sexual assault के असर से निकलने के लिए क्या करें ?

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मैं करीब चौथी-पाँचवी कक्षा में थी।हमारा परिवार बड़ा था।बड़े आँगन वाला जिसमें कई चाचा और भाई रहते है। एक शाम जब अपने रिश्तेदारों के साथ बैठ कर टीवी देख रही थी तो मेरे ऊपर मुझे एक हाथ महसूस हुआ। वह स्पर्श इतना घिनौना था कि शायद मैं उसे कभी शब्दों में समझा ही ना पाऊँ।मेरे भाई-बहन और चाची मेरे बिल्कुल आगे बैठी हुई थी और मैं सबसे पीछे।वो देख भी नहीं पाये कि मेरे साथ क्या हो रहा था और मेरे गले से आवाज निकलना तो दूर, मेरी साँस तक रुक गयी थी।उसके बाद जो दौर शुरू हुआ वह कई दिनों का था और उसकी वजह से पड़ा मानसिक असर, सालों का।

Child sex abuse का सामना मुझे इसलिए नहीं करना पड़ा क्यूकी मैं एक लड़की थी, यह लड़को के लिए भी उतनी ही बड़ी समस्या हैं। हम समाज को इनसे बचने के लिए जागरूक तो करतें हैं पर यह बताने से चूक जातें हैं कि जिंदगी को वापस पटरी पर कैसे लाया जाये? सच्चाई यह है कि ज्यादातर को मालूम भी नहीं हैं। और सही तरीके से डील नहीं करने की वजह से इसका असर ज्यादातर पीड़ितो के व्यक्तित्व पर पूरी जिंदगी रहता हैं।अगर आप आज तक इसके असर से नहीं निकले हो तो कुछ बातों पर ध्यान दें –

1. यौन शोषण का एक बहुत बड़ा असर होता हैं- अपने शरीर से नफरत करने लगना।मुझे याद हैं मैंने घण्टों नहाना शुरू कर दिया था।मेरे परिवार को लगता था कि मुझे साफ-सफाई से obsession हो गया हैं।वो मुझे इस चीज के लिए समझाते थे और कई बार डाँट भी देते थे पर उन्हें समझ नहीं आता था कि मैं अपने शरीर के साथ बहुत uncomfortable हो चुकी थी।इस घटना का मानसिक पीड़ा इतनी ज्यादा होती है कि बहुत से बच्चे इस मानसिक पीड़ा से ध्यान हटाने के लिए खुद को शारीरिक पीड़ा देना शुरू करते हैं।कई मामले मैं जानती हूँ जहाँ बच्चे अपने हाथ-पैरों पर ब्लेड चला लेते है, खुद को माचिस से दागते हैं। अगर आप अपने शरीर से नफरत करते है तो दिमाग में इस बात को बैठाने की कोशिश करें कि यह नफरत पूरी तरह illogical हैं।ना तो यह शरीर गन्दा है ना आप अपवित्र। इस शरीर को अपनाना और इस से प्यार करना आपको सिखना ही पड़ेगा। You don’t have any other option.

2. लोगों में एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि बच्चे माता-पिता को इसीलिये नहीं बताते क्यूकी हमारे समाज में सेक्स ढका- छुपा विषय है या हम खुले विचार के नहीं हैं।झूठी बात है यह।मेरी परवरिश कभी भी पारम्परिक भारतीय तरीके से हुई ही नहीं।मेरे घर में हमेशा से ऐसा माहौल रहा कि मैं इन विषयों पर खुल कर बात कर सकती हूँ और करती भी हूँ।मैं पापा से अपने पीरियड डिस्कस कर लेती थी पर यह घटना बताने में मूझे छह साल का समय लगा।यह है ही इतनी सेंसिटिव बात।अगर आप इस गिल्ट में हैं कि उस वक्त आप विरोध नहीं कर पाये या आप अपने पैरेंट्स को बता कर बच सकते थे, तो यकीन मानिये यह आपकी गलती नहीं थी।आप उस अनुभव से गुजरने के वापस खुद को खड़ा करने की कोशिश कर रहें हैं यह साबित करता है कि आप बहादुर हैं।बहुत से बच्चे झेल ही नहीं पाते और समाज को लगता है कि पढ़ाई के दबाव में या प्यार में धोका खा कर बच्चे ने जान दे दिया।उन्हें कभी नहीं पता चलता कि वह जिंदगी से इसीलिये हारा क्यूकी वह रात भर डर से सो नहीं पाता था और दिन में उसे कभी किसी ने बताया ही नहीं कि वह इस भयानक जिंदगी को बदल सकता हैं।

3.अगर मेरा यह पोस्ट कोई ऐसा बच्चा पढ़ रहा है जिसके साथ ऐसा कुछ हो रहा है तो मैं कहूँगी आपका अपराधी उतना डरावना नहीं है जितना वह खुद को दिखाता है।I know उसने आपको जान मारने से लेकर तमाम धमकी दी होगी, मुझे भी दी थी।मैं अपने पैरेंट्स से बात भी करने जाती थी तो वो गुस्से में घूरता हुआ वहाँ खड़ा होता और मैं शुरुआत के कई दिनों तक एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं कर पायी थी।पर फिर मैं चिल्लाई और विरोध किया।अगर आप चाहते हैं कि आपके साथ जो हो रहा है वो बन्द हो तो आपको चिल्लाना पड़ेगा पूरी ताकत से।सामने वाला इंसान बहुत डरपोक है और अगर आपने उसे यह जता दिया कि आप अब आर-पार की लड़ाई करेंगे, आप सबको बताएंगे, तो वह तुरन्त पीछे हटेगा। Don’t make d mistakes I did, अपने पैरेंट्स को बताये, दोस्तों को बताना शुरू करें, टीचर्स को बताये, हर उस इंसान को बताये जो आपकी थोड़ी भी मदद कर सकता हैं।मुझे मालूम है ऐसी घटनाये समाज से बच्चे का भरोसा पूरी तरह हिला देती है, पर यकीन माने- मदद मिलेगी अगर आप मदद मांगेगे।

