Monthly Archives: February 2017

सांवलेपन के भी मुआवजे?

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अब वो दिन फिर गए कि परिवार का कोई भी सदस्य आकर ‘सीधा’ ये कहे “चेहरे पर थोड़ा ध्यान दिया करो, जाओ थोड़ा फेशियल ब्लीच ही करवा आओ कि रंगत साफ़ हो जाये।” इसका ये आशय बिलकुल नही है कि रंगत साफ़ हो गयी है या मैं “गोरों” की तरह गोरी हो गयी हूँ। इसका अभिप्राय यह है कि उम्र के अनुसार निंदा करने के तरीकों में परिवर्तन लाना पड़ता है। अब चेहरे से जुड़ी उपरोक्त बातों को ही “तुम्हारे भले के लिए” वाली चाशनी में लपेट कर कहा जाता है, क्योंकि अब बड़ी हो गयी हूँ और ये समझने लगी हूँ कि तमाम योग्यताओं में गोरी रंगत होना भी समाज में एक योग्यता/उपलब्धि ही समझी जाती है अथवा सांवलेपन को हीनता से जोड़ दिया जाता है। ——– 2014 में यूपी गयी तो चाचा जी से बात हो रही थी वो कह रहे थे “i.a.s की तैयारी शुरू करो, मेहनत करो, आपको नही पता कि बड़ी नौकरी के बिना शादी के लिए अच्छा लड़का ढूंढने में कितनी दिक्कतें आती हैं, बिट्टू (बहन) को देखो अच्छी खासी गोरी सुंदर है लेकिन भैया (मेरे पिताजी) को उसके लिए मन का लड़का नही मिल रहा है।

” अच्छा! लम्बे समय बाद “अच्छे” लड़के का तात्पर्य समझ आया। उसका अर्थ ये था कि सांवली लड़की से विवाह हेतु बिना किसी विशेष अभियाचना (डिमांड) पर तैयार होने वाला लड़का। यहाँ इस बात पर मेरा विशेष ध्यान गया कि विवाह के मुद्दे पर कम गोरी अथवा सांवली लड़कियों के लिए बड़ी नौकरी को किसी क्षतिपूर्ति की तरह प्रयोग करने पर बल या छोटी तनख्वाह वाली या नौकरी न होने की स्थिति में दहेज को सांवली होने के मुआवजे के तौर पर देखना और सबसे निम्नस्तरीय बात ये निकलकर आती है कि यदि आप गोरी हैं बेहद खूबसूरत हैं तो आपको विभिन्न क्षेत्रों में सरलता से कामयाबी पाने के लिए “चेहरे/रूप” का इस्तेमाल करना सिखाया जा रहा है। ये गोरी रंगत से सम्बंधित वही सब निरर्थक बातें हैं जो पुरुषों ने आपको मानसिक तौर पर कैद कर आपका आत्मविश्वास तोड़ने के लिए बनाई हैं क्योंकि मैंने कभी नही सुना कि किसी सांवले लड़के की शादी के लिए भी उसके अभिभावकों को इतनी ही चिंता हो।ये कुछ और नही बल्कि रूढ़िवादी मानक हैं, ऐसे मानक जो सिर्फ औरतों को शरीर समझते हैं। आज़ाद होने की बात बस घरों से बाहर निकलने तक सीमित नही है बल्कि आज़ादी का सम्बन्ध आपको मानसिक रूप से कैद करने वाली पुरातन पुरुषवादी सोच से बाहर निकालने से भी जुड़ी हुई है।इन्हें तोड़िये इनसे बाहर निकलिए, चाशनी में लिपटी बातों को पहचानिये और देखिये कि कौन है वो जो आपको कैद करना चाहता है, अपनी फेवरिट बनिए, खुद से प्यार कीजिये और स्वयं को एक अविभाज्य इकाई समझकर स्वीकार कीजिये। और ये समझिये कि स्वाभाविकता के लिए किसी मुआवजे की ज़रूरत नही होती…..।

