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Let’s analyze!!

Image result for Obsessive compulsive disorder analyze

Not all those who know the rules of a game can play the game. Similarly, knowing about OCD is different and analyzing and understanding its symptoms is different.

Occurrence of an image or a thought repetitively out of a person’s control is obsession but thinking occasionally about getting sickness or safety is not.

Repetitively performing time consuming activities can be a compulsion but practicing bedtime routine or religious activities is not.

Similarly, there are many different activities which are/ are not a symptom of OCD. Let’s brief them so as to understand the disease.

OBSESSIONS:

  • Thoughts, images, or impulses that occur over and over again and feel out of the person’s control.
  • The person does not want to have these ideas.
  • He or she finds them disturbing and unwanted, and usually knows that they don’t make sense.
  • They come with uncomfortable feelings, such as fear, disgust, doubt, or a feeling that things have to be done in a way that is “just right.”
  • They take a lot of time and get in the way of important activities the person values (socializing, working, going to school, etc.).

NOT OBSESSIONS:

  • It is normal to have occasional thoughts about getting sick or about the safety of loved ones.

COMPULSIONS:

  • Repetitive behaviors or thoughts that a person engages in to neutralize, counteract, or make their obsessions go away.
  • People with OCD realize this is only a temporary solution, but without a better way to cope they rely on the compulsion as a temporary escape.
  • Can also include avoiding situations that trigger their obsessions.
  • Time consuming and get in the way of important activities the person values (socializing, working, going to school, etc.).

NOT COMPULSIONS:

  • Not all repetitive behaviours or “rituals” are compulsions. Bedtime routines, religious practices, and learning a new skill involve repeating an activity over and over again, but are a welcome part of daily life.
  • Behaviours depend on the context: Arranging and ordering DVDs for eight hours a day isn’t a compulsion if the person works in a video store.

 

The descriptive analysis done here may help you to know if a person is suffering from OCD.
No cure can be started before diagnosing the disease and hence to diagnose or cure OCD, along with patience and methods to diagnose, a deep study and understanding of the mentioned disorder is required.

 

The सिंगल मदर

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एक अमेरिकन दोस्त से कभी बात हो रही थी। शादी नहीं की पर माँ हैं।” सिंगल मदर” होना अब अपने आप में मजबूत होने की निशानी हो गयी हैं। एक तरह से fiercely independent..मैं भी मानती थी। हालाँकि उस देश में बिन ब्याही माँ कोई बड़ी बात नहीं हैं, पर मजबूती का मामला तो है ही। कई celebrities हैं, जिन्होंने शादी नहीं की पर अपने motherhood को flaunt करती हैं।

पर इन सिंगल मदर्स की एक सच्चाई हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, और इस सच्चाई को ये तब तक एक्सेप्ट नहीं करेंगी आपके सामने, जब तक आप उनके दुःख-दर्द के साथी ना हो। वो सिंगल इसीलिये नहीं हैं, क्यूकी उनका सपना था अकेले ही बच्चे पालना। वो अकेले इस मातृत्व की जिम्मेदारी से जूझ रही हैं, क्यूकी उन्हें मालुम हैं की वो expect नहीं कर सकती कि कोई होगा जो उसके सुख-दुःख में साथी बनें।

ये हमारे समाज की विकृति हैं कि अब हमारी पीढ़ी के रिश्ते इस कदर छिछले हो गए हैं कि आप जिस लड़के/लड़की को डेट कर रहें हो, उससे कमिटमेंट या शादी की उम्मीद नहीं कर सकते। आप उसके साथ पार्टी कर सकते हैं, लेकिन जब शायद आप बीमार हो तो आपकी सेवा करना बोझ समझे। पर एक दूसरा पहलू भी हैं। ऐसा नहीं हैं कि लोग बुरे हो गए हैं। बस दो व्यस्को के बीच बनने वाला romantic रिश्ता अपनी अहमियत, जिम्मेदारी और जवाबदेही खोता जा रहा है।

और ऐसा होने के पीछे एक बहुत बड़ी वजह यह हैं कि हमने शादी नाम के इंस्टीट्यूट को बहुत कमजोर कर दिया हैं। लिव-इन में कोई बुराई नहीं हैं पर इसका असर नकारात्मक ज्यादा हैं। कैसे?

