Menstruation and Women

ऋषि पंचमी व्रत के अनुसार “शास्त्रों में लिखा है कि रजस्वला स्त्री पहले दिन चंडालिनी, दूसरे दिन ब्रह्म हत्यारनी, तीसरे दिन पवित्र धोबिन के समान होती है।” ये कौन से शास्त्र हैं जो स्त्री को उपरोक्त उपमाएं देकर उसका अपमान कर रहे हैं? क्या है ऋषि पंचमी व्रत और इसका उद्देश्य क्या है? वास्तव में हिन्दू धर्म में वर्णित ऋषि पंचमी व्रत का उद्देश्य है मासिक धर्म के समय स्त्री पर लगे पाप से छुटकारा पाना, ये व्रत स्त्रियों द्वारा भाद्रपद शुक्ल पक्ष पंचमी को किया जाता है। 21वीं सदी में रजोधर्म को पाप-पुण्य से जोड़ना कितना पिछड़ा और अप्रासंगिक लगता है लेकिन वास्तविकता ये है कि अधिकांश भारतीय समाज में आज भी ऐसी रूढ़िवादी परम्पराओं का बड़ी निष्ठा से पालन किया जाता है। उन परम्पराओं में सभी बातें पूर्णतः नकारात्मक नहीं हैं। कुछेक बातें स्त्री, स्वास्थ्य या आराम से सम्बंधित भी हैं।

PMS1

उदाहरण के लिए हम ऋषि पंचमी व्रत कथा को लेते हैं जिसका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है- “एक समय विदर्भ देश में एक ब्राह्मण अपनी स्त्री तथा पुत्र-पुत्री के साथ रहता था। पुत्री विधवा थी। एक बार वह एक शिला पर लेटी आराम कर रही थी कि उसके शरीर में कीड़े पड़ गए। यह सब ब्राह्मण ने देखा और इसका कारण पता लगाया तो ज्ञात हुआ कि पूर्व जन्म में इसने रजस्वला होते हुए भी घर के बर्तन आदि छू कर पाप किया था।” यह कथा भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी। जो स्त्री रजस्वला होते हुए भी घर के काम करती है वो नरक को जाती है। पूर्व जन्म में वृजासुर का वध करने के कारण इन्द्र को ब्रह्म हत्या का महान पाप लगा था। उस समय ब्रह्मा जी ने उस पर कृपा करके उस पाप को चार स्थानों में बांट दिया था यथा- यथा अग्नि (धूम से मिश्रित प्रथम ज्वाला), नदियों (वर्षाकाल के पंकिल जल), पर्वतों (जहाँ गोंद वाले वृक्ष उगते हैं) में तथा स्त्रियों (रजस्वला) में। अत: मासिक धर्म के समय लगे पाप से छुटकारा पाने के लिए यह व्रत स्त्रियों द्वारा किया जाना चाहिए। इस कहानी में हमें एक सकारात्मक बात यह देखने को मिलती है कि संभवतः ये परम्पराएं स्त्री के स्वास्थ्य व आराम को ध्यान में रखते हुए बनाई गयी होंगी, जिसमे स्त्रियों को शारीरिक कार्य करना वर्जित था। किन्तु साथ ही एक नकारात्मक बात यह भी उभर कर आती है कि स्त्री स्वास्थ्य को पाप-पुण्य से क्यों जोड़ा जाए? किसी जैविक प्रकिया को धार्मिक क्यों बनाया जाए?

PMS2

स्त्रियां आज भी इन्हीं दकियानूसी परम्पराओं से मुक्ति पाने के लिए संघर्षरत हैं। इसका एक उदाहरण स्त्रियों का शनि मंदिर में प्रवेश को लेकर संघर्ष था। वास्तव में ये संघर्ष किसी पूजा पाठ से कम सम्बद्ध था और नज़दीकी से ये इस बात से सम्बद्ध था कि एक हेल्थ हाईजीन का मुद्दा स्त्रियों को गुलाम बनाने की वजह क्यों बन रहा है? किसी स्थान पर प्रवेश को निषिद्ध करने का कारण क्यों बन रहा है? इसीलिए ये संघर्ष सटीक भी था। हमें ऐसी सभी रूढ़ियों का विरोध करना होगा, आज़ादी चाहिए ऐसी सभी रूढ़िवादी और बेतुकी परम्पराओं से। निर्माण करना होगा एक ऐसे समाज का जिसमें सभी को मासिक धर्म से सम्बंधित आवश्यक बातों से अवगत कराया जाए, इसे स्वास्थ्य से ही जोड़ कर देखा जाए। इसे हव्वा बनाकर रखने के बजाय इसपर खुलकर बातचीत की जाए।