4.पुरुष हो या स्त्री इन घटनाओं का असर सालों बाद तक रहता हैं।एक बहुत बड़ा डर होता है कि कल को हमारे पार्टनर को पता चला तो उसका रिएक्शन क्या होगा?
A.पुरुषों को बताने में डर लगता है क्यूकी कहीं ना कहीं यह बात उनकी मर्दानगी को ठेस पहुंचा रही होती हैं।कई बार इस inferiority complex की वजह से खुद को साबित करने के चक्कर में ये पुरुष और ज्यादा aggressive व्यवहार दिखाने लगते हैं।In fact यौन शोषण में बहुत से अपराधी ऐसे होते है जो बचपन में खुद भी पीड़ित रहें हैं। आपकी मर्दानगी का इस बात से कोई लेना-देना नहीं हैं।अपने यौन शोषण को कभी भी गलत तरीके से डील करने की कोशिश ना करें।
B.महिलाओं में एक बहुत बड़ा डर होता है कि उनको समाज नहीं अपनायेगा,शादी नहीं होगी, या बॉयफ्रेंड छोड़ कर भाग जायेगा।इस बात में बहुत कम सच्चाई हैं और दुःखद है कि इसका ढिंढोरा कई so-called नारीवादी कमीने ज्यादा पिटते हैं।वो ऐसा दिखायाएंगे की समाज पीड़ितो के गर्दन के पीछे ही पड़ा रहता हैं।अगर आप सिर ऊँचा करके चलना जानती है तो समाज आपको मजबूर नहीं करेगा निचे देखने के लिए।We are not in Afganistan.अपने अनुभव से साफ बता सकती हूँ गाँव हो या शहर मुझे ऐसे बहुत से लोग मिले है जो कभी मुझे मेरे अतीत की वजह से गलत नहीं मानते।
And moreover थोडा चौड़ में जीना सिखे,”जो जज करेगा, वह उस लायक भी है कि आप उससे सीधे मुहँ बात करें??रिश्ता तो दूर की बात हैं।”

5.अगर अभी भी आपको कोई मानसिक समस्या आ रही है(eg. many times victims are scared of sex or even touch) तो बेझिझक किसी मनोवैज्ञानिक से मिले।इसमें शर्म वाली कोई बात ही नहीं हैं।मदद मांगने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप abnormal हैं या कमजोर हैं।यहाँ मैं आपको सावधान कर दूँ कि जरूरी नहीं है कि आपका अनुभव अच्छा होगा।हो सकता है कि वो आपकी समस्या सुनने के बजाय आपको antidepressant और नींद की गोली थमा कर भगाने की कोशिश करें।जब मैंने एक काउंसलर से पहली बार बात किया तो उसका पहला वाक्य था,”कही ऐसा तो नहीं कि तुमने पढ़ाई से बचने के लिए अपने दिमाग में इस चीज की कल्पना की हो?” मेरे दिमाग का पहला विचार था कि अब सैंडल उतारो और इस औरत को हॉस्पिटल में घसीट कर मारना शुरू करों।खैर, हर क्षेत्र कि तरह यहाँ भी गधे भरे पड़े हैं तो हो सकता हैं कि आपको अच्छा काउंसलर ढूंढने में थोडा समय लगें लेकिन इसकी वजह से हार ना माने। A good counselor is a life changing machine for you.

6.आप अगर अपने अपराधी से क़ानूनी लड़ाई लड़ पाते हैं तो बहुत अच्छी बात हैं।आपको हजारों सलाम।
पर ज्यादातर विक्टिम नहीं लड़ पाते क्यूकी एक तो उनकी उम्र बहुत कम होती हैं या जब अपराधी करीबी हो तो परिवार कानून तक नहीं पहुंचाना चाहता।आपको जिंदगी में ऐसे कई दोगले लोग मिलेंगे जो आपको ब्लेम करेंगे कि आप अब बड़े होने के बाद FIR क्यू नहीं कर रहें? इनमें से ज्यादातर ऐसे लोग हैं जो अपने क्षेत्र के विधायक को नहीं पहचानते होंगे,आजतक एक RTI फाइल नहीं की होगी,लड़ने के बजाय घुस देकर सरकारी ऑफिस में काम निबटा आयेंगे लेकिन आपसे उम्मीद करेंगे कि आप बहादुरी दिखाएं।ऐसे हवा पहलवानों को दूर से ही हाँक दीजिये।इन्हें एक बहुत बेसिक सी बात नहीं समझ आती कि child sexual assault बहुत अलग होता हैं adult sexual assault से।अपराध एक ही तरह का है पर असर बहुत अलग।बचपन की चीजों का असर बहुत लम्बा होता है क्यूकी उस वक्त हमारा व्यक्तिव विकसित हो रहा होता हैं।हम उस चीज को भूल कर आगे निकलना चाहते है और ज्यादातर मामलों में सम्भव नहीं होता कि हम अपनी जिंदगी भविष्य या करियर से हटा कर कोर्ट-कचहरी के चक्कर में लगाये।

7. लोगों की एक समस्या होती हैं ऐसे मामलों में छाती पीट कर पीड़ितों के सामने साबित करने की कि वे दुनिया के सबसे सेंसिटिव लोग हैं।एक कड़वी सच्चाई बता देती हूँ – अगर आप इन लोगों के चक्कर में पड़े तो जिंदगी में कभी खुश नहीं रह पाएंगे।या तो आप sympathy ही लेते रह जायेंगे उम्र भर या ऐसे बन जायेंगे कि आपसे ज्यादा emotionally strong और कोई नहीं होगा। Choice is totally yours. पर दोनों में से कोई एक ही रास्ता अपना सकतें है आप।अगर दूसरे नम्बर का व्यक्तित्व चाहिए तो खुद को दया का पात्र समझना बन्द करें।आपके साथ बहुत बुरा हुआ पर दुनिया में बहुतों के साथ बहुत बुरा हुआ।Look at them and stand strong. Don’t be with the sympathizers but be with the fighters..यह बात अगर मैं अपना पूरा इतिहास बताये बिना किसी को समझाने की कोशिश करती हूँ तो कुछ बेवकूफ लोग हमेशा समझाने आते हैं,”आपको जिंदगी आसान लगती है क्यूकी आपकी किस्मत अच्छी रही हैं।”
“नहीं मुझे जिंदगी आसान लगती नहीं हैं, पर उसे आसान बनाना सीखती हूँ मैं।” कई औरतें मुझे ऐसी मिली हैं( especially on FB) जिनका साफ मानना हैं कि किसी के साथ ऐसा हुआ हैं तो उसे नकारात्मक होना ही चाहिए समाज के प्रति।ये लोग पूरी तरह लूजर एटिट्यूड वाले लोग हैं जो सिर्फ आपको जिंदगी भर रोना सिखाएंगे।अगर खुद को पीड़ित के स्टेट्स से ऊपर नहीं मानेंगे तो कभी खुल कर जी नहीं पाएंगे।जिनको अपनी तकदीर लिखना नहीं आता बस वहीं किस्मत को कोसतें है वरना बलात्कार भी ऐसी चीज कतई नहीं हैं जो जिंदगी बर्बाद कर दे।

