लिपस्टिक अंडर माय बुर्का

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पहलाज निहलानी जी, ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ फिल्म को मुंबई फिल्म फ़ेस्टिवल में जेंडर इक्वेलिटी के लिए ‘ऑक्सफेम’ अवार्ड मिल चुका है। यानी कि हम यह मानकर चलें कि फिल्म कुछ लोगों की नज़रों से होकर गुज़री और इसे सम्मान के काबिल समझा गया। यह फिल्म टोक्यो इंटरनेशनल फिल्म फ़ेस्टिवल में भी ‘द स्पिरिट ऑफ़ एशिया प्राइज़’ जीत चुकी है।

अब आपके मुताबिक इन लोगों को न तो संस्कृति से प्यार है और न ही संस्कृति की कोई समझ। श्रीमान निहलानी के दर्द को कोई नहीं समझ पा रहा! कि वो किस कदर भारतीय संस्कृति और महिलाओं के सम्मान को लेकर चिंतित है जो कि इस फिल्म के पास होते ही मिटटी में मिल जाना है! खैर..

सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष महोदय, अवार्ड से किसी विचार या रचना की मान्यता या महानता साबित नहीं हो जाती। लेकिन एक सामान्य सी इच्छा होती है कि जिस कृति को सम्मान से नवाज़ा जा रहा है उसे हम भी देखें और समझें। नकारना होगा तो हम नकार देंगे, आलोचना करनी होगी तो वो भी कर देंगे। हमें अपने विवेक पर पूरा भरोसा है और किसी भी डेमोक्रेटिक सिस्टम में भरोसा करना भी चाहिए।

फिल्म की निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव का कहना है, ‘जहाँ तक मुझे लगता है, बोर्ड फिल्म को इसलिए सर्टिफाइड नहीं करना चाहता क्योंकि यह एक महिलावादी फिल्म है जो पितृसतात्मक समाज को चुनौती देती है।’ अब जरा सुनिये बोर्ड ने क्या कहा, ‘यह एक महिला बेस्ड कहानी है, जिसमें सामान्य जीवन से आगे की कल्पनाएँ दिखाई गयी हैं। इसमें कई विवादास्पद सेक्सुअल सीन हैं, गालियाँ हैं, ऑडियो पोर्नोग्राफी है और समाज के एक ऐसे हिस्से को छुआ गया है जो काफ़ी संवेदनशील है, तो गाइडलाइन के तहत इसे रिफ्यूज़ किया जाता है।’

सबसे पहले ‘विवादास्पद सेक्सुअल सीन’ पर आते हैं। गुड़ खाकर गुलगुलों से परहेज़ करने वाली कहावत शायद निहलानी जी उनके कमरे में बैठकर फिल्मों पर कैंची चलाने वालों के लिए ही बनी है। ये वो लोग हैं जो दो कोड़ी के आइटम गानों पर भद्दे ढंग से नाचती लगभग नग्न लड़कियों और औरतों को देखते वक़्त वही कैंची अपने बगीचे की मिट्टी में गाढ़ आते है ताकि गलती से भी चल ना जाये। दूसरी तरफ मस्ती, ग्रैंड मस्ती, बेफिक्रे, मस्तीजादे जैसी कितनी ही फिल्मों को पास करके सेंसरबोर्ड भारतीय संस्कृति को बचा रहा है।

सिगरेट और शराब के ग्लोरीफिकेशन पर तो आप ये तर्क देते हैं कि आदमी का अपना विवेक है, किसने कहा कि ऐसे सीन देखकर आप भी पीना सीख जायें। तो फिर सेक्स सीन पर आपको इतनी आपत्ति क्यों! फिल्मों में दिखाई जाने वाली हिंसा से आपको ऐतराज नहीं मगर दो लोगों को प्रेम करता हुआ दिखाने से दिक्कत है। जिस तरह किसी फिल्म में दिखाए गए मर्डर को देखकर कोई मर्डर करना सीख जाये और उसमे आपकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं तो सेक्स सीन से कोई क्या सीखता है कोई क्या करता है उससे आपका क्या लेना देना!

दिक्कत यह है पहलाज जी कि आप भी उसी समाज की देन हैं जहाँ किसी महिला के लिपस्टिक लगे होंठ विरोध और अपने हक में खुलने के लिए नहीं बल्कि चूमने के लिए बने होते हैं। सेक्स सीन पर तो आप ऐसे बवाल मचा देते हैं जैसे अब तक की फिल्मों में तो आपने सब अभिनेत्रियों को बुर्के में ही पास किया हो!

अब बात करते है, ‘सामान्य जीवन से आगे की कल्पनाओं की’ तो ये अपने आप में कितनी हास्यास्पद बात कही है ना आपने, इतनी समझदारी की उम्मीद तो आपसे की ही जा सकती है कि कल्पना हमेशा ही सामान्य से आगे की ही की जा सकती है। सामान्य की कल्पना करता ही कौन है और करेगा भी क्यों? अगर आप इन्हीं बेहूदा कुतर्कों के आधार पर सार्थक फिल्मों को खारिज़ करते रहे तो भारतीय सिनेमा बेफिक्रे और ग्रैंड मस्ती जैसी फूहड़ फ़िल्मों के नाम से ही पहचाना जाएगा, और इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ भी नहीं हो सकता कला के नाम पर।

फीमेल फैंटेसी से इतनी घबराहट क्यों हुई आपको! इसकी वजह बताकर फिल्म खारिज़ कीजिये। बुरके के अन्दर की लिपस्टिक से ही खौफ खा गए आप तो, जब वो बाहर आएगी तब क्या होगा! सोचियेगा ज़रा… सेंसरबोर्ड की मनमानी ही है कि उसकी सुई सेे हाथी निकल जाता है, अफसोस! बाल रह जाता है।

इसे लिखा है भारती गौड़ ने, जो सोशल मीडिया पर विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करती रहती हैं। वे राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान की मीडिया इंचार्ज हैं और स्वयंसेवी संगठन अस्तित्व की काउंसलर रही हैं। वे जयपुर में रहती हैं।

Source: http://meraranng.in

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