साभार – मेदिनी पाण्डेय

Disposing used Sanitary Napkins

The-inconvenient-truth-of-sanitary-pad-disposal.jpg

One of the ‘Ewww” things ..

But one of the distinct things in her life.

One of the things which is treated casually.

One of the things contaminating the health and nature.

I don’t know who invented Sanitary napkins. But definitely it created a great advancement in her life. It helps the women to be sanitized during her period time. It made her lives much easier. It has become a part of her life. But what about the used napkins? How long it could be hygienic..? Used napkins contain pathogens and microorganisms which is very very dangerous if not treated properly.

She uses and throws it in a dustbin or burns it or disposes it somewhere away from her home. She can’t be blamed as there are no other options with her. While we are living in a technologically advanced world, why are there no cost effective inventions to help her in the disposal of used napkins or tampons? After all who is bothered if she is affected with some Toxic shock syndrome with the usage of tampons?

The wrong disposal methods are having a huge impact on our health and environment. Still why is there least attention paid..? Every woman will think at least once before disposing it.  Definitely she is worried on the hands collecting the garbage if thrown in a dustbin.

What happens to these millions of toxic content in the napkins after disposal.. Why the authorities are least bothered on the plastic polymers released into the environment day by day? Definitely they are not fully biodegradable things.

Incineration is another solution. i.e burning under 800 degree C or even higher.  Still what about the harmful gases released via these incinerators or feminine hygiene disposal bin? And moreover do all these incinerators work under this expected high temperature?

I know, these are just open ended questions…..  Still hope for a solution.

What all we can do is just ensure that discarded products are self-contained, thoroughly wrapped in properly fitting biodegradable bags. Thus safeguard the cleaning staff from pathogenic things by minimizing the risk of contact with blood stained items.

Source: https://wordsandnotion.wordpress.com

मेनोपॉज

menopause2

वयाच्या 45-50च्या आसपास कधी कधी त्याहीनंतर स्त्रीचं पाळीचक्र थांबतं. याचं साधं कारण म्हणजे बीजकोषात बीजं तयार होणं थांबतं. प्रोजस्टेरॉनची निर्मिती पूर्णपणे थांबते. थोड्या फार प्रमाणात इस्ट्रोजन मात्र तयार होत राहतं.

पाळी जाण्याचा काळ काही महिने ते काही वर्षं इतका असू शकतो. शेवटच्या मासिक चक्राच्या आधीचा आणि नंतरचा काळ म्हणजे पाळी जाण्याचा काळ. पाळी जाण्याआधी काही वर्षं ती अनियमित होऊ शकते. काही जणींची पाळी चक्रं लहान होऊ लागतात तर काही जणींच्या दोन चक्रात बरंच अंतर पडतं. काही जणींचे पाळीचे दिवस आणि रक्तस्राव कमी होतो तर काही जणींना जास्त दिवस, गाठीयुक्त आणि जास्त रक्तस्राव होऊ शकतो. या काळात सलग एक वर्ष पाळी आली नाही तर पाळी गेली असं समजायला हरकत नाही.

मेनोपॉज (पाळी जाणे) – मेनोपॉज म्हणजे पाळी जाणे. ही बाईच्या शरीरात होणारी एक नैसर्गिक प्रक्रिया आहे. सलग 1 वर्ष बाईला पाळी आली नाही तर तिची पाळी गेली असं समजलं जातं. पाळी जाण्याच्या प्रक्रियेचे दोन मुख्य टप्पे आहेत.

