Try this with your parents!

सालों पहले Art of living के युथ कैम्प में गयी थी। श्री श्री रविशंकर आपको पसन्द-नापसन्द हो सकते हैं, पर उनके कैम्प बहुत अच्छे होते हैं (अगर आप सीखना चाहे तो)। काफी मजेदार अनुभव था। हमें रोज कुछ छोटी-मोटी एक्टिविटीज़ करवाई जाती। एक दिन वहाँ के गुरु जी ने कहा की तुम लोग आज जब घर जाओ तो पापा-म्मी से प्यार जताना। उनसे वो तीन जादुई शब्द कहना।

चूँकि मैं अपने घर बात करने के बाद फोन रखते हुए अक्सर कह देती हूँ, तो मुझे नहीं लगा था कि यह कोई अजूबा बात हैं। पर अगले दिन ज्यादातर बच्चों ने इस काम को कम्प्लीट नहीं किया था। कुछ झिझक, कुछ शर्म, कुछ डर की वजह से। गुरु जी ने सबको समझाया, convince किया। फिर बच्चों से कहा कि वो अभी घर पर फोन लगाये और अपने माता-पिता से प्यार से बात करने की कोशिश करें।

पहला लड़का आया उसने फोन किया। दो मिनट इधर-उधर की बातें की और फोन रखने से पहले कहा,” Papa I love you.” उधर एक लम्बीइइइइ ख़ामोशी थी। फिर रिप्लाई आया,” सब ठीक हैं? क्या हुआ? बताओ?”
उस लड़के को पाँच मिनट और लगे यह समझाने में कि वह सिर्फ प्यार जता रहा हैं, उसे नई बाइक या आईफोन नहीं चाहिए।

दूसरी लड़की आयी। बहुत झिझकते हुए। उसने माँ को फोन किया।बताया कि वह घर को मिस कर रही हैं और फिर बोल दिए वो तिन शब्द। उधर से माँ ने चीख मारी “तुम कुछ उल्टा-सीधा करने का तो नहीं सोच रही? ऐसे क्यू बोल रही हो?”। खैर गुरूजी के खासी मसक्कत के बाद माँ मान गयी कि उनकी लाडली के जान पर कोई खतरा नहीं हैं। पर बहरहाल इतने हल्ले-हंगामे के बाद इस प्यार- जताऊँ- मिशन को रद्द कर दिया गया।

जब हम भारतीय परिवारों को देखते हैं, तो नजर आता हैं कि हममें expressionless प्यार अच्छा-ख़ासा होता हैं। हमारे नजर में अभिव्यक्ति के मायने ज्यादा नहीं रहें हैं। बाप ने रिजल्ट देख कर कंटाप मार दिया और माँ ने सुबह-सुबह रजाई खींच कर गरिया दिया, माने परिवार प्रेम-मुहब्बत से भरा-पूरा हैं। हमारे परिवारों की जो सबसे बड़ी खासियत रही हैं, वह हैं जिम्मेदारी और जवाबदेही। बेहद जरूरी चीजे हैं। इसी दो गुणों के बल पर ही अक्सर एक ठेठ भारतीय दिमाग, परिवार और रिश्तों के मामले में पश्चिम को नीच, कमीना,ओछा मानता हैं। हमारे लिए प्यार is more about actions less about expressions..सही भी हैं, लेकिन इसका एक बहुत सीधा नकारात्मक असर हैं- बच्चों और अभिवावकों के बीच communication gap..

हममें से ज्यादातर बच्चे अपने पैरेंट्स से बहुत से विषयों पर बात नहीं कर पातें। बहुत चांस हैं कि आप उसी जमात का हिस्सा होंगे जो कभी ना कभी अपनी परेशानी में अकेले घुटा हो, या दोस्तों के पास गया हो। यह कम्युनिकेशन गैप आज से पचास साल पहले ज्यादा परेशान करने वाली चीज नहीं थी, पर आज है। क्यू? क्यूकी आज आपके बच्चे पर खतरा ज्यादा हैं। आज एक हाई स्कुल के बच्चे की anxity level उतनी ही हैं जितनी 1950 में एक schizophrenia के मरीज की होती थी। आज आपके बच्चे के ऐसे दोस्त एक क्लिक के साथ बनते हैं, जो ड्रग्स लेते हो। आज आपके बच्चे को कोई हजारों मील दूर बैठ कर परेशान करने की ताकत रखता है।

अक्सर जब कोई परेशान बच्चा अकेले क्लीनिक आता है, तो एक dilogue सुनने मिलता हैं,”Don’t tell my parents.” समस्या कितनी भी बड़ी हो, बस माँ-बाप तक ना जाये। तो प्यार ना जता पाना तभी तक सफल है, जब तक आपके बच्चे की जिंदगी में सब हरा-हरा हैं। वरना जो बच्ची आपसे एक “I love u” कहने में झिझकती है, वह क्या ख़ाक बतायेगी आकर कि उसका बॉयफ्रेंड उसे ब्लैकमेल कर रहा है।
समय के साथ आपको संस्कृति की कुछ चीजें बदलनी पड़ेगी, और बदलनी भी चाहिए।

Megha Maitrey

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