देखिये कि छला कैसे जाता है! बिलकुल ऐसे जैसे आरम्भ से अंत तक रंगभेद कि इस लड़ाई में मैं आपको छल रही हूँ और आप समझ नही पा रहे हैं…. सबसे पहले सांवले शब्द की उत्पत्ति पर बात करें तो यह मूल रूप से “श्यामल” का ही तद्भव रूप है जो काले के भाव को ही प्रेषित करता है।समाज में भी दो ही वर्ण प्रचलित हैं काला और गोरा। लेकिन जब हम “सांवला” शब्द का प्रयोग करते हैं तो ये एक भ्रामक अवस्था में होता है।भ्रामक ऐसे कि इसे हम काले की अपेक्षा थोड़ा “सु-वर्ण” मानते हैं यानी गोरेपन के थोड़ा नज़दीक। तो क्या ये सांवला शब्द “काले” वर्ण से उचित दूरी और गोरेपन से नज़दीकी को नही दर्शाता? बिलकुल दर्शाता है। ये काले रंग के प्रति घृणा/दूरी का ही तो भाव है। जो आपको “तुष्टिकरणवादी” बनाता है, जो आपको सहानुभूति संग सुविधाभोगी बनाता है। तो रंगभेद की लड़ाई में सबसे पहले हमे आवश्यकता है उन परिवर्तनकारी लोगों की छंटनी करना जो “सांवले” वर्ण का झंडा लेकर तुष्टिकरण का नेतृत्व कर रहे हैं या जो रंगभेद की असल भेदभाव वाली लड़ाई काले-गोरे में वास्तविक स्थिति का नेतृत्व कर रहे हैं। हमे आवश्यकता है चाशनियों/भ्रमों की पहचान कर उनसे बचने की।

-मेदिनी पाण्डेय

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What is clitoris?

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स्त्रियांमध्ये  क्लिटोरिस हा एक निव्वळ लैंगिक अवयव आहे. मायांगातील विविध भागांचा मिळून हा अवयव बनलेला आहे. संपूर्ण योनीमध्ये हा अवयव सामावलेला आहे. असा काही अवयव स्त्रीच्या शरीरात असतो हेच अनेकांना माहित नसतं. मात्र शरीरशास्त्राच्या पुस्तकांमध्येही बहुतेक वेळा तो दाखवलेला नसतो आणि दाखवला असेलच तर एक छोटासा उंचवटा म्हणून दाखवलेला असतो. ग्रामीण भागात याला दाणा, टिटनी किंवा बटण म्हणलं जातं. पण या सगळ्याचा अर्थ संवेदनशील टोक इतकाच आहे. प्रत्यक्षात मात्र क्लिटोरिस संपूर्ण मायांगामध्ये पसरलेलं आहे.

जगातील पहिले शरीरशास्रानुसार अधिक योग्य, प्रिंट करता येईल असे 3D क्लिटॉरिस वरील चित्रामध्ये दिले आहे. फ्रेंचमधील प्राथमिक आणि माध्यमिक शाळांमध्ये लैंगिक शिक्षण देण्यासाठी वापरले जाणार आहे. या क्लिटोरिस प्रतिकृतीचा वापर करून मुलांना शाळेमध्ये शिकवले जाईल की, पुरुषाचे लिंग ज्या पेशींपासून बनलेले असते त्याच पेशींपासून क्लिटोरिस बनलेले असते. फरक इतकाच आहे की, महिलांच्या या पेशी शरीराच्या आत असतात आणि बऱ्याचदा त्या पुरुषांपेक्षा लांब म्हणजेच जवळजवळ ८ इंच असतात.

लैंगिक सुखाचा विचार करता स्त्रीमध्ये योनीमार्गापेक्षा क्लिटोरिस खूप महत्वाची भूमिका बजावते.   स्त्रियांनादेखील पुरुषांसारखी ताठरता येणारी, उद्दीपित होणारी (erectile system) रचना असते. लैंगिक सुख ही काही जादू नाही की, ते फक्त स्त्रीला फक्त पुरुषांकडूनच मिळू शकते.

हळुवार दाबलं, चोळलं, स्पर्श केला किंवा सायकल चालवण्यासारख्या कृतीमध्ये क्लिटोरिस उद्दीपित होऊ शकतं. लैंगिक संभोगामध्येही ते उद्दीपित होऊ शकतं. असं झाल्यावर लैंगिक संवेदना सर्वोच्च बिंदू गाठतात आणि ऑरगॅझमचा अनुभव येतो. उद्दीपनाला प्रतिसाद म्हणून क्लिटोरिस फुलतं, आकुंचन पावतं आणि शिथिल होतं. लैंगिक सुख देणं हेच याचं एकमेव कार्य आहे. प्रजननामध्ये त्याची कोणतीही स्पष्ट किंवा प्रत्यक्ष भूमिका नसते.

