आज का feminism आंदोलन

मेरी एक दोस्त है, बेहद खूबसूरत, सलीकेदार और अच्छे घर से।जब इसने कॉलेज में एंट्री ली तो क्लास के 80% लड़कों का दिल इस पर आ गया और, इसका क्लास के ही एक लड़के पर।इसकी चॉइस पर हम दोस्तों ने पड़ोस की आंटी टाइप नाक-मुँह सिकोड़ा, कभी दबी जबान में तो कभी ढीठता से इस रिश्तें का विरोध किया लेकिन फिर मामले की गम्भीरता देखते हुए आपस में एक- दूसरे को ढांढस दिया कि शायद लड़का उतना भी बेहुदा ना हो जितना हमें लगता हैं।

बहरहाल दोस्त ने अपने माता-पिता को अपने प्यार के बारे में बताया और नगाड़े के चोट पर ऐलान कर दिया की शादी करेगी तो बस इसी लड़के से।हरयाणा का ऐसा गाँव जहां इज्जत के नाम पर पहले ही दो -तीन हत्याएं हो चुकी हो , ऐसे में एक लड़की अपने घर पर ऐसा प्रस्ताव लेकर पहुंच जाए तो यह शेर की आंख में ऊँगली करने जैसा काम होता है, जिसे मूंछों पर ताव देकर चलने वाले लड़के भी दूर से प्रणाम करते हैं। उसकी हिम्मत देख कर हम सब दण्डवत हो गए।माँ-बाप ने लाड़-प्यार की वर्षा करते हुए उसके फैसले को बदलने की कोशिश की फिर जब बात नहीं बनी तो एक पूरा दौर चला जब उसकी पिटाई करने के बाद उसके पैरेंट्स हम दोस्तों के पास खुद रोते हुए फोन करते थे मदद की गुहार लिए। लेकिन फिर हार कर होने वाले दामाद को दिल ना सही, दिमागी रूप से अपना लिया। लड़के के घर वाले खुश थे।सबको मालूम था और उन्हें भी, कि यह जोड़ी कितनी बेमेल थी।

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अचानक कुछ बदलने लगा। वह लड़की जो अपने माता-पिता, रिश्तेदार और हम दोस्तों के सामने आँख तरेर कर बोल गयी थी कि उसकी जिंदगी के फैसले उसके होंगे, अब फेसबुक और इंस्टाग्राम से अपने फ़ोटो हटाने लगी। अब उसके शाट्स की जगह जीन्स और कुर्ती लेने लगे।कुछ दिनों में पता चला की भावी सास-ससुर का एक फरमान यह हैं की उन्हें काम-काजी बहूँ नहीं चाहिए।इसने “जी आंटी” कह कर सर हिला दिया। इस पूरी घटना को देखकर मुझे एक बात समझ आई,”हक के लिए लड़ना और जिद के लिए लड़ना दो अलग-अलग बातें होती हैं।” ऐसी तमाम उदाहरण हैं जिसमें लड़की माँ-बाप से लड़ जाती है और हम उसे सशक्तिकरण का रूप मान लेते हैं, लेकिन अपने पति या ससुराल वालों के बेतुके फैसले के सामने उनकी आवाज नहीं निकलती। आज पूरी दुनिया में फेमिनिज्म आंदोलन कुछ इस प्रकार के हो गए है,”फ्री द निप्पल”, “फ्री सेक्स”, “कपड़े की आजादी”, “खुल कर सिगरेट पीने की आजादी” और न जाने क्या- क्या..शायद इनका अपना एक सिम्बोलिक महत्व हो पर मुझे ऐसे ज्यादातर आंदोलन महत्वहीन लगते है। महिलाओं को बस एक चीज के लिए आंदोलन करने की जरूरत थी- equality in education and job. हालाँकि इसके लिए भी कुछ जीवट औरतें लड़ती है पर स्वाभाविक रूप से सेक्स और निप्पल जैसे शब्दों के आगे यह आंदोलन छुप जाता हैं। औरतें गाय नहीं है यह कोई किताबी बात नहीं, आपको अपने आस-पास घर-परिवार से लड़ती औरतें आराम से मिल जाएंगी।औरतें लड़ नहीं सकती, यह बात फालतू है।मुझे लगता हैं जब हम औरतें लड़ती हैं तो आस-पास के पुरुष थर्राते हैं।जमाना ही लड़ाई का है , पर सही दिशा में लड़ती औरतें शायद ही दिखेंगी।इतिहास देखे तो आदि काल में औरतें भी पुरुषों की तरह ही नंगी घुमा करती थी, शिकार करती थी और तमाम चीजों में बराबर भी थी पर धीरे-धीरे उनके सारे हक उनसे छीनते गये और इसकी मुख्य वजह थी आर्थिक आजादी पुरुषों के हाथ में जाना।

पुरुषों को कभी कपड़े और शराब के लिए आंदोलन नहीं करना पड़ा, उन्होंने बस खुद को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर किया और तमाम आजादी पर उनका हक खुद-ब-खुद कायम होता गया।गृहणी बनना या ना बनना एक औरत का अपना फैसला होना चाहिए पर खुद को उस लायक ना बना पाना कि जरूरत पड़ने पर अपना और अपने परिवार का खर्च चलाया जा सके, यह किसी भी महिला के लिए खतरनाक है।मर्दवादी सोच से टकराने का आत्मबल तब तक बिल्कुल नहीं आ सकता जबतक औरत अपनी बेसिक जरूरतों के लिए भी मर्द पर आश्रित है इसलिए तमाम आजादी के आंदोलन फिजूल हैं जब तक औरतें आर्थिक रूप से आजाद नहीं होंगी। आज हमारे देश में वो लड़कियां जो कपड़ो के लिए लड़ लेती हैं, जिन्हें पढ़ने-लिखने का मौका मिला हैं वो भी मेहनत कर के पैसे कमाने के बजाय पिता के पैसों पर एक अच्छा कमाने वाला लड़का ढूँढना ज्यादा पसंद करती हैं।बीटेक करके एक लड़का जॉब ढूंढ रहा होता है और लड़की एमटेक वाला लड़का।जब तक इस परजीवी मानसिकता से छुटकारा नहीं मिलेगा, औरतें बस इधर-उधर ही लड़ती रहेंगी क्यूकी इधर -उधर वाली लड़ाई आसान हैं।उसमें किताब खोल कर माथापच्ची नहीं करनी पड़ती, कारखाने में आठ घण्टे पसीना नहीं बहाना पड़ता और ग्लैमर भी ज्यादा हैं।

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Megha Maitrey: A psychology student from Bihar.., doing my graduation..a writer in making..and a thinker!

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