Let’s talk on Postpartum Depression

दुनिया के दो सबसे celebrated शब्द हैं ‘मां’ और ‘प्यार’..ज्यादातर लोगों के लिए आपस में पर्यायवाची जैसे..मातृत्व पर हमने बहुत कुछ लिख-पढ़ डाला पर अपने बच्चों के लिए फूल सी कोमल और उसपर आये खतरों के लिए चंडी से ज्यादा खतरनाक माँ शब्दों से शायद परे ही रहेगी..लेकिन माँ को भगवान का दर्जा देते और मदर्स डे पर उनके साथ फोटो खिंचवाते हुए हम मातृत्व से जुडी एक बड़ी समस्या पर ध्यान देना भूल गये- postpartum depression(PPD)..

डेलिवरी के कुछ दिनों बाद शुरू होने वाला यह डिप्रेशन माँ के स्वास्थ और बच्चे के साथ उसके रिश्ते पर काफी बुरा असर डाल सकता है.. हालांकि बच्चे पैदा होने के बाद postpartum baby blues बहुत common हैं , जिसमे मुड स्विंग, तनाव, नींद और भूख आदि में समस्या होती है..अक्सर कुछ दिनों बाद यह समस्या अपने आप खत्म भी हो जाती है पर औरतों की एक अच्छी- खासी तादाद हैं जिनमें यह समस्या डिप्रेसन का रूप ले लेती हैं. हमारे देश में नेशनल मेंटल हेल्थ के सर्वे के अनुसार हर दस में दो मां PPD से गुजरती हैं..

समस्या की जटिलता और बढ़ जाती हैं क्यूकी लोग PPD के विषय में बहुत कम जानकारी रखते हैं..स्वभाविक हैं कि कोई भी मां इस बात को एक्सेप्ट नहीं करना चाहेगी की उसे उसका नवजात बच्चा अच्छा नहीं लग रहा..वह उसे दूध नहीं पिलाना चाहती, उसका ख्याल नहीं रखना चाहती या अपने मातृत्व से बिलकुल खुश नहीं हैं..”भगवान” और ”जननी” का टैग लगाये एक औरत यह सच्चाई ना तो कहने की हिम्मत रखती है और ना ही समाज सूनने की धैर्य और परिपक्वता रखता है..नतीजा यह हैं कि वह तनाव और आत्मग्लानि के बीच फंस जाती है..

अमेरिका जैसे देश में एक साल से कम उम्र के बच्चों के मर्डर के पीछे बड़ी वजह है यह और भारत जैसे देश में हम अखबारों में ” मां ने की नवजात के साथ क्रूरता” या ” कलयुगी मां” जैसी हेडलाइंस पढ़ कर मां को कोस कर भूल जाते हैं.. कोई जानने की कोशिश नहीं करता की शायद वह औरत अपने होर्मोनल और जिन्दगी के इस बदलाव को झेल ही नहीं पायी..शायद उसे सही समय पर मेडिकल मदद मिल गयी होती तो ऐसी घटना होती ही नहीं..समस्या इतनी व्यापक होने के बावजूद हमारे देश में माओं के लिए चलाये गये विभिन्न स्वास्थ कार्यक्रमों में PPD से बचाव या इलाज का जिक्र भी नहीं होता..

हमारी हर सोच के पीछे केमिकल्स होते हैं.. ऐसे में होरमोन्स का इतना उतार- चढ़ाव एक इन्सान को कितना प्रभावित कर सकता हैं इसका एक बड़ा उदाहरण है कि दुनियाभर में औरतों की सबसे ज्यादा आत्महत्यायें पीरियड्स के टाइम पर होती हैं..

समाज का ताना- बाना भी PPD के केस को और खराब कर रहा हैं.. पहले संयुक्त परिवार ज्यादा थे और नवजात की की देखभाल दादी- नानी, फूफी- भाभी सब बड़े प्यार से करती थी पर अब न्यूक्लियर परिवार ने माँओं से यह राहत भी छिन ली हैं..कई बार बेटा पैदा ना कर पाने का अफ़सोस और दबाव भी हमारे देश की औरतों पर होता हैं जोकि उसके डेलिवरी के बाद के समय को और मुश्किल बना देता है..

अगर हम थोड़े से जागरूक हो तो हर साल PPD की शिकार होने वालीं हमारे देश की करीब एक करोड़ माओं के लिए मातृत्व सच में सुखद एहसास बनेगा ना की अकेले चुपचाप घुटने वाली समस्या..

Megha Maitrey

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