मेरे घर में तमाम समस्याएं हो सकती हैं, पर फिर भी मेरे पास यह ऑप्शन नहीं हैं कि मैं अपने माँ-बाप या भाई-बहन बदल कर दूसरा ले आऊँ, और इसीलिए हम अपने तमाम पारिवारिक समस्याओं को निबटाते हैं और साथ रहने की कोशिश करते हैं। पर यही सहिष्णुता दो व्यस्को के बीच खत्म होती जा रही हैं। विवाह अपने आप में ज्यादा जवाबदेही रखता हैं लिव-इन के बजाय, सामजिक और कानूनी रूप से।

साफ़ सी बात हैं कि किसी भी अविवाहित कपल के बीच भी उतने ही issues होते हैं, जितने विवाहित के बीच, लेकिन चूँकि अविवाहितों के पास liability कम होती हैं तो अक्सर प्रॉब्लम सॉल्व होने के बजाय रिश्ते टूटते हैं। Psychologically साबित बात हैं, अगर किसी रिश्ते पर सामजिक दबाव नहीं होगा तो उस रिश्ते के टूटने के चांस ज्यादा हैं, अब आप idealistic बातें लाख कर ले(प्यार की पवित्रता वाली), पर यह सच्चाई दिखती हैं।
समाज का हस्तक्षेप कम होने का एक दूसरा असर हैं, तलाक की बढ़ती दर।

यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि अब हम तलाक लेने को आजादी से जोड़ने लगे हैं। नारीवाद ने भी इस वहम को फ़ैलाने में काफी सहयोग दिया हैं। मानती हूँ मैं, कि औरतें ज्यादा पिसी हैं रिश्तों में, लेकिन इससे बचने के लिए हमें स्वस्थ रिश्तों को बनाने के तरीके ढूंढने थे। लोगों को उसके बारे में aware करना था। पर रिजल्ट यह हैं कि हमने विवाहेत्तर सम्बन्ध, one-night-stand, और जिम्मेदारी से भागने को ग्लोरिफाइ करना शुरू कर दिया।

किसी ने नहीं कहा कि इस लिव-इन से लेकर तलाक तक में औरतें ही ज्यादा पीस रही हैं और पिसेंगी। इसकी भी एक वजह हैं- सिर्फ social conditioning की बात नहीं हैं, हम औरतें biologically भी ज्यादा भावनात्मक होती हैं। तमाम लड़कियाँ जिन्हें मैं जानती हूँ, जो लड़के बदलने के लिए फेमस हैं, उनका भी अंत में natural inclination होता हैं, एक जमे हुए पारिवारिक जिंदगी की तरफ। मातृत्व भी हम औरतों के अंदर का प्राकृतिक गुण हैं, (हालाँकि इसे भी अब कमजोरी साबित करने का दौड़ चल रहा हैं)। तो अंत में जब किसी औरत की जिंदगी का यह हिस्सा कम्प्लीट नहीं होता, तो अंदर से एक असन्तुष्टि और खालीपन की भावना आती हैं। पुरुषों में भी आती हैं, क्यूकी इंसान को एक पारिवारिक जीवन चाहिए होता हैं। सौ में एक इंसान होगा जो बिना परेशान हुए बिना पार्टनर के जीने की क्षमता रखता हैं, उन्हें ideal बनाना बेवकूफी हैं।

