The eunuch!


बात इतनी कुछ ख़ास नहीं थी लेकिन आज ये बात बहुत ख़ास सी लग रही है।बात 21 मार्च 2016 की है,मैं प्रतापगढ़ से दिल्ली वापिस आने के लिए पद्मावत एक्सप्रेस में बैठी थी।थक कर चूर थी क्योंकि उसी सुबह मैं पूरे बारह घंटे की यात्रा के बाद प्रतापगढ़ पहुंची थी और उसी शाम मुझे दिल्ली के लिये वापिस यात्रा करनी थी।प्रातपगढ़ में 8 घंटे रहने पर भी मुझे खाना खाने का समय नहीं मिला और बिना कुछ खाये ही वापसी हुई।साथ में कुछ फल (सेब, अंगूर, संतरे,अनार)थे जो कि बुआ जी ने दिए थे।मैं अपनी सीट पर बैठी उन्हें खा रही थी। एक बेहद बुलंद सी आवाज़ आई “ला राजा, निकाल बाबू” मेरे लिए बेहद अनोखी बात थी ये।मैं थोड़ा झुककर देखने लगी।पता चला कि कोई किन्नर है जो लोगों (यात्रियों) से पैसे मांग रही है।शायद ये मेरे अब तक के जीवन में देखी गयी सबसे सुन्दर किन्नर थी।गज़ब का आकर्षण था उनमे।गेहुंए रंग की थी वो, उनके सफ़ेद सूती कुरते पर सफ़ेद मोतियों से हुई कारीगरी और प्लाजो,सफ़ेद फ्लैट चप्पल,कान में बड़ी बड़ी सिल्वर बालियां, रिबाउंडिंग किये हुए बाल, गले में मोती की माला और हाथ में एक क्लच, बाप रे उनके आगे अच्छी से अच्छी सुंदरियाँ भी लज्जा खाएं।वो मेरे सामने खड़ी थी, मुझसे रहा नहीं गया और जैसे ही मेरी और उनकी नज़र एक हुई मैं बोल पड़ी “आप बहुत सुन्दर हो” जवाब में उन्होंने कहा “थैंक यू” मैंने कहा “सेब खायेंगी?” उन्होंने कहा “न, तू खा” मैंने कहा “लीजिये न” उन्होंने सेब लिए, मैं थोड़ा सरकी और उनको बैठने का इशारा किया वो बैठी।फिर मैंने कहा “आपका सूट बहुत प्यारा है” वो हंसी, मुस्कुराती रही, मैंने कहा “संतरा भी लीजिये” उन्होंने कहा “न गुड़िया, तू खा, अपन को कौन ऐसे कुछ खाने को पूछता है? तूने प्यार से सेब खिलाया, चार बात की, तू बहुत तरक्की कर…..” इसी तरह की शुभकामनाएं करती, मुझे आशीर्वाद देती वो उठी और फिर चली गयी। पिताजी मुझे घूर रहे थे, मेरा ये व्यवहार उनके लिए सरलता से हज़म कर लेने वाला नहीं था। आज जब मम्मी से इस बारे में ज़िक्र कर रही थी तो उनकी (किन्नर) बातों में छुपी वेदना महसूस हो रही है, कि कोई उन्हें वो सम्मान नहीं देता जिस सम्मान का हक़दार हर मनुष्य हर जीव है। मानवीय व्यवहार के नियमानुसार ये बातें बेहद सामान्य सी हैं किसीको भोजन और पानी के लिए पूछना, किसीकी प्रसंशा करना, किसी के साथ प्रेम से बात करना।लेकिन हमारे ही व्यवहार की कठोरता ने इस सामान्य व्यवहार को भी कितनी विशिष्ट श्रेणी का बना दिया है।

Medini Pandey

Why do relationships fail? ThatMate

Why do relationships fail?