प्री मेनोपॉज – पाळी जाण्याच्या आधीचा काळ – पाळी पूर्णपणे जाण्याच्या आधीचा हा काळ आहे. हा काळ 2 ते 10 वर्षं असा कितीही असू शकतो. या काळामध्ये स्त्रीच्या शरीरात इस्ट्रोजन आणि प्रोजेस्ट्रॉन ही संप्रेरकं कमी प्रमाणात तयार व्हायला लागतात. वयाच्या 45 ते 55 या काळात ही प्रक्रिया घडू शकते. या काळात संप्रेरकांचं संतुलन मोठ्या प्रमाणावर बिघडतं.

पोस्ट मेनोपॉज – पाळी गेल्यानंतरचा काळ –  पाळी थांबल्यानंतर शरीर जेव्हा संप्रेरकांच्या बदललेल्या स्थितीशी सामावून घेते तो हा काळ आहे.

पाळी जाण्याच्या काळात इस्ट्रोजनच्या पातळीत होणाऱ्या बदलांमुळे शरीरातून गरम वाफा येणं, घाम फुटणं, योनीतील ओलसरपणा आणि लवचिकपणा कमी होणं असे बदल होतात. रक्तदाब वाढणं, हृदयविकार आणि हाडं ठिसूळ होण्यासारखे आजार होण्याची शक्यता वाढते.

हे बदल समजून घेणं गरजेचं आहे कारण त्यांचा आपल्या शरीरावर, भावभावनांवर परिणाम होत असतो. त्याचप्रमाणे लैंगिक इच्छा आणि भावनाही त्यानुसार बदलत असतात. हे बदल आणि स्थित्यंतरं समजून घेणं हा शरीर साक्षरतेचा महत्त्वाचा भाग आहे.

Source: http://letstalksexuality.com/menopause/

In conversation with Suhani Mohan

Women are now claiming equality in every aspect which should have been there from the beginning itself. Be it in any field, initiatives for betterment of women are taking place, and we are pretty sure 100 years from now this moment in our history will be the pivotal milestone that changed the society making lives of women better everywhere in the world. Be it U.N.’s “HeForShe” initiative led By Emma Watson, or the activist for education of women Malala Yousafzai, or the initiative close to home by Suhani Mohan in the form of “Saral designs” to eradicate poor menstrual hygiene from India. This indeed will be the moment that will leave a mark for future generations as the time when all changed.

We got a chance for a tete-e-tete with the ever inspiring Suhani Mohan:

Q. As we know the work you are doing is one of a kind, so is the name of your company “Saral”. What exactly was the etymology behind it?

Suhani: ‘Saral’ means simple. Fundamentally, we believe that solutions we offer have to be simple in order for them to be widely adopted. Simple solutions often have the most sustained impact.

Q. What was the main factor for you to launch this venture?

Suhani: Back in 2012, while I was working as an investment banker, I had a chance to meet Mr. Anshu Gupta from Goonj. He described how women in rural India use newspapers, rags and other unhygienic methods during their menstruation. I felt deeply ashamed. It had never crossed my mind that when I spend Rs100/month to manage my menstruation, how would a woman, whose entire family’s earning is lesser than Rs1000/month, manage hers. This was when I decided that I must give my fullest to something I believe in and be the change I wish to see.

Q. The Saral designs have chosen a rather specifically taboo topic & especially in this patriarchal society seen throughout most of India, How do you plan to tackle these socio-cultural problems & propogate the idea of menstrual hygiene?

Suhani: The fact that we live in a patriarchal society where basic hygiene is not accessible to women is the reason why we are doing what we are doing. With health and hygiene, there is a strong need to create awareness along with access to quality products. Some taboos have been there for centuries and we are cognizant of the fact that instigating behavior change is a slow process.

We have observed that adoloscent girls are more receptive to learning new things. So, in partnerships with NGOs, we conduct awareness sessions in schools covering the science behind menstruation with emphasis on it being a natural biological process, hygiene and disposal practices. We also install sanitary napkin vending machine in schools as a follow up to these sessions.

In the villages that we operate in, we conduct group meetings with women where we gamify the process of taboo breaking. One of our favorite activities is making them play chinese whisper. At the end of it, like most times with this game, they get their phrase wrong. This was an attempt to show them how period myths propagate and inaccurate stories spread.