तो फिर स्थिति यह हैं कि मेरी दोस्त की तरह पश्चिम की बहुत सी लड़कियाँ कहीं ना कहीं मजबूर हैं कि बिना जिम्मेदारी वाले रिश्ते में रहते हुए या तो वो बच्चे ही पैदा ना करें, या करें तो अपने बच्चे को अकेले पालने के लिये मानसिक रूप से तैयार रहें, या फिर बच्चा फुटबॉल की तरह कभी माँ कभी पिता के पास घूमता रहेगा। And face the fact कि आप बच्चे को लैपटॉप की तरह छह महीने इधर और छह महीने उधर नहीं रख सकते इसीलिए अक्सर ज्यादातर मामलों में आपको पिता के बजाय माँ ही बच्चे पालती दिखेगी। यह काम जितने जिम्मेदारी का हैं कि, आप भले ही इसे enjoy करें, पर तमाम stress भी आते हैं। एक सच्चाई यह भी हैं कि हममें से लगभग हर औरत अपना बच्चा अपने दम पर खुद पालने के लिए भावनात्मक रूप से capable होती हैं, पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं हैं कि हमें सपोर्ट नहीं चाहिए होता, जैसा की हम (बेवकूफी भरी बराबरी के नाम पर) खुद को ज्यादा मजबूत दिखाने की चक्कर में, जताते हैं।

बहुत जरूरी हैं कि हम शादी का महत्व बनाये रखे समाज में। कुछ अपवाद जरूर होंगे, और तलाक जैसी चीज भी होगी। लेकिन अगर आपको यह वहम हैं कि तलाक के बाद quality of life बेहतर होती हैं या इंसान liberated महसूस करता हैं तो तमाम शोध हैं इस वहम को तोड़ने के लिये। Most of the relationships can be saved, लेकिन बचते नहीं क्यूकी बचाने की इक्षा ही खत्म होती जा रही हैं। यह इक्षा बनी रहेगी, अगर समाज में शादी एक पवित्र बन्धन के रूप में एक्सेप्टेड रहेगा जिसे तोड़ना गलत हैं, और extreme condition में ही सम्भव हैं।

Megha

पाळी मिळी गुपचिळी

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नेहमीच्या शिरस्त्या प्रमाणे पेशंटची रांग ओसरल्यावर सिस्टरांनी एकामागून एक एम.आर. (औषध कंपनीचे प्रतिनिधी) आत सोडायला सुरवात केली. दुपार टळायला आली होती आणि जांभया दाबत, मोबाईलवर, फेसबुकवर, अपडेट्स टाकत आणि त्याचवेळी नेटवर कोणतातरी संदर्भ शोधत मी त्यांचे बोलणे या कानानी ऐकत होतो आणि त्या कानानी सोडून देत होतो. फार गांभीर्याने ऐकावं असं त्या पोपटपंचीत नसतंच काही. पण इतक्यात एका वाक्याने माझे लक्ष वेधले गेले. तो म्हणाला, “आता सणाचे दिवस जवळ आले डॉक्टर, आता खूप बायका पाळी पुढे जाण्यासाठी गोळ्या घ्यायला येतील. तेव्हा लक्षात असू दया आमच्याच कंपनीच्या गोळ्या दया. प्लीज सर!! सणासुदीच्या दिवसांमुळे कंपनीने टार्गेट वाढवून दिले आहे; आणि तुम्ही मनावर घेतल्या शिवाय ते मला गाठता येणार नाही.” एवढं बोलून गोळ्यांचं एक नमुना पाकीट माझ्या टेबलावर ठेवत तो निघाला सुद्धा. माझा अहं कुरवाळून आपला काम सफाईदारपणे करून तो निघून गेला. मी मात्र अचंबित झालो.

एका लहानश्या गावातल्या एका लहानश्या डॉक्टरपर्यंत आवर्जून आर्जवं करणे कंपनीला सहजपणे परवडत होतं, म्हणजे हे पाळी पुढे ढकलण्याचे मार्केट किती प्रचंड लाभदायी आहे बघा! औषध कंपन्या आपला माल खपवण्यासाठी कोणत्याही थराला जातात हे माहीत होतं, पण त्या हे ही टोक गाठतील असं माझ्या ध्यानीमनीही आलं नव्हतं. पाळी या प्रकाराबद्दल भारतीय समाजमनाची नस बरोब्बर हेरून योग्य वेळी त्यांनी आपला माल पुढे केला होता. मला कौतुकच वाटलं त्या कंपनीचं.