8. आप पीड़ित हैं और एक टूटे हुए इंसान हैं तो जो बात मैं अभी कह रहीं हूँ 99.99% चांस है कि आपको गुस्सा दिलाएगा। आप मुझे गालियाँ देना चाहेंगे और शायद थप्पड़ मारना भी। आपको उस अपराधी को एक चीज देनी पड़ेगी जिंदगी में आगे बढ़ने के पहले -माफ़ी। भले ही आप उससे क़ानूनी लड़ाई लड़ते रहें और उसे सजा दिलवायें पर जिंदगी के किसी मोड़ पर जाकर उसे माफ़ करने की कोशिश करें।एक सच्चाई बताती हूँ- वह इंसान आपकी माफ़ी डिजर्व नहीं करता।वह आपके सामने खड़ा होने लायक भी नहीं हैं।पर माफ़ करना इसलिये जरूरी हैं क्यूकी अगर आप उसके लिए grudge पाल कर रहेंगे तो अतीत को कभी भुला नहीं पाएंगे।बहुत हिम्मत का काम हैं यह।जरूरी नहीं हैं कि यह काम आप आज करें। Maybe after few weeks,months or years..Take your time but ultimately let go of that person for forever..यह सिर्फ मेरा खुद का अनुभव नहीं हैं, जो लोगों इस त्रासदी के बाद भी बिना अतीत का कोई दुष्प्रभाव लिए अपनी जिंदगी ख़ुशी से जी पा रहें हैं उन्हें अपने अंदर के नफरत को मारकर एक नयी शुरुआत करनी पड़ती हैं। वरना उस इंसान ने हमें शायद एक महीने सताया हो पर उसका दुःख हम पूरी जिंदगी ढोते हैं।
Get out of the terrible past and have a beautiful future which you deserve..

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Megha Maitrey: A psychology student from Bihar.., doing my graduation..a writer in making..and a thinker!

