The सिंगल मदर

single mom

एक अमेरिकन दोस्त से कभी बात हो रही थी। शादी नहीं की पर माँ हैं।” सिंगल मदर” होना अब अपने आप में मजबूत होने की निशानी हो गयी हैं। एक तरह से fiercely independent..मैं भी मानती थी। हालाँकि उस देश में बिन ब्याही माँ कोई बड़ी बात नहीं हैं, पर मजबूती का मामला तो है ही। कई celebrities हैं, जिन्होंने शादी नहीं की पर अपने motherhood को flaunt करती हैं।

पर इन सिंगल मदर्स की एक सच्चाई हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, और इस सच्चाई को ये तब तक एक्सेप्ट नहीं करेंगी आपके सामने, जब तक आप उनके दुःख-दर्द के साथी ना हो। वो सिंगल इसीलिये नहीं हैं, क्यूकी उनका सपना था अकेले ही बच्चे पालना। वो अकेले इस मातृत्व की जिम्मेदारी से जूझ रही हैं, क्यूकी उन्हें मालुम हैं की वो expect नहीं कर सकती कि कोई होगा जो उसके सुख-दुःख में साथी बनें।

ये हमारे समाज की विकृति हैं कि अब हमारी पीढ़ी के रिश्ते इस कदर छिछले हो गए हैं कि आप जिस लड़के/लड़की को डेट कर रहें हो, उससे कमिटमेंट या शादी की उम्मीद नहीं कर सकते। आप उसके साथ पार्टी कर सकते हैं, लेकिन जब शायद आप बीमार हो तो आपकी सेवा करना बोझ समझे। पर एक दूसरा पहलू भी हैं। ऐसा नहीं हैं कि लोग बुरे हो गए हैं। बस दो व्यस्को के बीच बनने वाला romantic रिश्ता अपनी अहमियत, जिम्मेदारी और जवाबदेही खोता जा रहा है।

और ऐसा होने के पीछे एक बहुत बड़ी वजह यह हैं कि हमने शादी नाम के इंस्टीट्यूट को बहुत कमजोर कर दिया हैं। लिव-इन में कोई बुराई नहीं हैं पर इसका असर नकारात्मक ज्यादा हैं। कैसे?

मेरे घर में तमाम समस्याएं हो सकती हैं, पर फिर भी मेरे पास यह ऑप्शन नहीं हैं कि मैं अपने माँ-बाप या भाई-बहन बदल कर दूसरा ले आऊँ, और इसीलिए हम अपने तमाम पारिवारिक समस्याओं को निबटाते हैं और साथ रहने की कोशिश करते हैं। पर यही सहिष्णुता दो व्यस्को के बीच खत्म होती जा रही हैं। विवाह अपने आप में ज्यादा जवाबदेही रखता हैं लिव-इन के बजाय, सामजिक और कानूनी रूप से।

साफ़ सी बात हैं कि किसी भी अविवाहित कपल के बीच भी उतने ही issues होते हैं, जितने विवाहित के बीच, लेकिन चूँकि अविवाहितों के पास liability कम होती हैं तो अक्सर प्रॉब्लम सॉल्व होने के बजाय रिश्ते टूटते हैं। Psychologically साबित बात हैं, अगर किसी रिश्ते पर सामजिक दबाव नहीं होगा तो उस रिश्ते के टूटने के चांस ज्यादा हैं, अब आप idealistic बातें लाख कर ले(प्यार की पवित्रता वाली), पर यह सच्चाई दिखती हैं।
समाज का हस्तक्षेप कम होने का एक दूसरा असर हैं, तलाक की बढ़ती दर।

यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि अब हम तलाक लेने को आजादी से जोड़ने लगे हैं। नारीवाद ने भी इस वहम को फ़ैलाने में काफी सहयोग दिया हैं। मानती हूँ मैं, कि औरतें ज्यादा पिसी हैं रिश्तों में, लेकिन इससे बचने के लिए हमें स्वस्थ रिश्तों को बनाने के तरीके ढूंढने थे। लोगों को उसके बारे में aware करना था। पर रिजल्ट यह हैं कि हमने विवाहेत्तर सम्बन्ध, one-night-stand, और जिम्मेदारी से भागने को ग्लोरिफाइ करना शुरू कर दिया।