“When she asked him whether it was true that love conquered all, as the songs said. ‘It is true’, he replied, ‘but you would do well not to believe it.” ~Gabriel Garcia Marquez

We would all like to believe that when we fall in love it will be forever. The truth is, love is a complicated and fluctuating emotion.  It is not a super hero power that will conquer all of life’s problems. One has to treat love with respect and nourish it. By pruning the bad behaviors we can allow love to blossom and flourish. I wrote this post because I believe it is important for all of us to identify the behaviors that are deadly for our relationships.

Dr. John Gottman is a therapist who in 2007 was recognized as one of the most influential therapists of the past 25 years. He is a Professor Emeritus in Psychology who specializes in marital stability and relationship analysis. Based on several studies he conducted over the last 40 years he was able to come up with 4 negative behaviors that can predict divorce if they are not corrected. Dr. Gottman refers to these harmful behaviors as the 4 Horsemen of the Apocalypse. These 4 behaviors can and will slowly destroy your relationship. Daily verbal and non-verbal behaviors will erode the love that is sustaining the relationship until finally there is nothing left.

Here are the 4 Horsemen of the Apocalypse

1. Criticism
“What is wrong with you? Can’t you do anything right!? ~Unknown

Complaints are a natural and normal part of healthy relationships. One should be able to discuss a specific complaint with their partner and reach some sort of agreement. The type of criticism that is toxic and deadly to a relationship is when one person attacks the person character of the other instead of the behavior. This type of criticism will only add fuel to the argument because the person being attacked will more than likely attack back.

2. Defensiveness
“The problem is not me, but you for always bringing up this issue.” ~Unknown

Defensiveness naturally occurs when a person feels they are being attacked. It is toxic in a relationship because instead of taking responsibility for the problem the person wards off the perceived attack by blaming the other person. The person will assume no responsibility for the problem even if they are obviously at fault. They will deflect by blaming the other party.

3. Contempt
“Ok genius, the word is many… not much.” (correcting grammar during an argument in a mocking tone) ~Unknown

According to Gottman, this is the worst of the 4 Horseman. He has referred to is as “sulphuric acid for love.” Contempt in a marriage is the best predictor of divorce. A couple needs respect in the relationship in order for the relationship to thrive. Contempt is disrespect and deadly for a relationship. The contemptuous person acts superior and may show their contempt by name calling, eye rolling, mocking or hostile humor.  Furthermore, Gottman points out that contempt in a relationship is so destructive it can serve as a predictor of how many infectious illnesses a person will have in the next 4 years. Studies have shown that contempt diminishes the immune system and can cause physical manifestations in the body.

4. Stonewalling
Stonewalling is a communicative shutdown. After the criticism, defensiveness and contempt a person will refuse to engage. They are simply tuning out and building an imaginary wall around them during an argument. They will refuse to participate in the discussion in any way. They will not respond verbally or give any physical cues to acknowledge the argument. Many times the stonewaller will leave the argument without saying anything. Stonewalling can become a habit and a way to avoid all arguments including the relationship.

This article is not meant to diagnose or to be a guide for self-diagnoses. The sole purpose of this article is strictly for educational purposes. If this sounds like you or someone you know please seek the help of a mental health professional.

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Depression Let’s Talk 2


हर रोज़ की तरह मैं सूरज को एक पहर का इंतज़ार करा रहा था, चिढ़ के कभी उगना बंद ना कर दे ये। रातें जब देर से हों तो सुबहें लाज़िमी सुस्त हो जाती है। मैं शाम की बात अब वापस अपने सिस्टम में रिप्ले कर रहा था कि घर की घण्टी बजी। मम्मी ने जाके देखा तो मुझसे कहा
“देखो, रवि आया है”
“अभी!!” अपने आंख की कांची को हटाते हुए मैं हक्का बक्का रह गया था।

