जब सारे टैबू एक मेडिकल कॉलेज तक में फैले हो तब?

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हम ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ बोले गए शब्द के अक्षर उस शब्द की गंभीरता को निर्धारित किया करते हैं.जैसे आपने गर पब्लिकली ‘रेप’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया तो आपके आसपास के लोग इसे बेहद हल्के में लेंगे. इस शब्द के मायने कितने ही गंदे क्यूँ ना हों हम इस शब्द के काफी हैबीचुअल हो चुके हैं.वही दूसरी ओर अगर आपने ‘बलात्कार’ शब्द ५ लोगों के सामने भी बोल दिया तो पांचो लोग आपको टेढ़ी नजर से देखेंगे.जैसे ‘रेप’ बोलना ‘बलात्कार’ का मोर्डन फॉर्म हो गया हो.या रेप बोलने से वो कुकृत्य अपना घतियापना खो देता हो.ठीक ऐसे ही आप मेंसट्रूएशन को ले लीजिये.
आपके इस शब्द बोलने की देर होगी बस आप फिर लाइम लाइट में आ जायेंगे.ऐसे शब्द जो की कमसकम प्राक्रतिक हैं उनको बोलने में हम सकुचा जा जाते हैं जिनके मात्र उच्चारण से सारी सामाजिकता और प्रतिष्ठा खो जाती है. जाने कैसे समाज में रह रहे हैं हम.ऐसा ही एक और शब्द है.’मास्टरबेशन’इसे हम समाज में फैले एड्स के जैसे समझे तो वो इस शब्द के साथ न्यायसंगत होगा.खैर इस टैबूस के बारे समाज की बात करना “हरि अनन्त हरि कथा अनंता” सा हो जाएगा.
पर जब ये सारे टैबू एक मेडिकल कॉलेज तक में फैले हो तब?

मैं एक मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहीं हूँ..मेडिकल कॉलेज जहाँ इंसानी शरीर को पढ़ा जाता है समझा जाता है.जहाँ इंसानी शरीर से जुड़े हर एक पहलु पर बात होती है.चाहे वो MENSTRUATION हो या फिर MASTURBATION.पर बदकिस्मती से ये सिर्फ मेरी सोच में था.जितना मैं समझा करती थी की मेडिकल कॉलेज और मेडिकोस टेबूज से जुड़े हर मुद्दे में फ्री थिंकिंग वाले होते होंगे. मैंने उतना ही इन्हें नीचे सोचते देखा है.लड़कियों के जीन्स पहनने से लेकर उनके चार लोगों के सामने मास्टरबेशन बोलने तक..हाँ ये अब भी उतने ही बड़े टैबूज़ हैं जितना आम तबके के लिए हैं.

