Depression Let’s Talk 2

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हर रोज़ की तरह मैं सूरज को एक पहर का इंतज़ार करा रहा था, चिढ़ के कभी उगना बंद ना कर दे ये। रातें जब देर से हों तो सुबहें लाज़िमी सुस्त हो जाती है। मैं शाम की बात अब वापस अपने सिस्टम में रिप्ले कर रहा था कि घर की घण्टी बजी। मम्मी ने जाके देखा तो मुझसे कहा
“देखो, रवि आया है”
“अभी!!” अपने आंख की कांची को हटाते हुए मैं हक्का बक्का रह गया था।

थोड़े और कपङे पहनके मैं जो उससे मिलने गया, सरप्राइज का सिलसिला थमा नही था। दाढ़ी बढ़ा ली थी उसने और शरीर झुलसा हुआ था। सड़क पे दिखता तो शायद पहचान भी नही पाता मैं। चाय कॉफ़ी के बाद मैंने पूछा
“कल क्या हुआ था”
“मैंने उसी वक़्त नींन्द की गोलियां खायी थी”
“क्या….” इस ताज़े झटके को हंसी को शक्ल देता हुआ मैं बोल पड़ा।
“डॉक्टर कहते हैं कि क्लीनिकल डिप्रेशन है मुझे” उसकी बेरुखी जवाबो में जारी रही।
“हुआ क्या है” मैंने सम्भलते हुए पूछा।
“हुआ कुछ नही, बस कुछ अच्छा नही लगता। कभी तुरत में बहुत अच्छा लगता है फिर वही रूखा सूखा सा सब। ज़िंदगी के सारे ब्रेक्स फेल से हो गए हैं… क्या कर रहा हूँ, समझ नही आता मुझे”

“आह, सब ठीक हो जाएगा, कुछ नही हुआ तुझे, सब दिमाग का झोल है तेरे” मैंने उसके कंधे पे हाथ रखते हुए कहा।

उसने मेरा हाथ झटक दिया और बोला
” ये तो और बड़ी समस्या है। किसीको बताओ तो बीमारी ही नही मानते, लगता है जैसे मैं बहाने कर रहा हूँ। यार, पागल नही हूँ मैं, बीमार हूँ बस। एक साल हो गए रात को नींन्द आये हुए ढंग से। पढ़ाई करने बैठू तो आधे घण्टे से ज्यादा मन नही लगता, दिमाग जैसे पीछे हटने लगता है, खाना अच्छा नही लगता, जीना अच्छा नही लगता। लगता है मेरे जीने का तरीका ही गलत था, दौड़ना चाहिए था मुझे भी सबकी तरह, तुम्हारी तरह। कम से कम उस धुन में खुद से रिश्ता तो नही टूटता मेरा।” उसकी आँखों मे पहले जो गुस्सा था अब वो धीरे धीरे आंसुओं में बदल रहा था।

उसने बोलना जारी रखा
” ये साला सबको खुश करने के चक्कर में मैंने समझौते करने शुरू किए, अब जब ज़िंदगी की नाव कही पहुच नही रही तो ना वो खुश है ना हम। शायद ज़िंदगी की नाकामी है, या फिर ये अकेलापन, कोई कम्बखत बीमारी है या फिर बस दिल्लगी है खुदा की, परेशान हो गया हूँ मैं, खुद से और सबसे।” उसकी खीझ माहौल को बहुत गंभीर बना रही थी।

मैं, क्या ही बोलता, ऐसे बातचीत, मौकों के लिए जिन ट्रेनिंग की जरूरत होती है, उसमे बहुत खराब था मैं। मैं सुन रहा था बस चुप, गुमसुम। उसके जज़्बात कभी ऐसे खुल्ले देखे नही थे मैंने।

“अब चलता हूँ, इतनी सी ही बात कहनी थी। अच्छा लग रहा है अब” उसने चाय का आधा कप टेबल पे रखते हुए कहा।

“बैठ, थोड़ी देर” मैने सकुचाते हुए कहा।
“ना, लगता है आज से डॉक्टर की दवा काम करने लगेगी। महीनों में पहली बार किसी से बात करके अच्छा लग रहा है, ऐसे तो बस कोफ्त होती है लोगो से मिलके। जाने से पहले मिलके जियो तू” वो निकल चुका था कमरे से मेरे।

अगले एक महीने मैं हर दूसरे दिन उसके घर जाता रहा। हम घण्टो बातचीत किया करते। कभी खिड़की वाली लड़की के बारे में तो फिर कभी डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में। कभी चीन की ग्रोथ डिस्कस करते तो कभी अपने माँ बाप को मन भर सुनाते। दुनिया के इस छोड़ से उस वाले छोड़ तक कि बातें। वो अब बेहतर हो रहा था और उसके साथ साथ मैं भी। डॉक्टर की दवा असर कर रही थी शायद। जो आखिरी दिन मैं उसके घर पे गया था, तो वो बिल्कुल खामोश था। आधे घण्टे के बाद उसने बस एक लाइन कही थी, बस एक लाइन।

2 हफ्ते हो गए मुझे अपनी दुनिया मे वापस आये हुए। कभी कभी उसका ख्याल भी आ जाता था मुझे तो “वो ठीक होगा” ये सुकून हुआ करता। लेकिन आज सुबह उसके भाई का फोन आया था
“रवि फिर से उसी हालत में है” मैं तड़प गया था।

उसकी वो आखिरी लाइन याद आ गयी थी
“कोई दवा नही है जो ठीक कर रही मुझे। तेरे साथ था तो खुल रहा था, तेरे जाने के बाद वही जज़्बात कुरेद देंगे फिरसे मुझे, मैं फिरसे वही हो जाऊंगा। तू मत जा, प्लीज”

पेट की भूख ऐसे कई “इम्प्रक्टिकल” आग्रहों को रौंद देती है, बरबस।

Kumar Priyadarshi

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