थोड़े और कपङे पहनके मैं जो उससे मिलने गया, सरप्राइज का सिलसिला थमा नही था। दाढ़ी बढ़ा ली थी उसने और शरीर झुलसा हुआ था। सड़क पे दिखता तो शायद पहचान भी नही पाता मैं। चाय कॉफ़ी के बाद मैंने पूछा
“कल क्या हुआ था”
“मैंने उसी वक़्त नींन्द की गोलियां खायी थी”
“क्या….” इस ताज़े झटके को हंसी को शक्ल देता हुआ मैं बोल पड़ा।
“डॉक्टर कहते हैं कि क्लीनिकल डिप्रेशन है मुझे” उसकी बेरुखी जवाबो में जारी रही।
“हुआ क्या है” मैंने सम्भलते हुए पूछा।
“हुआ कुछ नही, बस कुछ अच्छा नही लगता। कभी तुरत में बहुत अच्छा लगता है फिर वही रूखा सूखा सा सब। ज़िंदगी के सारे ब्रेक्स फेल से हो गए हैं… क्या कर रहा हूँ, समझ नही आता मुझे”

“आह, सब ठीक हो जाएगा, कुछ नही हुआ तुझे, सब दिमाग का झोल है तेरे” मैंने उसके कंधे पे हाथ रखते हुए कहा।

उसने मेरा हाथ झटक दिया और बोला
” ये तो और बड़ी समस्या है। किसीको बताओ तो बीमारी ही नही मानते, लगता है जैसे मैं बहाने कर रहा हूँ। यार, पागल नही हूँ मैं, बीमार हूँ बस। एक साल हो गए रात को नींन्द आये हुए ढंग से। पढ़ाई करने बैठू तो आधे घण्टे से ज्यादा मन नही लगता, दिमाग जैसे पीछे हटने लगता है, खाना अच्छा नही लगता, जीना अच्छा नही लगता। लगता है मेरे जीने का तरीका ही गलत था, दौड़ना चाहिए था मुझे भी सबकी तरह, तुम्हारी तरह। कम से कम उस धुन में खुद से रिश्ता तो नही टूटता मेरा।” उसकी आँखों मे पहले जो गुस्सा था अब वो धीरे धीरे आंसुओं में बदल रहा था।

उसने बोलना जारी रखा
” ये साला सबको खुश करने के चक्कर में मैंने समझौते करने शुरू किए, अब जब ज़िंदगी की नाव कही पहुच नही रही तो ना वो खुश है ना हम। शायद ज़िंदगी की नाकामी है, या फिर ये अकेलापन, कोई कम्बखत बीमारी है या फिर बस दिल्लगी है खुदा की, परेशान हो गया हूँ मैं, खुद से और सबसे।” उसकी खीझ माहौल को बहुत गंभीर बना रही थी।

मैं, क्या ही बोलता, ऐसे बातचीत, मौकों के लिए जिन ट्रेनिंग की जरूरत होती है, उसमे बहुत खराब था मैं। मैं सुन रहा था बस चुप, गुमसुम। उसके जज़्बात कभी ऐसे खुल्ले देखे नही थे मैंने।

“अब चलता हूँ, इतनी सी ही बात कहनी थी। अच्छा लग रहा है अब” उसने चाय का आधा कप टेबल पे रखते हुए कहा।

“बैठ, थोड़ी देर” मैने सकुचाते हुए कहा।
“ना, लगता है आज से डॉक्टर की दवा काम करने लगेगी। महीनों में पहली बार किसी से बात करके अच्छा लग रहा है, ऐसे तो बस कोफ्त होती है लोगो से मिलके। जाने से पहले मिलके जियो तू” वो निकल चुका था कमरे से मेरे।

