकते हैं। और इस अजीब भारतीय बीमारी का चिकित्सकीय नाम है ‘धात सिन्ड्रोम’। यह बस भारत में है, और अब हमारी संस्कृति का हिस्सा है। कोई अखबार में किसी अभिनेत्री को देखते ही स्खलित हो जाता है, कोई क्लास-रूम में, कोई मेट्रो में, कहीं भी। अौर पुरूष तो पैड भी नहीं पहनते। मसलन यह अजीब कमजोरी और डिप्रेशन लाता है। कुछ को ग्लानि होती है, और कुछ को आनंद। मिला-जुला कर दोनों स्तिथियाँ चिंताजनक हैं।

यह भारत में कैसे आया, इसके कई थ्योरी हैं। एक अवधारणा है कि 40 बूँद भोजन से एक बूँद रक्त-मज्जा बनती है, और 40 बूँद रक्त-मज्जा से एक बूँद वीर्य। यानी वीर्य की एक बूँद का पतन 1600 भोजन की बूँदों का नाश है। जो इस अवधारणा को मानते हैं, वो स्खलन के बाद कमजोरी महसूस करते हैं। यह बस मानसिक है, साफ कर दूँ, ऐसा कुछ नहीं है। कुछ लोग इस हद तक भी मानते हैं कि वीर्य के निकलने से उनका लिंग सिकुड़ता जाएगा, और एक दिन गायब हो जाएगा। इसे ‘कोरो सिन्ड्रोम’ कहते हैं जो ‘धात सिंड्रोम’ जैसा ही है।

दूसरा कारण है, भारतीय संस्कृति में यौन-शिक्षा की कमी। एक किशोर का जब वीर्य-स्खलन होता है, वो भयभीत हो जाता है। पुरूष ही नहीं, महिलाएँ भी। हालांकि अब छुप कर पढ़ लेते हैं, पर पता नहीं क्या पढ़ते हैं, कहाँ पढ़ते हैं? Biology की किताबों में कहीं साफ-साफ न लिखा है, न समझाया गया है। फिर वो छुपकर हस्त-मैथुन करते हैं, और कुछ voyeurism यानी छुप कर नग्न महिलाओं या यौन संबंध देखने की कोशिश कपते हैं। चूँकि समय-सीमा कम होती है या किसी के देख लेने का भय, सेकंडों में स्खलित होने लगते हैं। कुछ के वीर्य मूत्र के साथ भी बहने लगते हैं।

जो विवाहित हैं, उनकी भी संयुक्त परिवार में या भीड़-भाड़ वाले मकानों में रहकर यौन-संबंध की समय-सीमा कम होती है। मिनटों में स्खलन हो जाता है और पुरूष ‘डिप्रेशन’ में आ जाते हैं। यह जरूरी है कि ‘धात सिंड्रोम’ या premature ejaculation को लोग समझें और इसके लिए सलाह लें। आप इसका कारण समझ गए तो इलाज भी आपके पास ही है। कामोत्तेजकता की लिमिट इतनी कम न हो कि बस शरीर का एक नग्न हिस्सा ही स्खलित कर दे।

कहीं-न-कहीं संस्कृति का यह बिंदु ही महिलाओं के यौन शोषण का भी कारण है। हम पश्चिम को भले ही दोष दें, पर वहाँ महिलाएँ बिकनी में भी घूमें तो लोग-बाग खामख्वाह घूरते नहीं। ‘धात सिंड्रोम’ की तो खैर कल्पना भी नहीं की जा सकती। खैर, भारत में क्या संभव नहीं, यह तो योगियों का देश रहा है। कुछ नजरिया बदलना है, कुछ कन्फ्यूजन दूर करना है।

 

By – Praveen Kumar Jha.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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