In all of this, respecting the the women we address is essential. These are really strong women who have faced unbelievable hardships and come out victorious. It is important that none of our communications are condescending in any way.

Q. Moving towards the vending machines that are to be installed in public restrooms all over as ingenious as these ideas may sound can they be operated easily? As vending machines are a definitely uncharted piece of technology for most of people in our country.

Suhani: We have designed and developed vending machines that are really easy to operate with instructions to use in multiple languages along with images. In the generation of mobile phones, girls and women are easily able to understand how to operate the machines. We also have sessions on how to use the machines in schools and train the staff to use the same in case someone has any troubles.

The underlying issue with widespread adoption of vending machines is not easy of usage, but is its maintenance of these machines in public places against vandalization. Hence, so far, most installations happen in schools, corporate offices only.

Q. What basic changes according to you should be seen in today’s children & tomorrows youth you wish to see? In order to ensure women’s empowerment , safety , health.

Suhani: Firstly, for most of us, urban or rural, high or low income, healthcare is only looked at re-actively not pro-actively. The spend on health & hygiene is abysmally lower than the spend on entertainment in most families. This needs to change.

The unnecessary shyness and stigma around natural biological processes like menstruation, puberty, sexuality and defecation need to end. When we will start talking about these topics openly, innovations in these sectors will happen at a much greater rate.

Q. Since we are on the topic, what do you think we should change in our current education system to build a better country for women?

Suhani: Puberty education for both girls and boys should become a part of the regular curriculum. Currently, children learn such things from various unreliable sources. When you don’t know about something, it becomes threatening and leads to propagation all sorts of myths. It is important for both boys and girls know about consent, puberty and sexuality for their own safety and to make them responsible citizens for the future.

Q. As you and you team are constantly rooting for better menstrual healthcare in our country & constantly working towards it. What are your future plans for the company? &What do you think the healthcare system in India will be 10 years down the road for females as well as males in India?

Suhani: We are working towards a future where women will have access to a variety of services and products for them to choose for their health and hygiene at a price that they can afford. For this, we are working from both sides – supply and demand. We are creating decentralized production units across the country to increase supply in different parts of the country. Decentralized production cuts distribution and transportation costs significantly. This also increases access to products in parts of the country which are left out from traditional distribution channels. On the demand side, we are working in collaboration with several NGOs and local bodies to create awareness about menstrual hygiene on the ground. The good news is, we are also seeing a lot of initiatives being taken by the government in building separate girls toilets in schools and large NGOs working on imparting menstrual education. In 10 years, we believe that menstruation will be a non-issue and girls and women all across the country will not see it as a hindrance to their education, work or dignity.

whatsapp-image-2016-11-11-at-19-44-37

 

Why is menstruation still a taboo?

हाँ मैं एक लड़की हूँ और मुझे पीरियड्स होते हैं!!!!

लोगो के सोचने से की ये ‘गन्दी चीज’ है मुझे फर्क नही पड़ता।
मैं इस सच को बखूबी जानती हूँ और अपने आप पर  आपकी इस गिरी सोच के कारण बिलकुल भी शर्म नही कर सकती।
वो नजरें जिनसे सो कॉल्ड समाज के लोग एक सेनेटरी नैपकिन के पैक को खरीदती लड़की को देखते है । हाँ मैं उन नजरों में नजर  डाल सीधे देखती हूँ।
मुझे नही आती शर्म इसे एक्सेप्ट करने में की हर महीने 5 दिन  इन्ही नैपकिन  के सहारे हम तुम्हारे कंधे से कन्धा मिल कर चलने का हौसला रखते हैं।

मैं मध्य प्रदेश  से हूँ।
राजधानी भोपाल में मेडिकल कॉलेज में डाक्टरी पढ़ रही हूँ और पैदायशी शहडोल की है।।
भोपाल में  सरकारी  मेडिकल कॉलेज के सरकारी हॉस्टल में रहती हूँ।
जहां कई जगहों से  आई हर  तरह  की लड़कियां हैं।
कुछ बेहद शांत ……कुछ  फटाक से आंसर करने वाली।
कई पूजा पाठ और भक्ति भाव वाली। तो कुछ बस हमेशा किताबों के बीच “नैना” बनी हुई।