मैत्रीचे बंध

टीक टीक टीक टीक, अलार्म वाजला, वाजतच राहिला.. बऱ्याच वेळाने मग सुदेशची पहाट उगवली. त्याने घड्याळात बघितले ९ वाजायला फक्त ९च मिनिटे शिल्लक होती, आणि आता त्यांनाही सुदेशच्या हातातून निसटून जाण्याची घाई झालेली होती. तूर्तास शक्य तेवढं लवकर उरकून घ्यावं म्हणत, तो बाथरूममध्ये शिरला, फिस्स करत गरम पाण्याचा शॉवरखाली तो आंघोळ करु लागला. ………. मग त्याने साबणाने अंग छान घासून काढले, पाण्याने धुवून काढले तर स्वच्छ अंघोळ केल्याच्या अविर्भावात कानात थोडा साबणाचा फेस तसाच राहून बाहेर आला, बाथरुमच्या. प्रचलित असे गाणे अर्जित सिंगला गायला लावून त्याने, नाचायला सुरुवात केली. हा त्याचा रोजचाच वॉकिंग डान्स होता, म्हणजे आंघोळ झाल्यानंतरची सगळी कामे ज्यामुळे माणूस स्वतःचा व्यवस्थित आणि टापटीपपणे वावरतो ती करायला सुरुवात केली, अन त्यावर तो झिंगायलाही लागला. मग नाष्टा-पाणी करुन, घरच्यांना सगळ्यांना प्रेमाचा बाय म्हणत सुदेश घराबाहेर पडला, पण तीच झिंग त्याने कायम ठेवली होती. अन त्याला बस थांब्यावर एक तरुण सुंदर मुलगी उभी दिसली. खरे-खोटे कसेही बोलता वागता, कुणी डोळ्यातही बघता बरे वाटते.. कधी डायरीत शेवटच्या पानावर लिहलेला शेर त्याला स्मरत राहिला.
गाडी तिच्यापाशी थांबवून, तुम्हाला कुठे जायचं आहे का ? मी सोडून देवू ? हा प्रश्न विचारण्याच्या आतच, ती मुलगी झपझप पाऊले टाकीत बसमध्ये चढून निघूनही गेली. इतक्या निबर मनाची होती की जाताना त्याच्याकडे वळूनदेखील बघितले नाही. हिरमुसल्या तोंडाने सुदेश त्या फरफर जाताना वाकुल्या दाखवणाऱ्या बसकडे बघत राहिला.. आजचा दिवसच घाण म्हणत कोसत असतानाच, त्याच्यावर उन्हाची तिरीप आडवी पडली, सुर्यानेही त्याला जास्तच तापून विचारले होते, तुझं नशीब फुटके त्यात, दिवसाचा काय दोष ? भिंगभिंग करत सुदेशची बाईक पुढे जावू लागली, तोच त्याला सिग्नलचा रस्ता दिसला. आयुष्यभर लाखो चुका करणारी लोक नेमक्या याच सिग्नलवर कसे काय थांबून राहतात बरे, जिथे जास्त ट्राफिकही नसतो, असा विचार करतच रोजच्या शिरस्त्याप्रमाणे चार गाड्या ओलांडून तो पुढे निघून गेला, अनन्य एखाद्या दिवसाप्रमाणे काहीच न होता, भून भून भून करत त्याच्या भरधाव गाडीचे पेट्रोल संपून ती आता फक्त गरीब साव बनून त्याच्या पुढ्यात उभी राहिली. रोज लवकरात लवकर म्हणजे ९, १० ला उठणाऱ्या सुदेशला पंपावर जावून पेट्रोल भरण्यापेक्षा संध्याकाळी त्या नेपाळी पोरांच्या गाडीवर जावून अंडा-चिकन रोल खाण्यात जास्त धन्यता वाटत असे, आणि मग तीच वाढलेली, फुगलेली चरबी ही अशा पद्धतीने कमीही होत असे.
आज मात्र दिवस वेगळा होता. त्याच्यामागून एक रानावनात राबणारा हात आला. शेतकरी असलेला एक भला माणूस, त्याच्या मागे मोटरसायकलवर आला, अन टोचण देत देत त्याला पंपापर्यंत घेवून गेला. रस्त्यावरील गर्दीत त्या भल्या माणसाने रानातल्या कळपात वासरू सोडून द्यावं अन निघून जावं तसे सुदेशला नेवून सोडलं अन चाललाबी केला, याचं मन उगाच पेट्रोलच्या रिकाम्या टाकीसारखं झालं. ‘कुणी माणूस भेटावा असे वाटते, जरा माणूसकीने ही बरे वाटते, त्याच्याच कवितेतील या ओळी नळीतून पेट्रोल टाकीत उतरत असताना त्याच्या मनात खळखळून येत राहिल्या. कार्ड स्वाईप करुन तो निघाला. निघतानाही त्या अवलिया मदतकाराचे आभार पण मानता न आल्याची रुखरुख सारखी मनात ट्रिंग ट्रिंग करत राहिली.
ओझे मनावरीचे हलकेच होत नाही, मुग्धाळ चांदण्यांचा का मोह होत नाही, असे काहीसे नवीन मनात रचत असताना, तंद्री तोडणारी शिट्टी वाजली, पण यावेळी त्याला गाडी थांबवावी लागली. पोलिसांनी त्याला कागदपत्रांची घडी दाखवायला सांगितली. मात्र याने भलतीच अट टाकली. असा काही निरागस भाव त्याला जमला, की फिल्मफेर अवार्ड जिंकणारा अभिनेता पण त्याक्षणी फिका पडला असता. थेट पाकीट उघडं करुन पैसेच नसल्याचे दाखवलं. भोळा-भाबडा कोणीतरी तरुणच पोलिसाने त्याला अडवले होते तर सोडूनही दिले.  विचारांच्या धुमश्चक्रीत गुरफटून जात त्याने ऑफिस गाठले. ऑफिसमध्येही विचार त्याचा पाठलाग सोडत नव्हते. शाळेतील जुन्या मित्रांच्या आठवणीत तो असतानाच, लंच ब्रेकमध्ये त्याच्या कलीगला भेटायला आलेल्या एक सावळ्या मुलीला धडकला, गोबरे गाल, लाल चुटूक ओठ, कोरीव भुवया, मत्स्यचक्षू असणारी तिने, जाड काड्यांचा चष्मा ठीक करुन, कुरळ्या केसांना जरा पक्के बांधून घेतले, एक बट तशीच गालावर रेंगाळत ठेवत, तिने सुदेशच्या खनखणीत कानाखाली वाजवली, सगळ्या ऑफिसचा मूडच दोघांनी रिफ्रेश करुन टाकला, जोरदार हशा पिकला.. आणि आपला हिरो मात्र हिरमुसत ऑफिसच्या बाहेर पडला, ती मुलगी त्याच्याच कलीगसोबत मजा करताना त्याच्यावर खुन्नस खावून दिसली.
संग्राम वेदनांचा अंगास झणझणीला पाठीस सुखाचा का स्पर्श होत नाही. डायरीच्या, विशेषकरुन ऑफिसच्या डायरीच्या मागच्या पानांवर कवितेच्या ओळींचा चीरखडा उतरवायला त्याला नेहमीच आवडत असे. ऑफिसमधून संध्याकाळ व्हायच्या आधीच तो बाहेर पडला. उद्दास खिन्न त्याला सगळा परिसर पार विचित्र नजरेने आपल्याकडे बघतोय असे वाटू लागले. एके ठिकाणी जत्र होती, तिथे तो शिरला. अन एकामागोमाग एक योगायोग घडायला सुरुवात झाली.
सगळ्यात आधी तो शिरला भुताटकी आरसे दाखवणाऱ्या तंबूत, तिथले आरशाला तडे जायला लागले, त्याला पाहून आरसे थरथरत बसलेले, इतका उदास, तोंडावर साडे बारा वाजलेला चेहेरा बघून अजून काय होणार होते. पण त्याला मग तिथेच ती मुलगी दिसली, जी बस थांब्यावरून त्याचे भलेमोठे वाक्य बोलण्याच्या आतच निघून गेली होती, जत्रेत आली पण पैसेच सुट्टे करुन न आणल्याने तिला जत्रेत हरवल्यासारखे वाटत होते, चेहेऱ्यावर अपार करुणा वाहायला लागणारच होती की सुदेशाची नजर तिच्याकडे गेली. आणि ओळख काढण्याची नामी संधी साधत त्याने सुट्टे पैसे देवू केले, अन त्या मुलीशी मैत्रीची नॉटही त्याने बांधली, चेहऱ्यावर थोड्डे आलेले गुलाबीपण सुदेश कसेबसे लपवत होता. तो पुढे चालायला लागला.
आपल्या कुटुंबाला घेवून आलेला त्याला तो माणूस दिसला, ज्याने त्याच्या गाडीला टोचण लावून पंपापर्यंत धाडण्यात त्याला मदत केलेली. गरीब सर्वसाधारण परिस्थितीचा तो, मुलांचे हट्ट पुरवून पुरवून मेटाकुटीला आल्यासारखा वाटत होता. सुदेशला त्याला बघून जणू आकाशाला खाली ओढून घेवून त्याच्याकडून मुठभर चांदण्या तोडून त्या माणसाच्या पदरात घालण्याचे सुचले. त्याने बघितलं की त्याचा मुलगा फारच रडतोय, धावत हा गेला, अन पुडक्यात खाऊ बांधून घेवून आला. त्या माणसाचा चेहेरा आनंदाने फुलून आला. याच्याही मनाची रुखरुख मिटली.
तिथं एक पोलिसांची चौकी उभी केली होती, जिथे सतत सुरक्षिततेच्या सूचना सांगत होते. जी लहान मुले रडताना सापडत होती, त्यांना तिथं आणण्याचे काम काही पोलीस करत होते. सुदेशने जावून तिथंही घुटमळला. त्याला दिसलं की सकाळी आपल्याला सहज सोडून देणारा हवालदार मुलाची पण तिथेच ड्युटी लागली होती. सुदेश त्याच्यापुढे जावून उभा राहिल्यावर, यानेच सकाळची आठवण करुन दिली, एक झकासशी स्माईल दिली, हात वर करुन सलाम ठोकला. दोघांनी चांगली ओळख करुन घेतली, एकमेकांची.
ए,ए, शुक शुक करत एक मुलगी सुदेशला खुणेने बोलवत होती. तेजस्वी कांती अन रात्रीतही तिच्या सावळ्या गालांवरचा ग्लो, सुदेशला आकार्षित करत होता. तो तिच्या जवळ पोहोचल्यावर मात्र तिने काहीच न बोलता, फक्त त्याला चहाचा कप दिला, तिनेही सोबत घेतला. दोघेही एकमेकांकडे बघून हसले, सुदेशवर ऑफिसमध्ये उगाचच डोकं सडकवून वागलो हे तिला जाणवलं असणार.
टीक टीक टीक टीक, अलार्म वाजला, वाजतच राहिला.. बऱ्याच वेळाने मग सुदेशची पहाट उगवली. त्याने घड्याळात बघितले ९ वाजायला फक्त ९च मिनिटे शिल्लक होती, आणि आता त्यांनाही सुदेशच्या हातातून निसटून जाण्याची घाई झालेली होती. सुदेश उठला खरा, पण पुन्हा मनशांततेच्या गर्भातून केशरी,लाल रंग उधळत एक विचार उगवून आलाच, की आजचा दिवसही कालसारखाच असेल का ? निराशेच्या गर्तेत हिरमोडाच्या वळणवाटा घेत नव्या लोकांच्या ओळखी करत, नवे मैत्रीचे बंध बांधणारा असा ? की असेन आयुष्यातील अनुभवाचा आणखीन एक चाप्टर ..