योनीमध्ये लघवीच्या जागेच्या वर एक फुगीर भाग हाताला लागेल. त्याला स्पर्श करून पहा. काय संवेदना जाणवतात? लैंगिक संवेदना निर्माण होतात का? लैंगिक भावना निर्माण झाल्यावर क्लिटोरिसला स्पर्श करून लैंगिक सुखाचा अनुभव घेता येतो. स्त्रिया किंवा मुली हस्तमैथुन करताना क्लिटोरिसला स्पर्श करून सुख मिळवू शकतात.

संदर्भ:  https://www.theguardian.com/education/2016/aug/15/french-schools-3d-model-clitoris-sex-education

क्लिटोरिस नेमकं असतं कसं ?

Love at the time of Mental Health Condition!

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When living with a mental health condition, people often wonder about the aspect of normalcy in their lives – whether it is about day to day functioning, social interactions and most importantly romantic relationships. If you are involved in a relationship and suffer from a mental health condition, you may have often wondered if you should tell your partner about the disorder; if you are single, you must have wondered if being in a relationship is a good idea.

While these questions are bound to arise, it is also important to understand that living with a mental health condition does not stop you from having a healthy, romantic relationship. Many people with even serious mental health conditions are one half of a strong, supportive and committed relationship. Mental health illnesses are very common, and this should not stop you from engaging in nurturing and fulfilling romantic relationship. In fact, it can be an enriching experience that eases your troubles when you have someone to share your life with.

Can I Start A New Relationship Now?

Having a mental health disorder can make getting into a relationship difficult, not because of the perception about the condition, but the social interaction involved. In order to date someone new, you first need to socialize, interact and meet new kinds of people. But in many cases, a person with a mental health condition does not feel up to the task of connecting with someone when their own emotional and mental health is in a state of flux. Mood swings, behavioural changes, desire to withdraw, bouts of anxiety, inability to express empathy are a few feelings that accompany a mental health disorder which may make it tough for someone to accept a new relationship. However, this does not mean that you can’t try.

An important aspect of getting involved in a new relationship is to stay on track with your treatment. It is very easy to get swept up in the whirlwind of a new romance and lose sight of what is important and necessary. Also it is crucial to think about the qualities you would look for in a partner, and strengthen the same positive qualities in yourself so as to attract someone who shares your beliefs and ideologies and will want to walk down the road of a relationship together.

But most importantly, don’t get discouraged. It may take a while, but that’s only because you know that you deserve a healthy, loving and understanding relationship and you shouldn’t be willing to settle for less.

Should I Talk About My Illness With My Partner?

People often avoid talking about mental health problems, particularly when entering a new relationship, because of the stigma attached to the topic. But if you hope to be in a healthy and long term relationship, you will need to be open about the condition with your partner, just as you would expect the same from them. Once this knowledge is out in the open, it makes it easier for the partners to support each other in the event of a health crisis or even to soothe symptoms that occur more frequently.

Being honest about your mental health disorder with your partner is crucial to building a nurturing, caring and understanding relationship. But this also means that you should not be disheartened if your partner is unable to accept it. This does not mean that something is ‘wrong’ with you or that you are ‘incapable’ of being in a relationship. You need to accept that it is not your fault and the other person is just unable to cope with the responsibilities that a relationship would entail.

Just remember, that a mental health condition is an illness, just like any other physical ailment. While there is still a stigma around it in society, it needs to be eradicated. And this does not mean that you don’t deserve a chance to live a happy and love-filled life just like any other person on this planet.

-Neha Paranjape, AccioHealth

Source: AccioHealth

Whether Marriage is a license to rape?

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Section 375 of Indian Penal Code defines Rape, “A man is said to commit “rape” if he—

  1. Penetrates his penis, to any extent, into the vagina, mouth, urethra or anus of a woman or makes her to do so with him or any other person; or
  2. Inserts, to any extent, any object or a part of the body, not being the penis, into the vagina, the urethra or anus of a woman or makes her to do so with him or any other person; or
  3. Manipulates any part of the body of a woman so as to cause penetration into the vagina, urethra, anus or any of body of such woman or makes her to do so with him or any other person; or
  4. Applies his mouth to the vagina, anus, urethra of a woman or makes her to do so with him or any other person,

Under the circumstances falling under any of the following seven descriptions:—

1. Against her will.

2.Without her consent.

3.With her consent, when her consent has been obtained by putting her or any person in whom she is interested, in fear of death or of hurt.