अगले एक महीने मैं हर दूसरे दिन उसके घर जाता रहा। हम घण्टो बातचीत किया करते। कभी खिड़की वाली लड़की के बारे में तो फिर कभी डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में। कभी चीन की ग्रोथ डिस्कस करते तो कभी अपने माँ बाप को मन भर सुनाते। दुनिया के इस छोड़ से उस वाले छोड़ तक कि बातें। वो अब बेहतर हो रहा था और उसके साथ साथ मैं भी। डॉक्टर की दवा असर कर रही थी शायद। जो आखिरी दिन मैं उसके घर पे गया था, तो वो बिल्कुल खामोश था। आधे घण्टे के बाद उसने बस एक लाइन कही थी, बस एक लाइन।

2 हफ्ते हो गए मुझे अपनी दुनिया मे वापस आये हुए। कभी कभी उसका ख्याल भी आ जाता था मुझे तो “वो ठीक होगा” ये सुकून हुआ करता। लेकिन आज सुबह उसके भाई का फोन आया था
“रवि फिर से उसी हालत में है” मैं तड़प गया था।

उसकी वो आखिरी लाइन याद आ गयी थी
“कोई दवा नही है जो ठीक कर रही मुझे। तेरे साथ था तो खुल रहा था, तेरे जाने के बाद वही जज़्बात कुरेद देंगे फिरसे मुझे, मैं फिरसे वही हो जाऊंगा। तू मत जा, प्लीज”

पेट की भूख ऐसे कई “इम्प्रक्टिकल” आग्रहों को रौंद देती है, बरबस।

Kumar Priyadarshi

Let's talk - ThatMate

On Depression Let’s talk tomorrow

वो लोग होते है ना जिनसे मिलके आपको लगता है जिंदगी कितनी ख़ुशगवार है, कितने तरीके है इस जलजले में खुशियां देखने के। वो लोग होते है ना जिनसे मिलके आपको उनको छिछलेपन पे हंसी भी आती है, जिनके हंसोड़ और हर बात की गम्भीरता कुरेद के निकाल देने की आदत पे कभी गुस्सा आता और कभी प्यार। वो लोग होते है ना जिनसे आप तब सीखते है जब आप ढर्रे पे चलके बहुत दूर निकल जाते है, खुद को भूल जाते है, ऐसे रेस में कोई गर आपको सड़क किनारे कड़ी धूप में “हर फिक्र को धुएं में” गुनगुनाता हुआ मिल जाये, ऐसा था वो। वो लोग होते है ना जैसा दोस्त सभी चाहते है, लेकिन कोई वैसा बनना नही चाहता। बिल्कुल ऐसा, थोड़ा ज्यादा होगा बेफिक्र, कम तो बिल्कुल भी नही, रत्ती भर भी नही।

7-8 साल से जानता हूँ उसे, या यूं कहें हर दिन उसको जानने की तलब होती है और हर बार ये कशिश अधूरी रह जाती है। कुछ तो होगा जो बांध के रखता होगा उसे दुनिया के वास्तविकता, भागदौड़ से इतना दूर फिर भी वही शांति जैसे समंदर किनारे कोई सुबह की शुरुआत। एक बार पूछा था मैंने
“यार तू इतना गंभीर है, लोगो के सामने ऐसा क्यों रहता है जैसे तेरे में कोई गहराई ही ना हो?”
वो हंसने लगा और बोला “तू नही समझेगा!”
“मैं नही तो और कौन समझेगा तुझे” मैने दोस्ती का कार्ड फेंक दिया था।
“शायद कोई नही”
उससे बहस में जीतना नामुमकिन था तो मैंने अपनी सीमाएं ज्यादा नही खींची। लेकिन एक बार उसकी डायरी का एक पन्ना छुपके पढ़ लिया था, मेरा जवाब और दुनिया का जजमनेट उस दिन के बाद कही काफूर हो गया था। लिखा था

” इंसान की शख्शियत नारियल सी होनी चाहिए। पहले बहुत रूखा सा हिस्सा, जिससे आप प्यार शायद ही करें। कोई अगर आपकी शख्शियत में रुचि रखता है या फिर करने लायक है तो उसे अगले परत का इंतज़ार करने का धैर्य होना चाहिए। गर नही तो आप बेहतर लोग नसीब रखते हैं। जिस किसीने आप पे अपनी ऊर्जा, समय और विश्वास इन्वेस्ट नही किया, उसे आपके उजले और मीठे सतह को देखने का हक नही। गर सबको आप अपना वो फेस दिखाएं तो उसके खुरच जाने का बड़ा खतरा है, ख्याल रखना!”

