कुछ महिलाएँ ऐसी भी!

मेरे दादा जी डॉक्टर थे और उनके शुरूआती दिनों की पोस्टिंग पहाड़ी-जंगली इलाकों में हुई।एक दिन उनकी क्लीनिक में एक खून से लथ-पथ औरत आयी जिसको एक दूसरी औरत सहारा दे कर लगभग घसीटती हुई ला रही थी।वह औरत बहुत बुरी तरह घायल थी और लगभग बेहोश थी।तुरन्त इलाज शुरू हुआ।उसकी साथ वाली औरत ने बताया कि हर दिन की तरह वो लोग जंगल में अपनी जरूरत की चीजे ढूंढने गए थे और एक बाघ ने हमला कर दिया(आमतौर पर कोई भी जंगली जानवर इंसानो पर तब तक हमला नहीं करता जब तक वह खुद खतरा महसूस ना करें)।यह औरत तो पहले से जाड़न काटने पेड़ पर चढ़ी हुई थी इसीलिये बच गयी लेकिन दूसरी औरत बाघ के सामने पड़ गयी।हड़बड़ी में उसके हाथ से कुल्हाड़ी भी छूट गया लेकिन चुपचाप अपना गर्दन उसके हवाले करने के बजाय वह बाघ से भीड़ गयी।उसके आँखों पर हमला किया, बुरी तरह घायल हुई पर उस जानवर को भगा दिया और मौत को पछाड़ते हुए जिन्दा निकल आयी।अविश्वसनीय सी लगने वाली ऐसी सैकड़ो सच्ची कहानियां मिलेंगी आपको जंगली इलाको में।

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हम इंसानो की बड़ी गन्दी फितरत होती है कि हम नकारात्मक घटनाओं पर ज्यादा बात करते हैं सकारात्मक के बजाय।जैसे निर्भया के बारे में हर बच्चा जानता है लेकिन क्या उस बारह साल की बच्ची के बारे में जानता है जो अपनी माँ को चार बलात्कारियों से बचाने के लिए उन से भीड़ गयी और उन्हें भगा दिया??? हमें बहुत बड़ी गलतफहमी होती हैं कि अगर हम दिन-रात पीड़ितों के दुःख के बारे में बात करेंगे तो समाज में कुछ सुधार होगा। fb पर हर तरफ दिखने वालें छाती-पिटाऊ पोस्ट इसी सोच का नतीजा हैं।ज्यादा नकारात्मक घटनाओं पर बात करेंगे बस नकारात्मकता फैलेगी, समाज से आपका भरोसा उठेगा, और स्टैंड लेने की हिम्मत खत्म होगी। बंगलुरु या निर्भया काण्ड से मुँह मत मोड़िये लेकिन जब अगली बार आपको कोई बलात्कार की एक घटना बताये तो उसके बदले में आप उसको तीन ऐसी घटनाएं बताना जिसमें औरतें बलात्कार की कोशिश करने वाले इंसान को पटक कर मारती हैं।हिम्मत कभी भी पीड़ितों को देखकर नहीं आती बल्कि उनको देख कर आती हैं जो अपने अस्तित्व को बचाने की औकात रखते हैं। आपकी बेटी या मेरी बहन बंगलुरु वाली घटना के बारे में रिसर्च कर के खुद को यौन शोषण से नहीं बचा सकती, वह खुद को बचा लेगी अगर उसे मालुम हो उस लड़की के बारे में जिसने अपनी तरफ बढ़ने वाले हाथों की दसों उँगलियाँ काट डाली। अगर वह आदिवासी औरत नंगे हाथों से बाघ को भगा सकती है तो क्या बंगलुरु की औरतें मर्दों की पगलाई भीड़ पर चप्पल नहीं चला सकती?? औरतों के साथ बुरा इसीलिये नहीं होता क्यूकी वो कमजोर हैं, बल्कि इसीलिये होता है क्यूकी उन्हें अपनी ताकत का एहसास नहीं हैं।

अगर आपने इस पोस्ट को पढ़ा है तो मेरी रिक्वेस्ट है अब इस समाज के साथ बहादुरी के सच्चे किस्से शेयर करना शुरू कीजिये क्यूकी ऐसी घटनाये हम सभी ने अपने आस-पास देखी हैं, बस उसे ग्लोरिफाइ करने से चूक जाते हैं।आज हमें सबसे ज्यादा जरूरत है इस सकारात्मक ऊर्जा की।

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Megha Maitrey: A psychology student from Bihar.., doing my graduation..a writer in making..and a thinker!

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