4.With her consent, when the man knows that he is not her husband and that her consent is given because she believes that he is another man to whom she is or believes herself to be lawfully married.

5.With her consent when, at the time of giving such consent, by reason of unsoundness of mind or intoxication or the administration by him personally or through another of any stupefying or unwholesome Substance, she is unable to understand the nature and consequences of that to which she gives consent.

6.With or without her consent, when she is under eighteen years of age.

7.When she is unable to communicate consent.

There are a few exception to the rules:

Exception 1—A medical procedure or intervention shall not constitute rape.

Exception 2—Sexual intercourse or sexual acts by a man with his own wife, the wife not being under fifteen years of age, is not rape.”[1]

Under section 375 of IPC a husband will be guilty of rape only if his wife is below 15 years or 15 years. And if the married lady is a major person i.e. 18 years and above, then there is no law for her protection. Is this a kind of mockery? Then in that case, rape committed with a minor girl only should be considered as crime under section 375 of IPC and not with a major person.

So, Indian law hasn’t recognized Marital Rape as a crime but this “Exception 2” of 375 speaks and considers Marital Rape as offence under 375 of IPC but with a limitation.

 “All involuntary sexual intercourse in marriage is not rape but all rape is involuntary sexual intercourse”

Pyali Chatterjee

[1] Universal Criminal Manual, 547, Universal publishing house Pvt. Ltd, ISBN: 9788175349193.

[2] Id.

4 things to do for your teenager who is going through depression

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Adolescents may often not understand what they are going through and hence will avoid seeking help. It is the responsibility of parents and close ones to ensure that they recieve prompt and professional help.

The teenage years are difficult as it is. But when coupled with depression, bipolar disorder or suicidal thoughts, life can become even graver. The sudden physical and emotional changes that occur as the teen years start can become confusing to comprehend and deal with and added stress can further fuel the feeling of anxiety, isolation and sadness.

Unlike adults, teenagers are still trying to understand their own minds and bodies. They have just started the journey to try and figure themselves out. So if they are suddenly confronted by feelings of depression, it is more likely that they will not know how to handle it.

Teenagers need more guidance and support in cases of depression and anxiety. It can often be difficult to identify symptoms of depression in teenagers, but in case you do feel that something is out of the ordinary, it is better to reach out and offer some help.

First, learn to identify signs and symptoms of depression that your child may be exhibiting. If his or her behaviour has changed suddenly, has become withdrawn or aggressive, is feeling hopeless or incapable of satisfying personal goals and ideals, has unusual eating and sleeping patterns, is engaging in substance abuse etc. then you need to reach out. If these symptoms start suddenly and last for more than two weeks, it may mean that something isn’t quite right.

Depression in teenagers can often take different forms such as addiction, anxiety disorders or bipolar disorder which involves spells of sudden euphoria and sadness or isolation. They may often not understand what they are going through and hence will avoid seeking help. It is the responsibility of parents and close ones to ensure that the adolescent receives help when needed.

It is important for teenagers suffering from depression to receive prompt and professional help and the forms of therapy may vary as per the different cases.

Some of the most widely recognised and accepted forms of therapy to treat adolescent depression are as below:

1. Psychotherapy: Psychotherapy involves counselling sessions with a psychologist or a counselling therapist. These sessions mostly involve talking and exchanging opinions and ideas with the counsellor. Psychotherapy is most often used to help one understand what they are going through and their own condition, moods, behaviour, feelings, thoughts etc through words and dialogue.

2. Cognitive Behavioural Therapy: This form of therapy is based on behavioural and cognitive principles of psychology. It is most commonly used to help solve mental and emotional problems and change negative feelings, thoughts or behaviour. Cognitive behavioural therapy involves talking with a specialist to analyse the negative or stressful areas and finding techniques to resolve the problem by trying to change the thought process, negative attitude or behaviour. CBT is often used for counselling in cases of mood and anxiety disorders, depression, eating disorders, addiction etc.

3. Interpersonal therapy: This is a limited time therapy that focuses on counselling to help individuals improve their existing relationships and maintain a healthy balance. It is a short-term treatment that helps deal with interpersonal issues and has been shown to be extremely effective in treating cases of adolescent depression.

4. Medication: This is usually the last resort to treat adolescent depression. If the severity of the depression has become intense, the psychiatrist may recommend antidepressant medication along with psychotherapy to help relieve some of the symptoms and reduce mental stress.

It is important for us to recognise that teenagers too can fall prey to this mental disease. Before the situation gets out of control, we need to lend our helping hand to help secure and develop the minds of tomorrow.