‘लिव-इन’ Relationship प्रेम का सस्ता उपाय!

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‘लिव-इन’ रिलेशन प्रेम का सस्ता-टिकाऊ उपाय है। इसमें एक तो रहने का भाड़ा शेयर हो जाता है, साथ काम करते हैं तो गाड़ी, और ‘डेट’ के खर्च भी कम हो जाते हैं। मिला-जुला के आप पति-पत्नी हैं, पर फेरे नहीं लिए। इसे वेदों में ‘गंधर्व विवाह’ की संज्ञा दी गई है। यह बस एक ‘कमिटमेंट’ है जो कभी दुष्यंत ने शकुंतला को दिया था और महाकवि कालिदास ने जोश में किताब लिख दी। पर अगर दुष्यंत भूल गए तो? उन्होनें तो एक अंगूठी दी थी। आपके पास क्या है? क्या भारत गंधर्व विवाह को विवाह मानता है? यूरोप तो मानता है।
नॉर्वे में शादी-शुदा हों या ३ साल से अधिक ‘लिव-इन’, या बच्चे हो गए हों, तो आपका अधिकार बराबर है। भारत में यह कानून पेचीदा है। पर सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस इकबाल और रॉय ऐसा फैसला दे चुके हैं। एक व्यक्ति की २० साल से अविवाहित संगिनी (कुछ ‘रखैल’ भी कहते हैं) को जायदाद में अधिकार दिया गया। मतलब संभव है। बस शर्त है कि और कोई पत्नी नहीं होनी चाहिए।
मुझे साँख्यिकी नहीं पता, पर अपने अनुभव से देखा है भारत में 3 में से 2 ‘लिव-इन’ रिलेशनशिप विवाह में बदलते हैं। बचा एक ‘लिव-इन’ जो बदल नहीं पाया, उसका क्या? कई बार ये मामला स्मूथ निपटता है, जैसे रूम-मेट बदल रहे हों। पर अक्सर झगड़े होते हैं। ‘सेक्स-विडियो’ लीक होते हैं, या कुछ भी फोटो वगैरा। लड़कियाँ भी ‘रेप-केस’ बनवाती हैं अच्छे वकील कर। मतलब ‘लिव-इन’ इतना आसान भी नहीं। एक भाड़ा बचाने के चक्कर में जिंदगी सूली पर।
प्रेम अपनी जगह है, पर ‘लिव-इन’ से पहले भारत में कुछ कागजी कारवाई होनी चाहिए। नॉर्वे में एक कॉन्ट्रैक्ट बनता है। गंधर्व-विवाह कॉंट्रैक्ट समझिए। ऐसा ही। भारत में फिलहाल कोई कानून नहीं।
अभी भारत में बस एक तरह का विवाह कॉंट्रैक्ट है। पर वेदों में कई तरह के थे। ‘ब्रह्म विवाह’ में लड़का अपनी पत्नी चुनता था। ‘प्रजापत्य विवाह’ में स्वयंवर लड़की करती थी। ‘दैव और अर्श विवाह’ आज के हिंदू विवाहों जैसा है, जब लड़की के माता-पिता विवाह कराते। ‘असुर विवाह’ में पैसे देकर विवाह होता। ‘राक्षस विवाह’ में लड़की के पिता को पीट कर। ‘पैशाच विवाह’ में लड़की को जबरदस्ती उठा कर ले जाते। ये सारे विवाह कानूनी थे। गंदर्भ विवाह भी।
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यह वैदिक दुनिया नहीं है। यह यूरोप भी नहीं है। यह भारत है। ‘लिव-इन’ रिलेशन जब तक पक्का कानून नहीं बनता, सँभल कर चलें। प्रेम का क्या है? आज है, कल नहीं है। स्थायी प्रेम तो बरसों से विवाहितों में नहीं होता। रूखेपन से कह रहा हूँ, पर ‘रूल ऑफ लैंड’ और वास्तविकता से मुँह न मोड़ें।
कहते हैं न “प्यार को प्यार ही ही रहने दो, कोई नाम न दो”
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डॉ प्रवीण झा
लेखक। ब्लॉगर। रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर
https://vamagandhi.com/

(आपल्या समाजात) आम्ही पुरुष वाढतो कसे?

 

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थोडंफार गोंडस असं वयवर्ष ढकललं की आम्ही पुरुष वयात येतो. आमच्याशी ना कोणी कुठल्या सेक्स या विषयावर बोलत, ना आम्हाला कुठली माहिती मिळत. आम्ही तसेच शरीरातले दिवसेंदिवस होणारे बदल घेवून जगत असतो. एरवी शेंबडी वाटणारी पोरगी आम्हाला आता गोड वाटू लागते. त्यात चित्रपटांचा आमच्यावर ठार प्रभाव असतोच. हिरो-हिरोइन आमच्या डोक्यात घर करून बसलेले असतात. जसजसं वय वाढतं तसतसं आमच्यात बॉलीवूड संख्या वाढायला लागते. आम्ही बाहेरून कितीही शाहरुख दाखवत असलो तरी आमच्या नसानसांत इम्रान हाश्मी धावत असतो.

जूनपर्यंत आमच्याशी काही बोलावं असं कोणालाही वाटत नाही.

यमकांची जुळवा जुळव करत आम्ही कविता करायला लागतो. अगदीच भंगार असतात त्या, तरी कसल्या सोल्लिड वाटतात त्या. शरीरातले होर्मोन्स रंग दाखवायला सुरुवात करतात. मुलीबद्दल वाटणारं आकर्षण हे दिवसेंदिवस वाढतच असतं. मुलींबद्द्लची, तिच्या शरीराबद्द्लची आमची उत्सुकता आता एवढी शिगेला पोहोचते की आम्ही जिथून मिळेल तिथून माहिती काढायला लागतो. टपरीवर बसलेल्या पानवाल्याकडून असो नाहीतर सिक्युरिटी गार्ड असो आम्ही हळूहळू मुलींचे उघडे नागडे फोटो पाहायला लागतो. Breast, Vagina.… तोपर्यंत आमच्यातलं मुल कधीच संपलेलं असतं.

पण अजूनपर्यंत आमच्याशी काहीही बोलावं असं कोणाला वाटत नाही.

