पुरुष कभी रोते नहीं हैं

कई बार मैं कई मौकों पर रोना चाहता हूँ. चिल्ला चिल्ला कर रोने का मन करता है. बहुत सारे मौकों पर जो अन्दर का “मैं” होता है वो रोना चाहता है. मेरे ही जैसा बहुत सारे पुरुष भी फील करते होंगे. मगर एक जो हम पुरुषों की बचपन से जो कंडीशनिंग की गई होती है न कि “लड़के/मर्द/पुरुष कभी रोते नहीं हैं” वो हम लोगों के रोने को ब्रेक लगा देता है. यही जो ब्रेक होता है न वही पुरुषों की बदसूरती और हार्ट अटैक का एक कारण भी बनता है. मोस्टली पुरुष बदसूरत मिलते हैं… उनकी स्किन खराब होती है… ग्लो जैसी चीज़ें उनसे दूर रहती हैं. और एक अलग सी रफ़नेस पुरुषों में देखने को मिलती है जो कि महिलाओं में देखने को नहीं मिलती. न्यूरो-साइंटिफिक पर्सपेक्टिव्स से देखा जाए तो खूबसूरत दिखने के लिए रोना भी बहुत ज़रूरी है. यह रोने की आर्ट महिलाएं बख़ूबी जानतीं हैं. और यह औरतें इतनी ज़बरदस्त रुआंटी होतीं हैं कि इनका रोना देख कर बेचारे पुरुष रोना भूल चुके हैं. मेंटल हेल्थ और स्टेबिलिटी के लिए रोना बहुत ज़रूरी है. रोने के कई फायदे हैं जिसका यूज़ सबसे ज्यादा बाय डिफ़ॉल्ट महिलाएं ही कर पाती हैं. रोने से किसी भी तरह का स्ट्रेस दूर हो जाता है यहाँ तक कि जो नॉन-इमोशनल टीयर्स होते हैं उनसे भी हमारी बॉडी में काफी सारे पॉजिटिव फिजियोलॉजिकल चेंजेज़ होते हैं. प्याज़ छिलने, हँसने और ठसका लगने से जो आँसूं निकलते हैं उन्हें नॉन-इमोशनल टीयर्स कहते हैं.

रोने से मेंटल टफनेस बढती है जो आपको लेस प्रोडक्टिव होने से, ड्रग्स और शराब जैसी गन्दी चीज़ों से दूर रखती है. रोने से आप खराब से खराब सिचुएशन को भी हैंडल करने के लिए तैयार हो जाते हैं. रोने से आपका समाज में एक पॉजिटिव रिप्रजेंटेशन होता है जो आपके सामाजिकता को बढाते हुए आपका सामाजिक दायरा मजबूत करते हैं. इसलिए महिलाएं बहुत सामाजिक होतीं हैं. उनके सोशल कॉन्टेक्ट्स बहुत सही और स्ट्रोंग होते हैं. उन्हें किसी ड्रग्स या शराब की ज़रूरत नहीं होती. पुरुषों में इसलिए सामाजिकता नहीं पाई जाती क्यूंकि वो अपना इमोशनल बर्स्ट करना अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं. इसलिए उन्हें ड्रग्स या शराब की ज़रूरत पड़ती है. पुरुषों की कंडीशनिंग उनके ही घर में ख़राब होती है. उन्हें बचपन से यही बताया जाता है कि रोना नहीं है. प्रकृति ने महिलाओं को रोने की ताक़त देकर उनका नैचुरली एम्पावरमेंट (सशक्तिकरण) किया है. और यह नेचुरल वीमेन एम्पावरमेंट इसलिए किया गया है ताकि यह मुश्किल से मुश्किल घड़ी में जहाँ पुरुष आत्महत्या कर लेते हैं वहां यह डट कर सिचुएशन का मुकाबला कर सकें. देखा ही होगा कि पुरुष जब कुछ नहीं कर पाता है तो या तो माँ-बहन की गाली देता है या फिर आत्महत्या. इसलिए पुरुषों में आत्महत्या की दर काफी है.

आज ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में हुए एक साइकोलॉजिकल रिसर्च के बारे में पढ़ रहा था कि सोशल मीडिया में जो लोग अपने स्टेटस में “‘इट’स कौम्प्लीकेटेड”… “इन अ रिलेशनशिप” लिखते हैं वो लोग दूसरों से अटेंशन पाना चाहते हैं… जिससे कि उनका यह लिखा देख कर लोग उनसे सहानुभूति दिखाते हुए बात करें. एक एनालिसिस में यह भी निकला कि जो लोग अपने रोमांस या सेक्स पार्टनर… स्पाउस (जाहिलों को बता दूँ कि स्पाउस मतलब आपके हस्बैंड या वाइफ से होता है) के फोटोग्रैफ्स सोशल मीडिया पर अपडेट करते हैं वो लोग मेंटली कमज़ोर होते हैं. इनमें बहुत ही लो सेल्फ एस्टीम होता है. इन्हें अपने स्पाउस से बिल्कुल भी प्यार नहीं होता… चूँकि यह कम्पैनियन शिप के मामले में कमज़ोर होते हैं तो दुनिया को और खुद को लाइक्स और कमेंट्स के ज़रिये खुश दिखाने की कोशिश करते हैं.

चलते चलते बताता चलूँ कि वीमेन एम्पावरमेंट तब सक्सेसफुल समझा जाना चाहिए जब कोई भी महिला अपनी सेक्सुअल डिमांड और फीलिंग्स को अपने पार्टनर के सामने खुल कर रख सके. सेक्स की बात और सेक्सुअल डिमांड रखने पर कोई उसके करैक्टर पर सवाल न उठाये. जिस दिन महिलाएँ एक्सप्रेशन ऑफ़ सेक्स को गिल्ट के रूप में लेने से बाहर आ जाएँ उसी दिन सही मायनों में वीमेन एम्पावरमेंट होगा… फेसबुकिये जाहिलों और एवरेज लोगों को बता दूँ कि वीमेन एम्पावरमेंट को हिंदी में महिला सशक्तिकरण बोलते हैं.

Mahfooz Ali

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