-Neha Paranjape, AccioHealth

Courtesy: http://www.acciohealth.com

मेनोपॉज

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वयाच्या 45-50च्या आसपास कधी कधी त्याहीनंतर स्त्रीचं पाळीचक्र थांबतं. याचं साधं कारण म्हणजे बीजकोषात बीजं तयार होणं थांबतं. प्रोजस्टेरॉनची निर्मिती पूर्णपणे थांबते. थोड्या फार प्रमाणात इस्ट्रोजन मात्र तयार होत राहतं.

पाळी जाण्याचा काळ काही महिने ते काही वर्षं इतका असू शकतो. शेवटच्या मासिक चक्राच्या आधीचा आणि नंतरचा काळ म्हणजे पाळी जाण्याचा काळ. पाळी जाण्याआधी काही वर्षं ती अनियमित होऊ शकते. काही जणींची पाळी चक्रं लहान होऊ लागतात तर काही जणींच्या दोन चक्रात बरंच अंतर पडतं. काही जणींचे पाळीचे दिवस आणि रक्तस्राव कमी होतो तर काही जणींना जास्त दिवस, गाठीयुक्त आणि जास्त रक्तस्राव होऊ शकतो. या काळात सलग एक वर्ष पाळी आली नाही तर पाळी गेली असं समजायला हरकत नाही.

मेनोपॉज (पाळी जाणे) – मेनोपॉज म्हणजे पाळी जाणे. ही बाईच्या शरीरात होणारी एक नैसर्गिक प्रक्रिया आहे. सलग 1 वर्ष बाईला पाळी आली नाही तर तिची पाळी गेली असं समजलं जातं. पाळी जाण्याच्या प्रक्रियेचे दोन मुख्य टप्पे आहेत.

प्री मेनोपॉज – पाळी जाण्याच्या आधीचा काळ – पाळी पूर्णपणे जाण्याच्या आधीचा हा काळ आहे. हा काळ 2 ते 10 वर्षं असा कितीही असू शकतो. या काळामध्ये स्त्रीच्या शरीरात इस्ट्रोजन आणि प्रोजेस्ट्रॉन ही संप्रेरकं कमी प्रमाणात तयार व्हायला लागतात. वयाच्या 45 ते 55 या काळात ही प्रक्रिया घडू शकते. या काळात संप्रेरकांचं संतुलन मोठ्या प्रमाणावर बिघडतं.

पोस्ट मेनोपॉज – पाळी गेल्यानंतरचा काळ –  पाळी थांबल्यानंतर शरीर जेव्हा संप्रेरकांच्या बदललेल्या स्थितीशी सामावून घेते तो हा काळ आहे.

पाळी जाण्याच्या काळात इस्ट्रोजनच्या पातळीत होणाऱ्या बदलांमुळे शरीरातून गरम वाफा येणं, घाम फुटणं, योनीतील ओलसरपणा आणि लवचिकपणा कमी होणं असे बदल होतात. रक्तदाब वाढणं, हृदयविकार आणि हाडं ठिसूळ होण्यासारखे आजार होण्याची शक्यता वाढते.

हे बदल समजून घेणं गरजेचं आहे कारण त्यांचा आपल्या शरीरावर, भावभावनांवर परिणाम होत असतो. त्याचप्रमाणे लैंगिक इच्छा आणि भावनाही त्यानुसार बदलत असतात. हे बदल आणि स्थित्यंतरं समजून घेणं हा शरीर साक्षरतेचा महत्त्वाचा भाग आहे.

Source: http://letstalksexuality.com/menopause/

पाळी मिळी गुपचिळी

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नेहमीच्या शिरस्त्या प्रमाणे पेशंटची रांग ओसरल्यावर सिस्टरांनी एकामागून एक एम.आर. (औषध कंपनीचे प्रतिनिधी) आत सोडायला सुरवात केली. दुपार टळायला आली होती आणि जांभया दाबत, मोबाईलवर, फेसबुकवर, अपडेट्स टाकत आणि त्याचवेळी नेटवर कोणतातरी संदर्भ शोधत मी त्यांचे बोलणे या कानानी ऐकत होतो आणि त्या कानानी सोडून देत होतो. फार गांभीर्याने ऐकावं असं त्या पोपटपंचीत नसतंच काही. पण इतक्यात एका वाक्याने माझे लक्ष वेधले गेले. तो म्हणाला, “आता सणाचे दिवस जवळ आले डॉक्टर, आता खूप बायका पाळी पुढे जाण्यासाठी गोळ्या घ्यायला येतील. तेव्हा लक्षात असू दया आमच्याच कंपनीच्या गोळ्या दया. प्लीज सर!! सणासुदीच्या दिवसांमुळे कंपनीने टार्गेट वाढवून दिले आहे; आणि तुम्ही मनावर घेतल्या शिवाय ते मला गाठता येणार नाही.” एवढं बोलून गोळ्यांचं एक नमुना पाकीट माझ्या टेबलावर ठेवत तो निघाला सुद्धा. माझा अहं कुरवाळून आपला काम सफाईदारपणे करून तो निघून गेला. मी मात्र अचंबित झालो.