घरात नुसतं किसिंग सीन असला कि लगेच आमचे पालक च्यानल चेंज करतात. त्यांच्यामते आमच्या वयाला ते योग्य नसतं. कॉलनीमध्ये असणारी प्रत्येक मुलगी ही पालककृपेमुळे आमच्यासाठी ताई झालेली असते. पण हार्मोन कृपेमुळे आता मुलींना बघताना आमच्या नजरा बदलल्या असतात. मुलींचे Curves आमचं लक्ष लगेच वेधून घेतात.

तरी अजूनपर्यंत आमच्याशी काही बोलावं असं कोणाला वाटत नाही.

दिवसेंदिवस होर्मोन्स आपला प्रखर उजेड पाडायला लागतो. मग कधीतरी रात्री Nightfall व्हायला सुरुवात होते. हेही कुणी आमच्याशी बोललेलं नसतंच. Nightfall …. श्शी. म्हणजे ? म्हणजे Wetdreams. म्हणजे ? म्हणजे चड्ड्या ओल्या. ‘आपण काहीतरी वाईट विचार केलेला आहे’, ‘आपण काहीतरी घाण स्वप्न पाहिलेलं आहे’ … त्या चिकटात झोपणं शक्य नसतंच, आम्हाला जाग येते. मग कुणालाही न कळता, मध्यरात्री उठून चड्ड्या धुवायच्या. कारण किती ही शरमेची बाब. आमच्यासाठी तोपर्यंत ते घाणच असतं. कारण लग्न होईपर्यंत अशा गोष्टी पाप तरी असतात, नाहीतर वाईट तरी … हे आमच्यावर समाजाने बिंबवलं असतंच.

अशा कितीतरी रात्री चड्ड्या ओल्या होवून आम्ही उघडतो मग Masturbation नावाचं जग. ते तेव्हाही भारीच होतं आणि आताही. हळूहळू Masturbation वाढत जातं आणि Nightfall कमी कमी होत, बंद होतं. कधीकधीतर Nightfall होवू नये म्हणून आम्ही झोपण्याआधी Masturbation करतो. हे सगळं एखादं जंगली झाड स्वत:हून वाढावं तसं आम्ही तो बदल आत्मसात करत असतो, शिकत असतो.

मग नाक्यावरती उभं राहणं सुरु होतं. हिला बघ, तिला बघ. मग मुलींना वेगवेगळी नावं पडू लागतात. कुणी चिमणी होतं, कुणी पाखरू, कुणी डॉल, तर कुणी माल. Curves नसलेली मुलगी आमच्यासाठी कॅरमबोर्ड होते. आमचे मेंदू आता वासानेनी पूर्ण नासके झालेले असतात. आता आमचा प्रवास पूर्ण चुकीच्या दिशेने सुरु होतो. आम्हाला आता पोरी पटवाव्याश्या वाटू लागतात, टुव्हीलरवर मागे पोरी फिरवाव्याश्या वाटू लागतात. कचकचून ब्रेक दाबणं हे आधीच कल्पून झालेलं असतं.

मग सुरु होते आमची सिड्यांची घेवाण देवाण. म्हणजे Porn. इथे आम्हाल सगळी माहिती मिळते.
‘अच्छा, मुल इथून येतं तर’ …. त्या पोर्नमध्ये बायका ओरडतात, ते actor जे करतात ते आम्ही खरं मानायला लागतो. “Virgin मुलगी म्हणजे सेक्स न केलेली”, हे सगळे गैरसमज मेंदू नासाडी करायला सुरुवात करतात. पुरुषी अहंकारही आम्ही जोपासलेला असतोच किंबहुना समाजाने तो गिफ्टच दिलेला असतो. हे सगळं नित्यनियमाने रोज गुपचूप चाललेलं असतं.

ते वय फार धोक्याचं असतं.
पण अजूनही आमच्याशी काही बोलावं असं कोणाला वाटत नाही.
ना आम्हाला कोणी निरोध म्हणजे काय याबद्दल माहिती सांगत, ना चित्रविचित्र रोगांबद्दल आम्हाला सांगितलं जात. सगळी माहिती आम्हाला “ते” मधुचंद्राच्या रात्री देणार असतात कि काय कुणास ठावूक.

आमच्या मनात तेव्हा काय काय येत असतं आणि आम्ही कसली स्वप्नं पाहतो याची कुणाला साधी कल्पनाही नसते. बाजूवाली असो, आंटी असो, कि कुठली कामवाली … आमचे हॉर्मोन्स अगदी गळयापर्यंत आलेले असतात. त्यांना फक्त “बाई” हवी असते. नाही म्हटलं तरी १% मेंदू गुन्हेगारीकडे वळणारच असतो. मुलीला भूल द्या, Drugs द्या, नशा करा …. कसंही करून तिचा उपभोग घ्या. हे हार्मोन्स फार वाईट असतात. ते कुणाला काहीही बनवू शकतात.

आपला समाज हा संस्कृतीच्या नावाखाली आपली प्रगती रोखतो.आपला समाज हा माणूस म्हणून मोकळेपणा देत नाही. तो शक्य होईल तेवढी बंधनं टाकतो.आपला समाज माणसाला माणूस म्हणून समजून घेत नाही.आपला समाज बुरसटलेल्या विचारातून अजूनही बाहेर येत नाही.

आमच्या समाजाला अजूनही Sex Education ची गरज वाटत नाही.आपल्याला वाटतं, हे उद्या बदलेल,
पण तोपर्यंत आपण समोरच्या पिढीलाही नासवलेलं असतं.मग ती पिढी फक्त शिकते, इंजिनिअर-डॉक्टर होते, चांगली नोकरी मिळवते, पण बुरसटलेल्या पुराण कुजलेल्या वेशी त्यांना सोडता येत नाहीत.आम्ही पुरुष वाईट नसतो, पण चांगलं घडावं म्हणून समाजाचं योगदानही शून्यच असतं.किंबहुना नकळत ते आम्हाला वाईट रस्त्यावरच येवून सोडतात.
ज्याने शोधला चांगला रस्ता, त्याला सापडला.जे त्याच्या वाटेत आलं, ते त्याने त्याच्या कुवतीप्रमाणे झेललं आणि तो वाढला.

शेवटी सिमोनला देखील पटलंच ना, “स्त्रीसारखा ‘पुरुषदेखील’ समाजच घडव असतो”

Mangesh Sapkal

http://www.mangunangu.com/

Why we are alone in the world of internet?