पूरा एम पी का कल्चर  समेटे है मेरा हॉस्टल। होमियोपैथी  आयुर्वेद और यूनानी मेडिसिन्स की  लड़कियाँ रह रहीं हैं इस हॉस्टल में।
तकरीबन 200 लड़कियों के इस हॉस्टल में मैं 3 सालों से रह रही हूँ।
मैंने डॉक्टर्स को हमेशा बड़ी इज्जत से देखा है, सभी देखते हैअफ्टरॉल।
डॉक्टर यानी ईश्वर का रूप।
जो की साइंटिफिक के साथ स्पिरिचुअल भी है।

periods-07

मैंने  बचपन से अपने आस पास मेंसेस को लेकर एक अजीब सा माहौल देखा है। मेरी स्कुल की कुछ साथियों को उन दिनों खेलने तक नहीं जाने दिया जाता था। वो किचन नहीं जा सकती थी।
मेरी दादी एक बेहद रूढ़िवादी महिला हैं।जिन्होंने मेरी माँ और अपनी बेटियों से इन सारे टैबूज़ को हर तरीके से फॉलो करवाया है।
वैसे इस तरह न जाने कितनी दादी और नानी ने बच्चियों के बचपन को आइसोलेट किया होगा।
मैंने जब ये सोचा था की बड़े होकर डॉक्टर बनूंगी तो  सबसे पहले शायद यही ख्याल आया था की डॉक्टर बनकर ये पता करुँगी क्यों ये हर महीने आ जाते है।।
खैर
मेडिकल कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल में तकरीबन 200 लड़कियों के साथ रह रही हूँ मैं।
मेरी सारी हॉस्टल मेट्स भावी डॉक्टर हैं…
आने वाली पीढ़ी की जन्मदात्री होंगी ये (इनमे से कुछ न जाने कितने प्यारे बच्चों को डिलीवर करवाएँगी।)

ये  सभी साइंस जानती हैं, पढ़ती हैं, इंसानी शरीर को जानती हैं, फिर भी  मेंसेस के टैबू में अभी तक है।
मेडिकल कॉलेज यानि विज्ञान। तकनीक । तथ्य ।
पर सब कुछ सही तरह जानने के बाद भी अभी तक इन्हें अपने पवित्रतम चक्र पर शर्मिंदगी होती है।
अभी तक इनके भगवान ‘उन दिनों’ में छुए जाने से अपवित हो जाते है ।
इन बारे में मैंने कइयों से बात भी की…
आखिर क्यों ये शर्मिंदगी??
क्यों आप इस खूबसूरत प्रक्रिया को नहीं एक्सेप्ट करतीं??
आपका  कैसा ईश्वर है जो आपके  छुए जाने से रोकता है??

ईश्वर तो पिता सामान हैं न तो क्या आप अपने पिता से भी उन दिनों बात नहीं करती?

जवाब सिर्फ एक ही आता है “हमारे घर में मानते हैं “

मेरे घर में भी ऐसा ही माहौल था कभी ।।
पर फिर भी मेरी माँ ने इन तमाम फालतूपने को मानने से मना किया। उन्हें तो पता तक नहीं था की आखिर क्यों ये पीरियड्स होते हैं।

Nepal: Protecting Futures

यह बेहद अजीब बात है।
जिस चीज़ के लिए आप अपने घर में सारी प्रोसेस समझा, इसके पीछे का पूरा लॉजिक बता अपने बड़ों को बदल सकती थी, आपने उनका कहा मान लिया।
उन्होंने कहा उस दौरान ये मत करना वो मत करना और आपने बिना कोई सवाल किए बिना रीज़न जाने मान लिया?
एक डॉक्टर की बात कोई नहीं नेग्लेक्ट करता पर फिर भी आपने भ्रांतियां ही बनाये रखी । किसी को भी नहीं समझाया!