अपने आज में बस आज ढूँढनेवाले उस लड़के से मिलने की बड़ी ख्वाहिश थी इस बार जो घर मैं लौट तो। करीब साल भर पहले मिला था उससे। मोबाइल वगैरह ना रखना थोड़ी गरीबी थी, थोड़ा फक्करपना, तो कोई तरीका नही था मिलने की बजाय। घर आके 2-4 दिन तो बिस्तर पे यूँही कट गए, एक शाम मैने उसके भाई के नंबर पे फ़ोन लगाया और बातचीत शुरू हुई तो उसने दूसरे लाइन में ही बोला
“यार, कल बात करें” आग्रह के बोझ में दबी आवाज़ थी।
“बिल्कुल” मैं भौचक्का था।

एक लड़का जिसने कभी भी किसीको किसी बात के लिए ना नही कहा था, आज वो बात नही कर रहा मुझसे, ऐसी क्या बात हो गईं अचानक। उसकी आवाज़ को क्या हो गया था। सारी ऊर्जा, हंसी जिसका मैं और सब कायल थे, वो गुम हो गया था। बहुत उदासी थी फ़ोन के उस तरफ, जैसे भूकंप आया हो। मेरा मन घबरा सा गया था, नकारात्मकता के सारे समीकरण खंगाले जा रहे थे। अगले दिन का इंतज़ार अब मुश्किल हो रहा था।

P.s: कहानी नही है ये, सच है हंमारे आपके समाज का। एक ऐसी बीमारी, जिसको हम बीमारी ही नही मानते, आइये उसके बारे में बात करते हैं, बात से ही तो बात बनती है। जल्दी ही हाज़िर हुआ अपने दोस्त के साथ।


Kumar priyadarshi

The सिंगल मदर

single mom

एक अमेरिकन दोस्त से कभी बात हो रही थी। शादी नहीं की पर माँ हैं।” सिंगल मदर” होना अब अपने आप में मजबूत होने की निशानी हो गयी हैं। एक तरह से fiercely independent..मैं भी मानती थी। हालाँकि उस देश में बिन ब्याही माँ कोई बड़ी बात नहीं हैं, पर मजबूती का मामला तो है ही। कई celebrities हैं, जिन्होंने शादी नहीं की पर अपने motherhood को flaunt करती हैं।

पर इन सिंगल मदर्स की एक सच्चाई हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, और इस सच्चाई को ये तब तक एक्सेप्ट नहीं करेंगी आपके सामने, जब तक आप उनके दुःख-दर्द के साथी ना हो। वो सिंगल इसीलिये नहीं हैं, क्यूकी उनका सपना था अकेले ही बच्चे पालना। वो अकेले इस मातृत्व की जिम्मेदारी से जूझ रही हैं, क्यूकी उन्हें मालुम हैं की वो expect नहीं कर सकती कि कोई होगा जो उसके सुख-दुःख में साथी बनें।

ये हमारे समाज की विकृति हैं कि अब हमारी पीढ़ी के रिश्ते इस कदर छिछले हो गए हैं कि आप जिस लड़के/लड़की को डेट कर रहें हो, उससे कमिटमेंट या शादी की उम्मीद नहीं कर सकते। आप उसके साथ पार्टी कर सकते हैं, लेकिन जब शायद आप बीमार हो तो आपकी सेवा करना बोझ समझे। पर एक दूसरा पहलू भी हैं। ऐसा नहीं हैं कि लोग बुरे हो गए हैं। बस दो व्यस्को के बीच बनने वाला romantic रिश्ता अपनी अहमियत, जिम्मेदारी और जवाबदेही खोता जा रहा है।

और ऐसा होने के पीछे एक बहुत बड़ी वजह यह हैं कि हमने शादी नाम के इंस्टीट्यूट को बहुत कमजोर कर दिया हैं। लिव-इन में कोई बुराई नहीं हैं पर इसका असर नकारात्मक ज्यादा हैं। कैसे?