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The world of internet has opened up endless possibilities but at the cost of humanity and compassion. It has been found that it is easier to say things via texts which we will never dare to say face to face and it has paved the way for the mutual divide. Mankind have always been divided into religions, races, regions etc but things have gone worse now. If the divide earlier meant countries or colonies, it has now de-evolved into a chawls with dormitory beds and courtesy has become extinct in the process. Now there are bhakts, feminists, leftist, something or the otherists. Constructive debates are rarely seen and free thinking is treated like common sense.

When so many are lonely, it would be inexcusably selfish to be lonely alone.

  1. It is more about instant gratification.From fast food to 4G internet we expect everything to move at lightning speed but love is all about a slow burn, a gradual progression of feelings built on a basic foundation and nurtured over time.
  2. We are gradually turning into a selfie-obsessed, like-craving battery operated smart phone operators.
  3. It has created an unrealistic, virtual world where interaction is nothing more than likes, pokes and shares.

And the situation is worst for the divergents’ and the commons, because most people fail to understand that we can take sides with two groups at the same time. I may be a potter-head, feminist and poet all at once. I may even switch sides depending upon a particular case (unless, of course, if it was an unbreakable vow). Yes we can, but obviously we will be frowned upon by all alike and I think its fine.

के अधूरी है बात, जब तक आँखों में उनकी तस्वीर ना बने,

और बेमाने  हैं जज़्बात, गर उनका गम  मेरे दिल की पीर ना बने…

After all this I am still part of these social sites only because I can see some good in here too. “We’ve all got both light and dark inside us. What matters is the part we choose to act upon. That’s who we really are.”

This post was also published on https://doc2poet.wordpress.com/2016/12/28/divergent-aloneinworldoftechnology/

This post is written for Indispire Edition 149: In this world so connected with technology,we have actually lost our real connections.Technology has actually surpassed human-interactions.Real time Conversations became texting and Feelings became status updates.What you feel ?Share your views on it #AloneInWorldOfTechnology

जब सारे टैबू एक मेडिकल कॉलेज तक में फैले हो तब?

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हम ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ बोले गए शब्द के अक्षर उस शब्द की गंभीरता को निर्धारित किया करते हैं.जैसे आपने गर पब्लिकली ‘रेप’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया तो आपके आसपास के लोग इसे बेहद हल्के में लेंगे. इस शब्द के मायने कितने ही गंदे क्यूँ ना हों हम इस शब्द के काफी हैबीचुअल हो चुके हैं.वही दूसरी ओर अगर आपने ‘बलात्कार’ शब्द ५ लोगों के सामने भी बोल दिया तो पांचो लोग आपको टेढ़ी नजर से देखेंगे.जैसे ‘रेप’ बोलना ‘बलात्कार’ का मोर्डन फॉर्म हो गया हो.या रेप बोलने से वो कुकृत्य अपना घतियापना खो देता हो.ठीक ऐसे ही आप मेंसट्रूएशन को ले लीजिये.
आपके इस शब्द बोलने की देर होगी बस आप फिर लाइम लाइट में आ जायेंगे.ऐसे शब्द जो की कमसकम प्राक्रतिक हैं उनको बोलने में हम सकुचा जा जाते हैं जिनके मात्र उच्चारण से सारी सामाजिकता और प्रतिष्ठा खो जाती है. जाने कैसे समाज में रह रहे हैं हम.ऐसा ही एक और शब्द है.’मास्टरबेशन’इसे हम समाज में फैले एड्स के जैसे समझे तो वो इस शब्द के साथ न्यायसंगत होगा.खैर इस टैबूस के बारे समाज की बात करना “हरि अनन्त हरि कथा अनंता” सा हो जाएगा.
पर जब ये सारे टैबू एक मेडिकल कॉलेज तक में फैले हो तब?

मैं एक मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहीं हूँ..मेडिकल कॉलेज जहाँ इंसानी शरीर को पढ़ा जाता है समझा जाता है.जहाँ इंसानी शरीर से जुड़े हर एक पहलु पर बात होती है.चाहे वो MENSTRUATION हो या फिर MASTURBATION.पर बदकिस्मती से ये सिर्फ मेरी सोच में था.जितना मैं समझा करती थी की मेडिकल कॉलेज और मेडिकोस टेबूज से जुड़े हर मुद्दे में फ्री थिंकिंग वाले होते होंगे. मैंने उतना ही इन्हें नीचे सोचते देखा है.लड़कियों के जीन्स पहनने से लेकर उनके चार लोगों के सामने मास्टरबेशन बोलने तक..हाँ ये अब भी उतने ही बड़े टैबूज़ हैं जितना आम तबके के लिए हैं.

