The eunuch!

Laxmi_Narayan_Tripathi_at_JLF_Melbourne_presented_by_Melbourne_Writers_Festival,_Federation_Square,_Melbourne_2017

बात इतनी कुछ ख़ास नहीं थी लेकिन आज ये बात बहुत ख़ास सी लग रही है।बात 21 मार्च 2016 की है,मैं प्रतापगढ़ से दिल्ली वापिस आने के लिए पद्मावत एक्सप्रेस में बैठी थी।थक कर चूर थी क्योंकि उसी सुबह मैं पूरे बारह घंटे की यात्रा के बाद प्रतापगढ़ पहुंची थी और उसी शाम मुझे दिल्ली के लिये वापिस यात्रा करनी थी।प्रातपगढ़ में 8 घंटे रहने पर भी मुझे खाना खाने का समय नहीं मिला और बिना कुछ खाये ही वापसी हुई।साथ में कुछ फल (सेब, अंगूर, संतरे,अनार)थे जो कि बुआ जी ने दिए थे।मैं अपनी सीट पर बैठी उन्हें खा रही थी। एक बेहद बुलंद सी आवाज़ आई “ला राजा, निकाल बाबू” मेरे लिए बेहद अनोखी बात थी ये।मैं थोड़ा झुककर देखने लगी।पता चला कि कोई किन्नर है जो लोगों (यात्रियों) से पैसे मांग रही है।शायद ये मेरे अब तक के जीवन में देखी गयी सबसे सुन्दर किन्नर थी।गज़ब का आकर्षण था उनमे।गेहुंए रंग की थी वो, उनके सफ़ेद सूती कुरते पर सफ़ेद मोतियों से हुई कारीगरी और प्लाजो,सफ़ेद फ्लैट चप्पल,कान में बड़ी बड़ी सिल्वर बालियां, रिबाउंडिंग किये हुए बाल, गले में मोती की माला और हाथ में एक क्लच, बाप रे उनके आगे अच्छी से अच्छी सुंदरियाँ भी लज्जा खाएं।वो मेरे सामने खड़ी थी, मुझसे रहा नहीं गया और जैसे ही मेरी और उनकी नज़र एक हुई मैं बोल पड़ी “आप बहुत सुन्दर हो” जवाब में उन्होंने कहा “थैंक यू” मैंने कहा “सेब खायेंगी?” उन्होंने कहा “न, तू खा” मैंने कहा “लीजिये न” उन्होंने सेब लिए, मैं थोड़ा सरकी और उनको बैठने का इशारा किया वो बैठी।फिर मैंने कहा “आपका सूट बहुत प्यारा है” वो हंसी, मुस्कुराती रही, मैंने कहा “संतरा भी लीजिये” उन्होंने कहा “न गुड़िया, तू खा, अपन को कौन ऐसे कुछ खाने को पूछता है? तूने प्यार से सेब खिलाया, चार बात की, तू बहुत तरक्की कर…..” इसी तरह की शुभकामनाएं करती, मुझे आशीर्वाद देती वो उठी और फिर चली गयी। पिताजी मुझे घूर रहे थे, मेरा ये व्यवहार उनके लिए सरलता से हज़म कर लेने वाला नहीं था। आज जब मम्मी से इस बारे में ज़िक्र कर रही थी तो उनकी (किन्नर) बातों में छुपी वेदना महसूस हो रही है, कि कोई उन्हें वो सम्मान नहीं देता जिस सम्मान का हक़दार हर मनुष्य हर जीव है। मानवीय व्यवहार के नियमानुसार ये बातें बेहद सामान्य सी हैं किसीको भोजन और पानी के लिए पूछना, किसीकी प्रसंशा करना, किसी के साथ प्रेम से बात करना।लेकिन हमारे ही व्यवहार की कठोरता ने इस सामान्य व्यवहार को भी कितनी विशिष्ट श्रेणी का बना दिया है।

Medini Pandey

4 comments

  • नमस्ते बात 2010 की है। हम लोग सुल्तानपुर से एस एफ आई की दिल्ली रैली में शामिल होने के लिए जा रहे थे। ट्रेन निहालगढ स्टेशन पे जैसे ही रुकी 2 बच्चों को उस किन्नर ने ऐसे धकेला कि सामने आ रही मालगाड़ी के नीचे आते-2 बचे। ऐसे में कितना पब्लिक उनकी इज्जत करे। यात्रियों से तो आए दिन मारपीट उनका धन्धा है।

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