सांवलेपन के भी मुआवजे?

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अब वो दिन फिर गए कि परिवार का कोई भी सदस्य आकर ‘सीधा’ ये कहे “चेहरे पर थोड़ा ध्यान दिया करो, जाओ थोड़ा फेशियल ब्लीच ही करवा आओ कि रंगत साफ़ हो जाये।” इसका ये आशय बिलकुल नही है कि रंगत साफ़ हो गयी है या मैं “गोरों” की तरह गोरी हो गयी हूँ। इसका अभिप्राय यह है कि उम्र के अनुसार निंदा करने के तरीकों में परिवर्तन लाना पड़ता है। अब चेहरे से जुड़ी उपरोक्त बातों को ही “तुम्हारे भले के लिए” वाली चाशनी में लपेट कर कहा जाता है, क्योंकि अब बड़ी हो गयी हूँ और ये समझने लगी हूँ कि तमाम योग्यताओं में गोरी रंगत होना भी समाज में एक योग्यता/उपलब्धि ही समझी जाती है अथवा सांवलेपन को हीनता से जोड़ दिया जाता है। ——– 2014 में यूपी गयी तो चाचा जी से बात हो रही थी वो कह रहे थे “i.a.s की तैयारी शुरू करो, मेहनत करो, आपको नही पता कि बड़ी नौकरी के बिना शादी के लिए अच्छा लड़का ढूंढने में कितनी दिक्कतें आती हैं, बिट्टू (बहन) को देखो अच्छी खासी गोरी सुंदर है लेकिन भैया (मेरे पिताजी) को उसके लिए मन का लड़का नही मिल रहा है।

” अच्छा! लम्बे समय बाद “अच्छे” लड़के का तात्पर्य समझ आया। उसका अर्थ ये था कि सांवली लड़की से विवाह हेतु बिना किसी विशेष अभियाचना (डिमांड) पर तैयार होने वाला लड़का। यहाँ इस बात पर मेरा विशेष ध्यान गया कि विवाह के मुद्दे पर कम गोरी अथवा सांवली लड़कियों के लिए बड़ी नौकरी को किसी क्षतिपूर्ति की तरह प्रयोग करने पर बल या छोटी तनख्वाह वाली या नौकरी न होने की स्थिति में दहेज को सांवली होने के मुआवजे के तौर पर देखना और सबसे निम्नस्तरीय बात ये निकलकर आती है कि यदि आप गोरी हैं बेहद खूबसूरत हैं तो आपको विभिन्न क्षेत्रों में सरलता से कामयाबी पाने के लिए “चेहरे/रूप” का इस्तेमाल करना सिखाया जा रहा है। ये गोरी रंगत से सम्बंधित वही सब निरर्थक बातें हैं जो पुरुषों ने आपको मानसिक तौर पर कैद कर आपका आत्मविश्वास तोड़ने के लिए बनाई हैं क्योंकि मैंने कभी नही सुना कि किसी सांवले लड़के की शादी के लिए भी उसके अभिभावकों को इतनी ही चिंता हो।ये कुछ और नही बल्कि रूढ़िवादी मानक हैं, ऐसे मानक जो सिर्फ औरतों को शरीर समझते हैं। आज़ाद होने की बात बस घरों से बाहर निकलने तक सीमित नही है बल्कि आज़ादी का सम्बन्ध आपको मानसिक रूप से कैद करने वाली पुरातन पुरुषवादी सोच से बाहर निकालने से भी जुड़ी हुई है।इन्हें तोड़िये इनसे बाहर निकलिए, चाशनी में लिपटी बातों को पहचानिये और देखिये कि कौन है वो जो आपको कैद करना चाहता है, अपनी फेवरिट बनिए, खुद से प्यार कीजिये और स्वयं को एक अविभाज्य इकाई समझकर स्वीकार कीजिये। और ये समझिये कि स्वाभाविकता के लिए किसी मुआवजे की ज़रूरत नही होती…..।

देखिये कि छला कैसे जाता है! बिलकुल ऐसे जैसे आरम्भ से अंत तक रंगभेद कि इस लड़ाई में मैं आपको छल रही हूँ और आप समझ नही पा रहे हैं…. सबसे पहले सांवले शब्द की उत्पत्ति पर बात करें तो यह मूल रूप से “श्यामल” का ही तद्भव रूप है जो काले के भाव को ही प्रेषित करता है।समाज में भी दो ही वर्ण प्रचलित हैं काला और गोरा। लेकिन जब हम “सांवला” शब्द का प्रयोग करते हैं तो ये एक भ्रामक अवस्था में होता है।भ्रामक ऐसे कि इसे हम काले की अपेक्षा थोड़ा “सु-वर्ण” मानते हैं यानी गोरेपन के थोड़ा नज़दीक। तो क्या ये सांवला शब्द “काले” वर्ण से उचित दूरी और गोरेपन से नज़दीकी को नही दर्शाता? बिलकुल दर्शाता है। ये काले रंग के प्रति घृणा/दूरी का ही तो भाव है। जो आपको “तुष्टिकरणवादी” बनाता है, जो आपको सहानुभूति संग सुविधाभोगी बनाता है। तो रंगभेद की लड़ाई में सबसे पहले हमे आवश्यकता है उन परिवर्तनकारी लोगों की छंटनी करना जो “सांवले” वर्ण का झंडा लेकर तुष्टिकरण का नेतृत्व कर रहे हैं या जो रंगभेद की असल भेदभाव वाली लड़ाई काले-गोरे में वास्तविक स्थिति का नेतृत्व कर रहे हैं। हमे आवश्यकता है चाशनियों/भ्रमों की पहचान कर उनसे बचने की।

-मेदिनी पाण्डेय

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