आपके परिवार में ये चलता  आया है क्योंकि उन्हें ये पता नहीं की ये दिन सो कॉल्ड पाप नहीं पवित्र हैं।

अगर ये  चीज़े किसी और जगह होती तो मुझे कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता  मैं कम से कम  उन्हें समझाती तो।पर मेडिकल कॉलेज की लड़कियां??
मैंने मेरे कितने इंजीनियरिंग के दोस्तों  के इस बारे में डाउट दूर किये हैं।  पर जो इसे प्रॉफेशनली पढ़ रहीं है  वो आज भी कंप्रेस्ड थिंकिंग की हैं। वे जो की पूरे शरीर का क्रिया विज्ञान जानती हैं।
कई लोगो से इस बारे में बात की तो उन्होंने क्लीयरली ये एक्सेप्ट किया की ये हर जगह है। चाहे वो उनकी  HOD हों।
चाहे वो उनके यहां की स्वीपर ।
ये मान्यताएं वही पुरानी ही मानेंगे।
ये चाँद तक जाएंगी पर अगर बीच में पीरियड्स आये तो चंद्र देवता क्षमा कह कर रॉकेट से ही कूद जाएँगी।
(वैसे स्पेस में मेंसेस को  सप्रेस किया जाता है)

मेरी एक 12 साल की भतीजी है। वो अब बड़ी हो रही है।
माँ ने उसकी सहेलियों को और  उसे समझाने के लिए मुझे कहा था। कुछ एक दो को थोडा नॉलेज था ।
फिर उनसे पूछने में उन्होंने शर्म के साथ बस बोला छी पीरियड्स।
अरे यार क्यों हम छी करना सिखा रहे हैं इन्हें।
यह जानने के बावजूद की यह सांस लेने और छोड़ने जैसी ही नेचुरल  प्रक्रिया है
क्या ये हमारी जिम्मेदारी नहीं बनती की हम उन पुरानी वर्जनाओं को तोड़े जो की फ़ालतू  हैं।

मेरे हॉस्टल में कई बार विकास को लेकर बहस छिड़ती है ।
कई बार बात ये उठती है की हमको समाज के लिए कुछ करना है।
क्या इस टैबू को तोड़ना समाज को विकसित नही करेगा?
जहाँ आप  अपने स्त्रीत्व पर  खुद पर बजाय शर्म के गर्व कर सकेंगी।

क्या ये मुमकिन है?

Have a happy sustainable period!!

‘Have a happy sustainable period’, Shipra waived to her new customers in valediction while they walked away. This immediately drew my attention as I was browsing through the irresistible raw silk sarees in the adjacent stall. ‘Eco-femme’ read her stall name. ‘Hmm, that’s interesting…’, I thought to myself and walked over.
To my surprise, there were no fancy bundles of silk and cotton or beautiful jhumkas on display; just an unassuming array of cloth pads in different colours, one silicone menstrual cup on the side and an enthusiastic woman at the counter. ‘Hey there, would you be interested in joining us in a positive healthy menstrual revolution?’, she asked. ‘Absolutely, but what are these?’
Eco-femme is a women-led social enterprise based out of Auroville and one of its initiatives is making cloth-pads. Over the last few years, non-biodegradable sanitary waste has been a big concern that’s got the world looking for solutions. So, how do we deal with this?

18vs99a7pdkpmjpg
Pads and tampons are marketed for hygiene and comfort but come with a huge price to pay It takes 500-800 years for a disposable to decompose. Not only do they pose risks to our skin but also to the environment. The plastics and components disposable products present huge waste management challenges around the world.
Cloth-pads is one solution. Traditionally, women all over the world have used a cloth to handle their monthly menstrual flow. Cloth washable pads are safe, hygienic and environmentally friendly alternatives to disposable menstrual products. They are made of cotton flannel and do not contact the skin with any plastics. This eliminates the risk of exposure to potentially hazardous substances. All that you have to do is wash them well, dry in direct sunlight and store them properly. They can be reusable for over 3 years. Eco-femme promotes sustainable menstrual practices for girl children in India by providing them with menstrual hygiene learning and free cloth pads. When you buy a cloth pad, you empower women who’ve made them become self-reliant and support families. Read more about them at https://www.facebook.com/ecofemmeindia.Cloth pads do good to your skin, to the society, and to the environment. Make your switch, now!

14469350_10209221953398806_254972293_n

Vandhana Krishnamurthy

A software engineer and a coffee enthusiast who loves to talk, cook, dance and drive around on all days.