मेरे घर में तमाम समस्याएं हो सकती हैं, पर फिर भी मेरे पास यह ऑप्शन नहीं हैं कि मैं अपने माँ-बाप या भाई-बहन बदल कर दूसरा ले आऊँ, और इसीलिए हम अपने तमाम पारिवारिक समस्याओं को निबटाते हैं और साथ रहने की कोशिश करते हैं। पर यही सहिष्णुता दो व्यस्को के बीच खत्म होती जा रही हैं। विवाह अपने आप में ज्यादा जवाबदेही रखता हैं लिव-इन के बजाय, सामजिक और कानूनी रूप से।

साफ़ सी बात हैं कि किसी भी अविवाहित कपल के बीच भी उतने ही issues होते हैं, जितने विवाहित के बीच, लेकिन चूँकि अविवाहितों के पास liability कम होती हैं तो अक्सर प्रॉब्लम सॉल्व होने के बजाय रिश्ते टूटते हैं। Psychologically साबित बात हैं, अगर किसी रिश्ते पर सामजिक दबाव नहीं होगा तो उस रिश्ते के टूटने के चांस ज्यादा हैं, अब आप idealistic बातें लाख कर ले(प्यार की पवित्रता वाली), पर यह सच्चाई दिखती हैं।
समाज का हस्तक्षेप कम होने का एक दूसरा असर हैं, तलाक की बढ़ती दर।

यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि अब हम तलाक लेने को आजादी से जोड़ने लगे हैं। नारीवाद ने भी इस वहम को फ़ैलाने में काफी सहयोग दिया हैं। मानती हूँ मैं, कि औरतें ज्यादा पिसी हैं रिश्तों में, लेकिन इससे बचने के लिए हमें स्वस्थ रिश्तों को बनाने के तरीके ढूंढने थे। लोगों को उसके बारे में aware करना था। पर रिजल्ट यह हैं कि हमने विवाहेत्तर सम्बन्ध, one-night-stand, और जिम्मेदारी से भागने को ग्लोरिफाइ करना शुरू कर दिया।

किसी ने नहीं कहा कि इस लिव-इन से लेकर तलाक तक में औरतें ही ज्यादा पीस रही हैं और पिसेंगी। इसकी भी एक वजह हैं- सिर्फ social conditioning की बात नहीं हैं, हम औरतें biologically भी ज्यादा भावनात्मक होती हैं। तमाम लड़कियाँ जिन्हें मैं जानती हूँ, जो लड़के बदलने के लिए फेमस हैं, उनका भी अंत में natural inclination होता हैं, एक जमे हुए पारिवारिक जिंदगी की तरफ। मातृत्व भी हम औरतों के अंदर का प्राकृतिक गुण हैं, (हालाँकि इसे भी अब कमजोरी साबित करने का दौड़ चल रहा हैं)। तो अंत में जब किसी औरत की जिंदगी का यह हिस्सा कम्प्लीट नहीं होता, तो अंदर से एक असन्तुष्टि और खालीपन की भावना आती हैं। पुरुषों में भी आती हैं, क्यूकी इंसान को एक पारिवारिक जीवन चाहिए होता हैं। सौ में एक इंसान होगा जो बिना परेशान हुए बिना पार्टनर के जीने की क्षमता रखता हैं, उन्हें ideal बनाना बेवकूफी हैं।

