सारी महिलाओंं को समर्पित

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कल एक इंटेलेक्चुअल और व्यस्क(उम्र के हिसाब से) महिला मित्र से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा
“राम ने जो सीता के साथ किया, वो सही था। वो राजा थे, उनको एक उदाहरण स्थापित करना था दुनिया के सामने।”
पिछले कुछ महीनो से मैं मार्क ट्वेन के इस लाइन का बड़ा फैन हो गया हूँ और इसका अक्षरशः पालन करता हूँ।

“Never argue with stupid people. They will drag you down to their level and then beat you with experience”

इसलिए मैंने अपनी असहमति जाहिर करने के बाद उस बातचीत से उठ जाना बेहतर समझा। लेकिन हां , खयालो की एक आंधी जरूर चलने लगी थी, लेखक मन विचलित हो गया था।

औरतों, महिलाओं, बेटियों, माँ और पत्नियों की कहानी यहीं रामायण से शुरू होती है। अहल्या से लेके सीता तक की इस कहानी में औरतों के अधिकारों को हर एक स्तर पे कुचल देते है वाल्मीकि। इतना एंटी प्रोग्रेसिव लेखक। चलो, राम ने जो किया, वो दुनियादारी के नाम पे किये जाने वाला कई “समझदारियों” में से एक था, लेकिन सीता, सीता ने जो किया वो? आत्मसमर्पण। क्यों, आखिर क्यों आपको अपने चरित्र को साबित करने की जरूरत है, जब आप, आपका पति और पूरे संसार को पता था कि आप पवित्र हैं। क्यों नहीं, उस दिन, हां उसी वक़्त जब युद्ध के मैदान में राम ने आपसे अग्निपरीक्षा की मांग की थी, आपने विद्रोह कर दिया। क्यों नहीं आप इतना कह पायी कि आप पिछले एक वर्ष में पवित्र रहे कि नहीं, मुझे इसका प्रमाण चाहिए। और हां, दूसरी बार भी आप ये साहस ना जुटा सकी और विद्रोह के साहस की बजाय मौत को बेहतर समझा। फिर जो होना था, वही हुआ, बिलकुल उसी ढर्रे पे। मर्द मजबूत होता गया, पुरुषोत्तम को आदर्श मानकर। औरतें पवित्र बनती गईं सीता को आदर्श मानकर।

फिर कई 100 सालों बाद कुंती ने कमजोरी दिखाई, एक बार फिर दुनियादारी के नाम पर आपका विद्रोह दम तोड़ गया। वो तो भला हुआ जो कर्ण इतना प्रतिभावान निकला कि दुनिया के पटल पे कुंती को माँ कहने का साहस कर पाया। वरना जो गति आज के दुनिया में गरीब की है, वो उस वक़्त प्रतिभारहित लोगो की थी।

रतिनाथ की चाची(जिसमे विधवा चाची का देवर रेप कर देता है और उसके बाद फरार। सीता को फॉलो करने वाले औरत समाज फिरसे चाची को कसूरवार ठहराती है, चाची सब कुछ सहती है लेकिन सच नहीं बताती किसीको। पढियेगा अगर नहीं पढ़ी हो तो। नागार्जुन के लेखन का कमाल है) से लेकर पत्नी(जैनेन्द्र कुमार की लिखी एक कहानी है, ज़रूर से पढ़िए) तक, सबने औरतों को या तो बलिदान देते हुए दिखाए हैं या फिर कमजोर। क्या ही बदलता!

अब आज की बात करते हैं। आपको ये शिकायत है कि आपको अधिकार नहीं मिले, मर्दों ने आपके पीरियड्स से लेके शादी तक, आपके करियर से लेके आपकी सुरक्षा तक एक बेड़ियां लगा रखी है तो आप सही है हमेशा की तरह और कमजोर हैं हमेशा की तरह। क्यों नहीं आप कह देते पापा को कि 1 रुपया दहेज़ नहीं दूँगी, चाहे शादी हो ना हो। क्यों नहीं हर उस छेड़ने वाली आँखों को एक घूँसा लगा देती है आप, जिसकी आँखों के चारों और हुए काले अँधेरे अगली लड़की को देखने के पहले 100 बार वार्निंग देंगे। क्यों नहीं, आप ट्रैन पे, बस पे कभी किसी ग्रोप करती हुई हाथों की उंगलिया मरोड़ देती है। यकीन मानिए, हर एक बार जो आप आगे बढ़ जाती है, उन उँगलियों को मजबूती दे जाती हैं। क्यों आखिर क्यों, कमजोरी का ये चोगा उतारकर वो जो आप मांग रही हैं, आग्रह कर रही है, उसको छीन नही लेती। आखिर क्यों?