एका लहानश्या गावातल्या एका लहानश्या डॉक्टरपर्यंत आवर्जून आर्जवं करणे कंपनीला सहजपणे परवडत होतं, म्हणजे हे पाळी पुढे ढकलण्याचे मार्केट किती प्रचंड लाभदायी आहे बघा! औषध कंपन्या आपला माल खपवण्यासाठी कोणत्याही थराला जातात हे माहीत होतं, पण त्या हे ही टोक गाठतील असं माझ्या ध्यानीमनीही आलं नव्हतं. पाळी या प्रकाराबद्दल भारतीय समाजमनाची नस बरोब्बर हेरून योग्य वेळी त्यांनी आपला माल पुढे केला होता. मला कौतुकच वाटलं त्या कंपनीचं.

खरं तर ही मागणी नेहेमिचीच, पूजा, सत्यनारायण, तीर्थयात्रा, उत्सव, सण वगैरे निमित्ताने केली जाणारी. क्वचित प्रवास, परीक्षा वगैरे कारणेही असतात, पण ती अपवादानेच. किती साधी सोपी रुटीन गोष्ट होती ही. बायकांनी यायचं, पाळी पुढे जायच्या गोळ्या मागायच्या आणि चार जुजबी प्रश्न विचारून आम्ही त्या द्यायच्या. माझी चिठ्ठीही नेहेमीचीच. मुकाटपणे दिली जाणारी. पण मनातल्या मनात मी वैतागतो, चरफडतो. म्हणतो, ‘काय मूर्ख बायका आहेत या! शुद्धाशुद्धतेच्या कुठल्या मध्ययुगीन कल्पना उराशी बाळगून आहेत.’

वेळ असला की माझ्यातला कर्ता सुधारक बोलता होतो. एरवी मागताक्षणी चिठ्ठी लिहून देणारा मी, समोरच्या स्त्रीला प्रश्न विचारतो, ‘काय शिक्षण झाले आहे तुमचे?’

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क्ष ची  किंमत अशिक्षित पासून डॉक्टरेट पर्यंत काहीही असू शकते.

‘आलीच जर पाळी,  तर तुम्ही समारंभात सहभागी होऊ नये हे तुम्हाला पटतंय का?’

‘…आता घरचंच कार्य म्हटल्यावर…’,‘…आमच्या घरी नाही चालत…’,‘…आमचं काही नाही पण सासुबाईंचं फार असते…’, ‘आमच्या घरी सगळंच पाळलं जाते…’; असं काहीतरी उत्तर येते. क्ष ची किंमत काहीही असो.

‘नाही, मला हे पटत नाही, हे मला मनाविरुद्ध करावे लागतंय!’, असं उत्तर वीस वर्षात एकदाही ऐकलं नाही.

पाळी आलेल्या स्त्रीला अस्वच्छ अपवित्र समजणे याची पाळेमुळे पार खोलवर रुजलेली आहेत. स्त्रियांच्या बाबतीत घडणाऱ्या, निसर्गनेमाने घडणाऱ्या, एका अत्यंत शारीर कार्याला धर्मिक, वैयक्तिक, कौटुंबिक आणि आर्थिक धुमारे फुटले आहेत. कुठून येतात या कल्पना? अगदी लहानपणापासून मनात कोरल्या जातात त्या. आई, मोठ्या बहिणी, शेजारी पाजारी सगळीकडे असतात त्या. आपण फक्त मनानं स्पंज सारख्या त्या टिपून घ्यायच्या.