तो फिर स्थिति यह हैं कि मेरी दोस्त की तरह पश्चिम की बहुत सी लड़कियाँ कहीं ना कहीं मजबूर हैं कि बिना जिम्मेदारी वाले रिश्ते में रहते हुए या तो वो बच्चे ही पैदा ना करें, या करें तो अपने बच्चे को अकेले पालने के लिये मानसिक रूप से तैयार रहें, या फिर बच्चा फुटबॉल की तरह कभी माँ कभी पिता के पास घूमता रहेगा। And face the fact कि आप बच्चे को लैपटॉप की तरह छह महीने इधर और छह महीने उधर नहीं रख सकते इसीलिए अक्सर ज्यादातर मामलों में आपको पिता के बजाय माँ ही बच्चे पालती दिखेगी। यह काम जितने जिम्मेदारी का हैं कि, आप भले ही इसे enjoy करें, पर तमाम stress भी आते हैं। एक सच्चाई यह भी हैं कि हममें से लगभग हर औरत अपना बच्चा अपने दम पर खुद पालने के लिए भावनात्मक रूप से capable होती हैं, पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं हैं कि हमें सपोर्ट नहीं चाहिए होता, जैसा की हम (बेवकूफी भरी बराबरी के नाम पर) खुद को ज्यादा मजबूत दिखाने की चक्कर में, जताते हैं।

बहुत जरूरी हैं कि हम शादी का महत्व बनाये रखे समाज में। कुछ अपवाद जरूर होंगे, और तलाक जैसी चीज भी होगी। लेकिन अगर आपको यह वहम हैं कि तलाक के बाद quality of life बेहतर होती हैं या इंसान liberated महसूस करता हैं तो तमाम शोध हैं इस वहम को तोड़ने के लिये। Most of the relationships can be saved, लेकिन बचते नहीं क्यूकी बचाने की इक्षा ही खत्म होती जा रही हैं। यह इक्षा बनी रहेगी, अगर समाज में शादी एक पवित्र बन्धन के रूप में एक्सेप्टेड रहेगा जिसे तोड़ना गलत हैं, और extreme condition में ही सम्भव हैं।


5 ways to accept criticism


“Any fool can criticize, condemn and complain, but it takes character and self-control to be understanding and forgiving.” ~Dale Carnegie

My fiancé can’t stand the way I drive. I, of course, do not agree with her criticism and defend my driving skills as if I am a professional formula one driver. I am not special in regards to accepting criticism. No one likes to be criticized, but it is part of my existence unless I become a hermit who lives in a cave. In the current age where criticism is only a “Yelp” away, being able to accept criticism, whether it is fair or not is both necessary and vital for growth.

Here are five easy steps to accept criticism:

1. Don’t let a knee jerk reaction make a jerk out of you
Don’t be reactive. When criticized we may want to respond with anger and defensiveness towards the person who we feel is unjustly on the attack.  It is important to learn to control these initial negative reactions so things don’t spiral out of control. Take a step back and don’t personalize the criticism. Remember, the criticism is not aimed at you but at your actions.

2. Listen
Criticism is just a form of communication with a little more spice. Perhaps the person criticizing you is not using the right words. However, they are still trying to tell you something. Perhaps, if you listen carefully you will gain insight that can make you better.

Accept that you are not perfect. We ALL make mistakes. Be open to the criticism and see it as an opportunity to grow. Don’t waste energy holding on to ill feelings about being criticized. Imagine yourself holding the criticism in the palm of your open hand. Accept it. Release it.

4. Learn
Take the criticism  that you see as negative and transform it into something constructive. The psychotherapeutic term for this is sublimation. High achievers are experts at sublimating negative feelings into positive actions. Learn to see every criticism as an opportunity to grow. Don’t forget to update the people who criticized you on your progress. Look for their eyes to light up when you tell them about the positive changes you made. Only then does it become evident that they really were just trying to help.

