‘लिव-इन’ Relationship प्रेम का सस्ता उपाय!

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‘लिव-इन’ रिलेशन प्रेम का सस्ता-टिकाऊ उपाय है। इसमें एक तो रहने का भाड़ा शेयर हो जाता है, साथ काम करते हैं तो गाड़ी, और ‘डेट’ के खर्च भी कम हो जाते हैं। मिला-जुला के आप पति-पत्नी हैं, पर फेरे नहीं लिए। इसे वेदों में ‘गंधर्व विवाह’ की संज्ञा दी गई है। यह बस एक ‘कमिटमेंट’ है जो कभी दुष्यंत ने शकुंतला को दिया था और महाकवि कालिदास ने जोश में किताब लिख दी। पर अगर दुष्यंत भूल गए तो? उन्होनें तो एक अंगूठी दी थी। आपके पास क्या है? क्या भारत गंधर्व विवाह को विवाह मानता है? यूरोप तो मानता है।
नॉर्वे में शादी-शुदा हों या ३ साल से अधिक ‘लिव-इन’, या बच्चे हो गए हों, तो आपका अधिकार बराबर है। भारत में यह कानून पेचीदा है। पर सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस इकबाल और रॉय ऐसा फैसला दे चुके हैं। एक व्यक्ति की २० साल से अविवाहित संगिनी (कुछ ‘रखैल’ भी कहते हैं) को जायदाद में अधिकार दिया गया। मतलब संभव है। बस शर्त है कि और कोई पत्नी नहीं होनी चाहिए।
मुझे साँख्यिकी नहीं पता, पर अपने अनुभव से देखा है भारत में 3 में से 2 ‘लिव-इन’ रिलेशनशिप विवाह में बदलते हैं। बचा एक ‘लिव-इन’ जो बदल नहीं पाया, उसका क्या? कई बार ये मामला स्मूथ निपटता है, जैसे रूम-मेट बदल रहे हों। पर अक्सर झगड़े होते हैं। ‘सेक्स-विडियो’ लीक होते हैं, या कुछ भी फोटो वगैरा। लड़कियाँ भी ‘रेप-केस’ बनवाती हैं अच्छे वकील कर। मतलब ‘लिव-इन’ इतना आसान भी नहीं। एक भाड़ा बचाने के चक्कर में जिंदगी सूली पर।
प्रेम अपनी जगह है, पर ‘लिव-इन’ से पहले भारत में कुछ कागजी कारवाई होनी चाहिए। नॉर्वे में एक कॉन्ट्रैक्ट बनता है। गंधर्व-विवाह कॉंट्रैक्ट समझिए। ऐसा ही। भारत में फिलहाल कोई कानून नहीं।
अभी भारत में बस एक तरह का विवाह कॉंट्रैक्ट है। पर वेदों में कई तरह के थे। ‘ब्रह्म विवाह’ में लड़का अपनी पत्नी चुनता था। ‘प्रजापत्य विवाह’ में स्वयंवर लड़की करती थी। ‘दैव और अर्श विवाह’ आज के हिंदू विवाहों जैसा है, जब लड़की के माता-पिता विवाह कराते। ‘असुर विवाह’ में पैसे देकर विवाह होता। ‘राक्षस विवाह’ में लड़की के पिता को पीट कर। ‘पैशाच विवाह’ में लड़की को जबरदस्ती उठा कर ले जाते। ये सारे विवाह कानूनी थे। गंदर्भ विवाह भी।
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यह वैदिक दुनिया नहीं है। यह यूरोप भी नहीं है। यह भारत है। ‘लिव-इन’ रिलेशन जब तक पक्का कानून नहीं बनता, सँभल कर चलें। प्रेम का क्या है? आज है, कल नहीं है। स्थायी प्रेम तो बरसों से विवाहितों में नहीं होता। रूखेपन से कह रहा हूँ, पर ‘रूल ऑफ लैंड’ और वास्तविकता से मुँह न मोड़ें।
कहते हैं न “प्यार को प्यार ही ही रहने दो, कोई नाम न दो”
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डॉ प्रवीण झा
लेखक। ब्लॉगर। रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर
https://vamagandhi.com/

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