Nepal: Protecting Futures
हम अपनी हर समस्या एक डॉक्टर से खुल कर कहने के लिए कहा करते हैं. पर जब खुल कर बात करने की बात आती है तो हम पीछे आ जाते हैं.जहाँ हम उस इंसान जैसा बर्ताव करते हैं जो की बस कुछ ज्यादा न जान कर भी इन सब टैबू को फॉलो करता है.मेरे कॉलेज के एक प्रोफेसर ने मुझे बेहूदी कहा क्यूँ कहा क्यूंकि मैंने उनके सामने मास्टरबेशन जैसे गिरे हुए शब्द का इस्तेमाल कर दिया.
मेरे बैच और मेरे सीनियर बैच की आपस में कभी नहीं बन पायी. बात जो भी रही हो बस कोई केमिस्ट्री टाइप का वर्ड हम लोगों के बीच एक्सिस्ट नहीं कर पाता था..मैटर ये हुआ की एक जूनियर की पोस्ट पर सीनियर भड़क गए.
और मैंने उस चिंगारी को शांत करने की जगह हवा दे दी.’सच को एक्सेप्ट करने का साहस होना चाहिए’ इस बात को ले कर वे इतना तुनक गए की करीब 1 महीने बाद होने वाले एनुअल फंक्शन में उन्होंने ने मेरे बहिष्कार की मांग कर दी.
इससे पहले कुछ और होता उन्होंने मेरे एक फेसबुक पोस्ट से ओफेंड होने का हवाला दिया. खैर.
मैंने इस बारे में जब अपने प्रोफेसर से  बात की तो उन्होंने मुझे ऊँगली दिखाते कहा सारा कुछ रोड़ा सिर्फ इस लड़की की वजह से हो रहा है.
मैंने सीनियर्स से रिलेटेड न कोई पोस्ट डाली फिर भी सारी चीज़ें मेरे ऊपर आ गयी. क्यूंकि मैंने उन्हें बस ये कह दिया की सच स्वीकारने का साहस डालो
इसके बाद सर ने मुझसे कहा “और किस तरह की पोस्ट्स तुम फेसबुक में डाल रही हो? ये grow up और बाकी सब वो क्या है?” मैंने सर को समझाया की सर मेरी इस कॉलेज से अलग भी एक ज़िन्दगी है. मेरे पास और भी लोग हैं. मैं कुछ भी पोस्ट कर रही हूँ तो वो अपनी समझ से कर रही हूँ.
इस पर सर और भड़क गए.
कोई  पागल नहीं है.
तुम्ही बस होशियार नहीं हो.
इसके बाद जब मुझसे बरदाश्त नहीं हुआ तो मैंने बस एक लाइन कही “सर कल को मैं मास्टरबेशन में लिखूंगी तब भी ये सीनियर्स अपने ऊपर ही लेंगे क्या?”
बस सारी संस्कृति सारा अनुशासन मैंने एक सेकंड में तबाह कर दिया.बस फिर तो सर जिस तरीके से मुझे बेहूदी कहने लगे. मैं कितना गुस्सा महसूस कर रही थी वो बस मैं ही जानती हूँ.
एक डॉक्टर से इस तरह के रेस्पोंस की उम्मीद कतई नहीं थी मुझे.
बाद में जब मीटिंग हुई तब मुझे बीच में खड़ा किया गया..
मेरे पीछे मेरे बैच वाले थे और आगे सर और सीनियर्स हर तीसरी बात पर वो मुझे धमकी देते की  बताऊँ किस तरह के शब्द तुमने इस्तेमाल किये.
जी तो कर रहा था की बोल दूँ सर बता दीजिये,
पर मेरे पीछे से मेरे बैच वाले मुझे हाँथ दबा कर मना कर देते.
जिस तरीके से सीनियर्स मुझे देख रहे थे ये समझ तो आ गया था की सर ने मेरे ‘बेहूदा’ शब्द को उन्हें बता दिया है.पर फिर भी वो मुझे बार बार ब्लैकमेल करने से चूक नहीं रहे थे.
एनुअल फेस्टिवल के कारण ये सब जो प्रोग्राम हो रहा था हमारे सीनियर्स ने एक शर्त में ये सब शांती से करवाने की बात कही.
अगर मेरे बैच वाले एनुअल फेस्टिवल के दौरान मेरा बायकाट करेंगे तो. और ये बायकाट सिर्फ इसलिए क्यूंकि मैंने अव्वल उन्हें सच स्वीकारने का साहस होना चाहिए कह दिया और दूसरा की मैंने एक रेपोटेटेड मेडिकल ऑफिसर के सामने ‘मास्टरबेशन’ जैसे गिरे शब्द का इस्तेमाल कर दिया.

हम सभी डेवलपमेंट की बात किया करते हैं.. सामजिक मानसिक और ना जाने क्या क्या…. पर ये सिर्फ कागजी दिखता है. हम रूरल से भले ही अर्बन क्यूँ न हो गए हो हम अब भी उसी रूरल सोच से बिलोंग करते हैं.

बात बस इतनी सी है!!!

आस्था पठक

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Why do relationships fail? ThatMate

I am what I am!

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Why do we judge people based on the way they look and the way they dress up and the way they conduct themselves? Why do we, even after begin so educated, blindly follow beauty standards set by the media and society? Why do we always succumb to the pressure of looking beautiful just to impress someone else? There are so many whys but the answers are very few.

Let me get straight to the point. It infuriates me when a person judges another person by the way he/she looks or dresses up or talks. So imagine a person constantly bad mouthing about one person’s looks and judging them by their skin/hair color, thin/fat body etc. It has been engraved in our head since childhood that one has to be fair in order to be considered as beautiful. One has to of certain weight to be considered attractive. Who sets these standards? Who gives anyone any right to decide how one should look or be? Aren’t we all humans after all? Have we all lost common sense totally?

Body image has been closely linked to low self-esteem in adolescents and has proven that it leads to eating disorders, early sexual activity, substance use, and suicidal thoughts. This problem is only exacerbated by mainstream media. This body dissatisfaction manifests itself at an alarmingly young age. According to studies, 81% of 10-year-old girls are afraid of being fat. Depression, anxiety, and low self-esteem can significantly affect a child’s ability to succeed in school and in life. As a child grows older, low self-esteem takes a larger toll, and in young women it becomes a predictor of teen pregnancy, intimate partner violence, and dropping out of college.

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I blame this mostly on the media and our society. The daily soaps which are played 24/7 on every TV channel. There is a reason why it’s called an ‘Idiot box’. How much ever good the story might be there will always be a woman who will be judged for looking a certain way, for looking healthy and for wearing things in a certain way. To my surprise it’s usually from their  female counterparts. I have hardly seen a male/female friend of mine commenting about a male actor on television as much as they comment about a female actor.

I look back at my childhood and think, what would have happened if my grandmother/grandfather were this way? They always taught me to be nice, humble towards people. There was never a mention of color/weight/diction. I am not denying  the existence of  differentiation based on religion and caste but instead of coming out of that era our generation is going 10 steps backwards and is stooping even low.

From the day we start to read and write, we are taught that we are not good enough for this planet. It mostly starts at home, our parents, relatives, friends constantly keep reminding us that we need to do a little extra to look acceptable for the society.

“Idealized images of beautiful women are a major factor affecting young women’s personal ideas and body image; other influential factors include peers and family and the perceived preference of the opposite sex” (Casanova 2004: 289).

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The entry of Indian origin models and heroines in the Western fashion and entertainment industry is responsible in part for the huge change in body shapes. Here, it should be noted that the phenomenon for attaining a slim slender body is somewhat restricted among urban women who are heavily exposed to foreign media and lifestyle as compared to rural women who are not. Due to its vast diversity in culture and traditions, the Western Ideal of Thinness seems to have affected those parts of the country that are more advanced and westernized while backward and rural areas continue to stay the same. The choice to not eat entails a power of surplus production which only the privileged or well off class enjoy.

Thus, we see that it is in urban metropolitan cities that many slimming clubs and gyms have sprung up and the clientele consist mostly of the rich and affluent. The quest for slenderness seems to be stronger among young independent urban women. (Chingri Zimik, 2016)

I myself sometimes cannot stop someone from judging people. I feel really sad when someone sitting right in front of me passes a comment about someone’s body/looks/color and I have nothing to say. If few people can come out and sometimes speak up to such people, this world will surely be a happier and better place to live in. I truly believe that we are so much more than the beauty standards set by others. We are all tiny bits of this vast universe built with so much power and strength within us that no single person can put us down by their opinion. With so much hate around us, the least we can do is be nice and accepting towards each other. So go the extra mile, smile at a stranger, try to start a conversation with a person whom you judged before. Try to let go off any baggage you have because you were called ugly/unattractive/stupid before. The day we as a society stand up and break these shackles will be the day we attain freedom in the true sense.

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Shruti Lakkaraju