5. Lastly, say thank you
Once we put our ego aside, we need to remember we are actually learning the most from the people who criticize us in a constructive way.  These individuals are going out of their way and opening themselves up to a potentially verbal attack just for the sake of honest reflection. So thank them for their courage and don’t hold a grudge.Once you accept this, you may actually go out of your way to elicit criticism from others to see in what areas you can improve. Remember the next time you are criticized, you are in good company and growth can’t happen in the comfort zone! Good luck!


Let's Talk About Sex - ThatMate

We talk sex!

स्पर्श अनुभूती किंवा जाणीव ही मुलभुत जाणीव  आहे जिवंत पणाची .स्पर्शांना अर्थ आहेत जसे शब्दांना आहेत आणि शब्द जसे खोटे वापरता येतात तसे स्पर्श जर सत्याला सोडून असतील म्हणजे सच्चे नसतील काही कारणाने केले गेले असतील तर ते तितकेच निरर्थक असतात किंवा कालांतराने ठरतात निरर्थक म्हणूनच सर्वच नाती या ठिकाणी येउन एक “पारख” मागतात. जन्मतः झिडकारले गेलेल्या तान्ह्या पासून सर्व नात्यांना एक स्पर्श गंध  उणिवेचा  किंवा ती तिथे असण्याचा वावर असतो. नकळत तो समजुतीच्या जाणीवेवर राहतो पण सर्व  नात्यात राहून तो जेव्हा  “सेक्स पार्टनर “या नात्यात प्रवेश करतो तेव्हा तो काही कसोट्यांवर उतरतो.
म्हणून रंग रूप आणि सहज बाह्य  व्हायटल स्टेटस पाहून केलेला संग दर वेळी  कंम्पेटीबलं असतोच असं नाही  आणि ते नंतरच कळतं. म्हणूनच “लग्न” या नात्यात या सम समानतेच “कस ” आहे तो आपल्याला कुठेही चर्चेत पाठ्य  पुस्तकात   नसतो. प्राण्यांचे प्रजनन इतकाच विषय पौगंड अवस्थे  पर्यंत येतो तो सुद्धा  प्रजनन विषया पुरता. प्लेझर ..आनंद हा विषय जो खरं  तर  सर्वात सिग्निफीकंट आणि इथे गल्लत सुरु होते शरीर मागणी आणि बाह्य समाजातील नियम समज- गैरसमज आणि बंधनांची. मग जर नेट वर्क नसेल तर दोन लाखाचा हिरेजडीत फोन जसा निकामी ..तसेच नाते रिकामे होऊ लागते सर्व गोष्टी देऊनही .
तलाश चित्रपटात  एक संवाद आहे ”  क्या कोई पूरी तरह से खुश है?”उत्तर येतं हां कुछ पल के लिये …
तर हा जो काही “पल” असतो नि जे पकडतात ते साधतात आता हे जे सर्व क्राफ्ट आहे हे कशात साधेल  म्हणजे कुणात ते माहित नाही म्हणजे त्याचे ठोकताळे अनिर्णीत ठेवलेत विधात्याने मग शोध सुरु होतो कोरडे पणावर  ओलावा शोधण्याचा आणि मग “शब्द” जादू दाखवतात स्पर्श शक्य नाही तिथे शब्द  चालून जातात. सर्व मुलभुत भावनांची स्वीकृती जिथे जिथे लाथाडली जाईल तिथे तिथे विकृती जन्म घेईल. त्याचे बाह्य रूप असेल आजार बळजबरी  किंवा मल्टी सेक्स पार्टनर्स म्हणूनच आज सर्वात जास्त अदृश्य सोशल मिडीया वर मेसेज बॉक्सेस भरून वाहात आहेत कारण निसर्ग नागडा होऊन तिथे प्रश्न करतोय .
कुणी सेक्स देता का सेक्स? चला भेट नाही तर निदान बोलून? ..वुई टॉक  सेक्स.
संगीता शेंबेकर