शाळेत कधी कधी जायचा प्रसंग येतो. मुला-मुलींसमोर ‘वयात येताना’ या विषयावर बोलायला. सगळ्या मुली पाळीला सर्रास ‘प्रॉब्लेम’ असा शब्द वापरतात. प्रॉब्लेम आला/ गेला/ येणार वगैरे. मी गमतीने म्हणतो, ‘अहो पाळी ठरल्यावेळी न येणं, हा खरा प्रॉब्लेम! पाळी येणं हा प्रॉब्लेम कसा?’ मुलींना मी सांगतो, प्रॉब्लेम शब्द वापरू नका. पाळी आली असं म्हणा. मराठीत बोलणे फारच गावठी वाटत असेल तर एम.सी. म्हणा, मेंन्सेस म्हणा; आणखी इंग्रजी फाडायचं असेल तर चम म्हणा; पण प्रॉब्लेम म्हणू नका. प्रॉब्लेम म्हटल्यावर एका अत्यावश्यक नैसर्गिक शरीरक्रीयेविषयी मनात नकारात्मक भावना नाही का निर्माण होतं? पण हा प्रश्न गैरलागूच म्हणायचा. प्रॉब्लेममुळे नकारात्मक भावना नसून; मुळातल्या नकारात्मक भावनेपोटी हा शब्द वापरला जातो. काहीही असो पण हा शब्द वापरू नये असं मला वाटतं. यामुळे मुळातली नकारात्मकता आणखी गडद होते. त्यावर लोकमान्यतेच्या पसंतीची मोहोर उमटते.

ह्या मुळातल्या गैरसमजाचे पडसाद इतरही सर्वमान्य शब्दांमध्ये दिसतात. काही कारणाने पाळीचा त्रास झाला तर पिशवी धुतात/साफ करतात. याचा वैद्यकीय अर्थ पिशवीच्या आतलं अस्तर खरवडून काढून टाकतात. हेतू हा की रक्तस्त्राव थांबावा, तपासणीसाठी अस्तराचा तुकडा मिळावा आणि नव्याने तयार होणारे अस्तर एकसाथ, एकसमान तयार व्हावे. पण हे सारे व्यक्त करणारा शब्दच नाहीये. क्युरेटींग हा इंग्रजी शब्द रूढ आहे पण त्यामागचा हा भाव कुणालाच कळत नाही. सर्रास पिशवी धुणे /साफ करणे वगैरे चालू असतं.

एकदा पाळी हा प्रॉब्लेम ठरला की पुढे सगळे ओघानेच येतं. पाळी म्हणजे शरीरात महीनाभर साठलेली घाण बाहेर टाकण्याची एक क्रिया, हे ही मग पटकन पटते. समाजानी पाळी आणि अपावित्र्याचा संबंध जोडला आहे, यात काही आश्चर्य नाही. मलमूत्राच्या वाटेशेजारीच पाळीची वाट आहे. मलमूत्रविसर्जन ही तर निश्चितच उत्सर्जक क्रिया आहे. चक्क शरीरातील घाण वेळोवेळी बाहेर टाकणारी क्रिया. अज्ञानापोटी समाजाने पाळीलाही तेच लेबल लावलं. खरंतर शरीरातील पेशी सातत्याने मरत असतात आणि नव्याने तयार होत असतात. आपली त्वचा झडते, पुन्हा येते, केस झडतात पुन्हा येतात, लाल पेशींचे आयुष्य १२० दिवसांचे असतं; तसंच काहीसं हे आहे. गर्भपिशवीचे अस्तर ठराविक काळ गर्भधारणेला आधार ठरू शकते. मग ते निरुपयोगी ठरतं. बाहेर टाकलं जातं, पाळी येते. पुन्हा नव्यानं अस्तर तयार होतं. (मासिक चक्रं). मुद्दा एव्हढाच की मासिक पाळी ही उत्सर्जक क्रिया नाही. पण कित्येक स्त्रियांना आणि पुरुषांना असं वाटतं की महिनाभराची सगळी घाण गर्भपिशवीत साठते आणि ती महिनाअखेरीस बाहेर टाकली जाते.

अशा बायकांसाठी वेगळी झोपडी, वेगळी जागा, वेगळं अन्न चार दिवस बाहेर बसणं, पूजाअर्चा, देवळात जाणं बंद, पाचव्या दिवशी  अंघोळ करणं, पाळीच्या वेळी धार्मिक कार्यात सहभागी न होणं या सगळ्या रूढी आणि परंपरा याचाच परीपाक आहेत. जात कोणतीही असो, धर्म कोणताही असो याबाबतीत सर्व धर्म भलतेच समान आहेत.