किसी ने नहीं कहा कि इस लिव-इन से लेकर तलाक तक में औरतें ही ज्यादा पीस रही हैं और पिसेंगी। इसकी भी एक वजह हैं- सिर्फ social conditioning की बात नहीं हैं, हम औरतें biologically भी ज्यादा भावनात्मक होती हैं। तमाम लड़कियाँ जिन्हें मैं जानती हूँ, जो लड़के बदलने के लिए फेमस हैं, उनका भी अंत में natural inclination होता हैं, एक जमे हुए पारिवारिक जिंदगी की तरफ। मातृत्व भी हम औरतों के अंदर का प्राकृतिक गुण हैं, (हालाँकि इसे भी अब कमजोरी साबित करने का दौड़ चल रहा हैं)। तो अंत में जब किसी औरत की जिंदगी का यह हिस्सा कम्प्लीट नहीं होता, तो अंदर से एक असन्तुष्टि और खालीपन की भावना आती हैं। पुरुषों में भी आती हैं, क्यूकी इंसान को एक पारिवारिक जीवन चाहिए होता हैं। सौ में एक इंसान होगा जो बिना परेशान हुए बिना पार्टनर के जीने की क्षमता रखता हैं, उन्हें ideal बनाना बेवकूफी हैं।

तो फिर स्थिति यह हैं कि मेरी दोस्त की तरह पश्चिम की बहुत सी लड़कियाँ कहीं ना कहीं मजबूर हैं कि बिना जिम्मेदारी वाले रिश्ते में रहते हुए या तो वो बच्चे ही पैदा ना करें, या करें तो अपने बच्चे को अकेले पालने के लिये मानसिक रूप से तैयार रहें, या फिर बच्चा फुटबॉल की तरह कभी माँ कभी पिता के पास घूमता रहेगा। And face the fact कि आप बच्चे को लैपटॉप की तरह छह महीने इधर और छह महीने उधर नहीं रख सकते इसीलिए अक्सर ज्यादातर मामलों में आपको पिता के बजाय माँ ही बच्चे पालती दिखेगी। यह काम जितने जिम्मेदारी का हैं कि, आप भले ही इसे enjoy करें, पर तमाम stress भी आते हैं। एक सच्चाई यह भी हैं कि हममें से लगभग हर औरत अपना बच्चा अपने दम पर खुद पालने के लिए भावनात्मक रूप से capable होती हैं, पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं हैं कि हमें सपोर्ट नहीं चाहिए होता, जैसा की हम (बेवकूफी भरी बराबरी के नाम पर) खुद को ज्यादा मजबूत दिखाने की चक्कर में, जताते हैं।

बहुत जरूरी हैं कि हम शादी का महत्व बनाये रखे समाज में। कुछ अपवाद जरूर होंगे, और तलाक जैसी चीज भी होगी। लेकिन अगर आपको यह वहम हैं कि तलाक के बाद quality of life बेहतर होती हैं या इंसान liberated महसूस करता हैं तो तमाम शोध हैं इस वहम को तोड़ने के लिये। Most of the relationships can be saved, लेकिन बचते नहीं क्यूकी बचाने की इक्षा ही खत्म होती जा रही हैं। यह इक्षा बनी रहेगी, अगर समाज में शादी एक पवित्र बन्धन के रूप में एक्सेप्टेड रहेगा जिसे तोड़ना गलत हैं, और extreme condition में ही सम्भव हैं।

Megha

3 comments

  • आपने बहुत अच्छा लिखा है समाज को सही आईना दिखाने की कोशिश।

  • शादी को पवित्र बन्धन मानने वाली बात बिलकुल सही है। हमारे पुराने समाज में इन सभी बातों को धार्मिक रूप से हमारे दैनिक जीवन में जोड़ा गया था ताकि हम आज की तरह विवाह जैसी चीजों को तर्क से न जोड़कर आस्था और विश्वास से जोड़ कर रखते लेकिन आजकल ठीक उल्टा हो रहा है। लड़के लड़कियां विवाह को निभाने की बजाय तलाक लेने को ज्यादा उत्सुक दिखाई देते हैं। इसकी एक प्रमुख वजह यही है कि हमने हर चीज को भौतिक रूप से देखना शुरू कर दिया है। कुछ नारीवादी तलाक को नारी की स्वतन्त्रता घोषित करने में लगे हुए हैं जो कि निः संदेह समाज को गर्त में ले जाने वाला घातक कदम है।

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