मेरी एक दोस्त से बातचीत के दौरान उसने बताया कि उसे दसहरा के अश्टमी की पूजा करनी थी और उसी वक़्त उसके पीरियड्स आने वाले थे तो उसने उसे डिले करने वाली दवा खा ली। सीरियसली! उसके बाद उसकी जो तबियत खराब हुई, 4 बोतल पानी चढ़ाना पड़ गया। यहां फिर से मैं एक प्रोग्रेसिव लड़की की बात कर रहा हूँ। तो आप पढ़ लिख कितना भी जाएँ, कितना भी सेक्सिस्ट, फेमिनिस्ट कर लें, बिन आवाज़ उठाये आप वही रहेंगी, सीता ने जो स्केल सेट किया था आपके लिए। हर उस मंदिर, मस्जिद का अस्तित्व संकट में हो जो प्रकृति के दिए हुए इस उपहार को गन्दगी समझता हो, तब आप “आप”बनोगे।

किसी ने मुझसे कहा कि गालियां माँ, बहनों के नाम पे इसलिए है क्योंकि इनकी हम इज्जत करते हैं। इज्ज़त, हाहा, इज्जत नहीं चाहिए इनको भाईसाहब। अधिकार चाहिए, वो तो ये लेने से रही तो फिर इज्जत ही सही। अच्छा, इसीलिए पति अपनी पत्नी को मारता है, अपनी बेटी को कुछ पैसे देके किसी पराए लड़के के यहाँ मरने तक छोड़ आता है। वाह, क्या लॉजिक है। वेसे दुनियादारी का कभी भी लॉजिक से कुछ लेना देना रहा था क्या।

आपने हमे जनम दिया, आपने पहला भोजन दिया। आप हमें लेके कई महीनो तक भटकती रही और आपने ही हंमारे chaos में stability दी लेकिन फिर भी आप हाशिये पे। ज़रूर कुछ तो गलती होगी आपकी, शायद आपकी कमजोरी!

ये दुनिया मजबूतों की दुनिया है। जब तक आपको आपके अधिकार के लिए किसी राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसों की जरूरत पड़ती रहेगी आप उस समय तक बराबर नही होंगी। ये दुनिया जयललिता को याद रखेगी जिसे एक बार विधानसभा में अपमानित किया गया तो अगली बार वो मुख्यमंत्री बनकर लौटी ना कि राबड़ी देवी को। दुनिया का इतिहास सोना महापात्रा को याद रखेगा, दीपिका पादुकोण को याद रखेगा, इंदिरा गांधी को याद रखेगा क्योंकि ये बस कहीँ पहुँची नहीं, मर्दो के इस रेगिस्तान में औरतों के लिये एक छाँव तैयार किया है।

दुनिया का इतिहास गवाह रहा है कि मजबूतों के पैरों तले कमजोर कुचला गया है तो बस यही कहूंगा कि a day after everyday(अनुराग कश्यप की एक शार्ट मूवी है) के नायिका की तरह अपनी आवाज़ की मासूमियत को हटाइये। किसी से कुछ मांगना या उम्मीद करना बन्द कर दीजिए। अब लेने की बारी है, छीन कर।

एक आखिरी बात क्रहनी थी ये सेक्सिट और फेमिनिस्ट बनना बंद कर दीजिए। जब आप ये बात समझ लेंगी कि ये लडाई आपकी है, मर्दों की नहीं, तो फिर आपकी आवाज़ ऐसे ही मजबूत हो जायेगी। एक्चुअली ये लड़ाई मर्दो से नहीं है, आपसे है, खुद से है, आपके वजूद से है। आपको अगर कुछ बनना है तो क्रांतिकारी बनिये और नहीं तो मर्दों का समाज कुछ और हज़ार सालों तक आपकी अग्निपरीक्षा लेता रहेगा।

P.s: बहुत मुश्किल रहा है ये लिखना। उम्मीद है कि आप इसके शब्दो से ज्यादा इसका स्पीरिट समझेंगे। अगर किसी को ठेस पहुचती है इन शब्दों से तो सही है, मेरी कोशिश कामयाब हुई। सच बता रहे है, कुछ करिये। बहुत लेट हो गया है, कब तक रोती रहियेगा। आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।

Kumar Priyadarshi

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