पाळीच्या या चार दिवस विश्रांतीचं समर्थन करणारीही जनता आहे. ‘तेवढंच त्या बाईला जरा सूख, जराशी विश्रांती…’ वगैरे. म्हणजे एरवी श्वास घ्यायलाही फुरसत नाही एवढा कामाचा रामरगाडा! अपावित्र्यातून निपजलेली ही विश्रांती; आदरभावातून, ऋणभावनेने मिळालेली नाही ही. घराला विटाळ होऊ नये म्हणून ही बाकी घरानी केलेली तडजोड आहे. त्या बाईप्रती आदर, तिच्या कामाप्रती कृतज्ञता, तिच्या घरातील सहभागाचा सन्मान कुठे आहे इथे? नकोच असली विश्रांती. हे बक्षीस नाही, बक्षिसी आहे ही! उपकार केल्यासारखी दिलेली ही बक्षिसी बाईनी नाकारायला हवी.

का होतं, कसं होत वगैरे काहीही जीवशास्त्र माहीत नसताना पाळी हा प्रकार भलताच गोंधळात टाकणारा होता, आदिमानवाला आणि त्याच्या टोळीतल्या स्त्रियांना. महिन्याच्या महिन्याला रक्तस्त्राव होतो, चांद्रमासाप्रमाणेच की हे, निश्चितच दैवी अतिमानवी योजना ही. जखम-बिखम काही नाही, वयात आल्यावर स्त्राव होतो, म्हातारपणी थांबतो, गरोदरपणी थांबतो…! किती प्रश्न, किती गूढ, किती कोडी. पण म्हणून आजही आपण आदिमानवाचीच री ओढायची म्हणजे जरा जास्तच होतंय!

पाळी येण्यामागचं विज्ञान समजलं, पाळीवर परिणाम करणाऱ्या गोळ्याही निघाल्या. पण आपण याचा उपयोग सजगपणे करणार नाही. आपण या गोळ्या आपल्या शरीराबद्दलच्या, पाळीच्या अपावित्र्याच्या पारंपारिक कल्पना दृढ करण्यासाठी वापरणार! वा रे आपली प्रगती! वा रे आपली वैज्ञानिक दृष्टी!

पण समाजानं जरी अपावित्र्य चिकटंवलं असलं तरी ते तसंच चालू ठेवलं पाहिजे असं थोडंच आहे? निसर्गधर्मानुसार आलेली पाळी चालत नाही आणि औषध घेऊन पुढे गेलेली चालते, हे ठरवलं कोणी? ही बंधनं विचारपूर्वक नाकारायला नकोत? ‘देहीचा विटाळ देहीच जन्मला; सोवळा तो झाला कवण धर्म? विटाळा वाचून उत्पतीचे स्थान, कोण देह निर्माण, नाही जगी’ असं संत सोयराबाईनी विचारलं आहे.

हे असलं काही बोललं की प्रतिपक्षाची दोन उत्तरं असतात. एक, पुरुषप्रधानतेमुळे बायकांचे मेंदू पुरुषांच्याच ताब्यात असतात; आणि दुसरं समजा घेतल्या गोळ्या आणि ढकलली पाळी पुढे तर बिघडलं कुठं?

पहिल्या प्रश्नाचं उत्तर असं की ही समाजरचना अमान्य करण्याचे पहिलं पाऊल म्हणून या गोष्टीकडे बघा. गोष्ट साधीशीच आहे. ठामपणे सांगीतल तर पटणारी आहे. स्वतःला पटली असेल तर ठामपणे सांगता येतेच पण मुळात स्वतःचीच भूमिका गुळमुळीत असेल तर प्रश्नच मिटला.

‘घेतल्या गोळ्या तर बिघडतं काय?’ या प्रश्नाचं उत्तर असं की, म्हातारी मेल्याचं दुःख नाही पण काळ सोकावतो! आई करते म्हणून थोरली  करते आणि ताई करते म्हणून धाकटी! डोकं चालवायचंच नाही असं नकळत आणि आपोआप होत जातं

हे सारं कुठेतरी थांबायला हवं. स्वताःच्या आणि परस्परांच्या शरीराकडे निरामय दृष्टीने स्त्री-पुरुषांना पहाता यायला हवं. कुणीतरी कुठूनतरी सुरुवात करायला हवी.

डॉ. शंतनू अभ्यंकर

साभार :http://shantanuabhyankar.blogspot.in

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