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हम अपनी हर समस्या एक डॉक्टर से खुल कर कहने के लिए कहा करते हैं. पर जब खुल कर बात करने की बात आती है तो हम पीछे आ जाते हैं.जहाँ हम उस इंसान जैसा बर्ताव करते हैं जो की बस कुछ ज्यादा न जान कर भी इन सब टैबू को फॉलो करता है.मेरे कॉलेज के एक प्रोफेसर ने मुझे बेहूदी कहा क्यूँ कहा क्यूंकि मैंने उनके सामने मास्टरबेशन जैसे गिरे हुए शब्द का इस्तेमाल कर दिया.
मेरे बैच और मेरे सीनियर बैच की आपस में कभी नहीं बन पायी. बात जो भी रही हो बस कोई केमिस्ट्री टाइप का वर्ड हम लोगों के बीच एक्सिस्ट नहीं कर पाता था..मैटर ये हुआ की एक जूनियर की पोस्ट पर सीनियर भड़क गए.
और मैंने उस चिंगारी को शांत करने की जगह हवा दे दी.’सच को एक्सेप्ट करने का साहस होना चाहिए’ इस बात को ले कर वे इतना तुनक गए की करीब 1 महीने बाद होने वाले एनुअल फंक्शन में उन्होंने ने मेरे बहिष्कार की मांग कर दी.
इससे पहले कुछ और होता उन्होंने मेरे एक फेसबुक पोस्ट से ओफेंड होने का हवाला दिया. खैर.
मैंने इस बारे में जब अपने प्रोफेसर से  बात की तो उन्होंने मुझे ऊँगली दिखाते कहा सारा कुछ रोड़ा सिर्फ इस लड़की की वजह से हो रहा है.
मैंने सीनियर्स से रिलेटेड न कोई पोस्ट डाली फिर भी सारी चीज़ें मेरे ऊपर आ गयी. क्यूंकि मैंने उन्हें बस ये कह दिया की सच स्वीकारने का साहस डालो
इसके बाद सर ने मुझसे कहा “और किस तरह की पोस्ट्स तुम फेसबुक में डाल रही हो? ये grow up और बाकी सब वो क्या है?” मैंने सर को समझाया की सर मेरी इस कॉलेज से अलग भी एक ज़िन्दगी है. मेरे पास और भी लोग हैं. मैं कुछ भी पोस्ट कर रही हूँ तो वो अपनी समझ से कर रही हूँ.
इस पर सर और भड़क गए.
कोई  पागल नहीं है.
तुम्ही बस होशियार नहीं हो.
इसके बाद जब मुझसे बरदाश्त नहीं हुआ तो मैंने बस एक लाइन कही “सर कल को मैं मास्टरबेशन में लिखूंगी तब भी ये सीनियर्स अपने ऊपर ही लेंगे क्या?”
बस सारी संस्कृति सारा अनुशासन मैंने एक सेकंड में तबाह कर दिया.बस फिर तो सर जिस तरीके से मुझे बेहूदी कहने लगे. मैं कितना गुस्सा महसूस कर रही थी वो बस मैं ही जानती हूँ.
एक डॉक्टर से इस तरह के रेस्पोंस की उम्मीद कतई नहीं थी मुझे.
बाद में जब मीटिंग हुई तब मुझे बीच में खड़ा किया गया..
मेरे पीछे मेरे बैच वाले थे और आगे सर और सीनियर्स हर तीसरी बात पर वो मुझे धमकी देते की  बताऊँ किस तरह के शब्द तुमने इस्तेमाल किये.
जी तो कर रहा था की बोल दूँ सर बता दीजिये,
पर मेरे पीछे से मेरे बैच वाले मुझे हाँथ दबा कर मना कर देते.
जिस तरीके से सीनियर्स मुझे देख रहे थे ये समझ तो आ गया था की सर ने मेरे ‘बेहूदा’ शब्द को उन्हें बता दिया है.पर फिर भी वो मुझे बार बार ब्लैकमेल करने से चूक नहीं रहे थे.
एनुअल फेस्टिवल के कारण ये सब जो प्रोग्राम हो रहा था हमारे सीनियर्स ने एक शर्त में ये सब शांती से करवाने की बात कही.
अगर मेरे बैच वाले एनुअल फेस्टिवल के दौरान मेरा बायकाट करेंगे तो. और ये बायकाट सिर्फ इसलिए क्यूंकि मैंने अव्वल उन्हें सच स्वीकारने का साहस होना चाहिए कह दिया और दूसरा की मैंने एक रेपोटेटेड मेडिकल ऑफिसर के सामने ‘मास्टरबेशन’ जैसे गिरे शब्द का इस्तेमाल कर दिया.

हम सभी डेवलपमेंट की बात किया करते हैं.. सामजिक मानसिक और ना जाने क्या क्या…. पर ये सिर्फ कागजी दिखता है. हम रूरल से भले ही अर्बन क्यूँ न हो गए हो हम अब भी उसी रूरल सोच से बिलोंग करते हैं.

बात बस इतनी सी है!!!

आस्था पठक

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