I am a mom by choice!

“मैं शायद वैसी माँ न बनू जो अपने बच्चे के लिए गोल चपाती बनाए, या वैसी जो अपने बच्चे के घर लौटने का इंतज़ार करे… तो कैसी माँ बनूंगी मैं… वैसी जो अपनी ज़िंदगी से भी उतना ही प्यार करेगी जितना अपने बच्चे से… क्योंकि माँ बनना सैक्रिफाइज़ नहीं है, इट्स अ च्वॉइस।”

ये लाइन्स टाइटन रागा घड़ी के एक एड की हैं जो मेरी सहेली ने शेयर किया। मैंने देखा, कितना सही है ना! कोई तो लीक से हटकर एड और कहानी लिखता है, कोई तो है जिसे फर्क पड़ता है। हां, माँ बनना एक च्वॉइस ही है, कोई सैक्रिफाइज नहीं, कोई मजबूरी भी नहीं। माँ बनना वैसे ही है जैसे एक पत्नी और बहू बनना, एक दोस्त बनना, एक बहन बनना, या फिर एक मैनेजर या टीचर बनना। ज़िम्मेदारियां हर रोल से जुड़ी होती हैं, उन्हें निभाना है इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं कि खुद जीना छोड़ देना है।

मैं हमेशा कहती हूं कि हमें बच्चों को सही-गलत की पहचान करना सिखाना है, उनके निर्णय खुद नहीं लेने हैं। लोग मुझे अक्सर कहते हैं कि जब बच्चे होंगें तब पूछेंगे। मैं उन्हें ज़वाब नहीं देती, क्योंकि शायद मैं नहीं जानती इस रोल को कैसे प्ले करना है, लेकिन हां इतना जानती हूं कि मैं किसी भी हालत में अपने शौक नहीं बदलूंगी, ज़िंदगी जीना नहीं छोडूंगी। यही सब मुझे शादी से पहले कहा जाता था कि शादी के बाद देखेंगे। जानती नहीं वो क्या देखना चाहते थे, ये कि मैंने भी समय के आगे घुटने टेक दिए या उनसे अच्छा सर्वाइवर कोई नहीं।

जी बिलकुल, जब भी आप कोई नया रिश्ता बनाते हैं, तो आपको समय देना पड़ता है, मुश्किलें भी आती हैं, इसका मतलब ये नहीं कि हम पुराने रिश्ते छोड़ देते हैं, नहीं ना? फिर खुद के साथ भी हमारा कोई रिश्ता है न, वो हम क्यों भूल जाएं। मैंने कई लड़कियों को देखा है, जिन्हें खूब शौक है घूमने का, पर पूछो तो कहती हैं, “अब बच्चे हो गए, अब कहाँ घूम पाएंगे।”

और हाँ मैंने ऐसी भी लड़कियां देखी हैं, जिनके दो-दो बच्चे हैं फिर भी सारा टाइम सेल्फीज़ अपलोड करती रहती हैं पाउट में, घूमने भी जाती हैं, अच्छी माँ हैं और अच्छी बीवी भी। स्टीरियोटाइप एक शब्द होता है, जिसमें जो चलता आ रहा है, वही आदर्श है। अगर माँ सैक्रिफाइज करे तो वो अच्छी माँ है, अगर बीवी पति की हर बात माने तो वो बीवी अच्छी है।

नहीं ये सही नहीं, अगर माँ अपनी पसंद की शॉपिंग करे, या माँ अपनी पसंद की डिश मंगवाकर खा ले, अगर माँ बच्चे के होमवर्क खत्म करने तक का इंतज़ार ना करके पहले अपना काम करे, तो वो माँ बुरी माँ नहीं हो जाती। बस वो अपनी ज़रूरतों का भी उतना ही ध्यान रखती है, जितना अपने बच्चे -पति-सास-ससुर-माँ-पिता का रखती है। हमें इस स्टीरियोटाइप को तोड़ना होगा।

Source: https://www.youthkiawaaz.com/

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