खरं तर ही मागणी नेहेमिचीच, पूजा, सत्यनारायण, तीर्थयात्रा, उत्सव, सण वगैरे निमित्ताने केली जाणारी. क्वचित प्रवास, परीक्षा वगैरे कारणेही असतात, पण ती अपवादानेच. किती साधी सोपी रुटीन गोष्ट होती ही. बायकांनी यायचं, पाळी पुढे जायच्या गोळ्या मागायच्या आणि चार जुजबी प्रश्न विचारून आम्ही त्या द्यायच्या. माझी चिठ्ठीही नेहेमीचीच. मुकाटपणे दिली जाणारी. पण मनातल्या मनात मी वैतागतो, चरफडतो. म्हणतो, ‘काय मूर्ख बायका आहेत या! शुद्धाशुद्धतेच्या कुठल्या मध्ययुगीन कल्पना उराशी बाळगून आहेत.’

वेळ असला की माझ्यातला कर्ता सुधारक बोलता होतो. एरवी मागताक्षणी चिठ्ठी लिहून देणारा मी, समोरच्या स्त्रीला प्रश्न विचारतो, ‘काय शिक्षण झाले आहे तुमचे?’

‘क्ष’

क्ष ची  किंमत अशिक्षित पासून डॉक्टरेट पर्यंत काहीही असू शकते.

‘आलीच जर पाळी,  तर तुम्ही समारंभात सहभागी होऊ नये हे तुम्हाला पटतंय का?’

‘…आता घरचंच कार्य म्हटल्यावर…’,‘…आमच्या घरी नाही चालत…’,‘…आमचं काही नाही पण सासुबाईंचं फार असते…’, ‘आमच्या घरी सगळंच पाळलं जाते…’; असं काहीतरी उत्तर येते. क्ष ची किंमत काहीही असो.

‘नाही, मला हे पटत नाही, हे मला मनाविरुद्ध करावे लागतंय!’, असं उत्तर वीस वर्षात एकदाही ऐकलं नाही.

पाळी आलेल्या स्त्रीला अस्वच्छ अपवित्र समजणे याची पाळेमुळे पार खोलवर रुजलेली आहेत. स्त्रियांच्या बाबतीत घडणाऱ्या, निसर्गनेमाने घडणाऱ्या, एका अत्यंत शारीर कार्याला धर्मिक, वैयक्तिक, कौटुंबिक आणि आर्थिक धुमारे फुटले आहेत. कुठून येतात या कल्पना? अगदी लहानपणापासून मनात कोरल्या जातात त्या. आई, मोठ्या बहिणी, शेजारी पाजारी सगळीकडे असतात त्या. आपण फक्त मनानं स्पंज सारख्या त्या टिपून घ्यायच्या.

शाळेत कधी कधी जायचा प्रसंग येतो. मुला-मुलींसमोर ‘वयात येताना’ या विषयावर बोलायला. सगळ्या मुली पाळीला सर्रास ‘प्रॉब्लेम’ असा शब्द वापरतात. प्रॉब्लेम आला/ गेला/ येणार वगैरे. मी गमतीने म्हणतो, ‘अहो पाळी ठरल्यावेळी न येणं, हा खरा प्रॉब्लेम! पाळी येणं हा प्रॉब्लेम कसा?’ मुलींना मी सांगतो, प्रॉब्लेम शब्द वापरू नका. पाळी आली असं म्हणा. मराठीत बोलणे फारच गावठी वाटत असेल तर एम.सी. म्हणा, मेंन्सेस म्हणा; आणखी इंग्रजी फाडायचं असेल तर चम म्हणा; पण प्रॉब्लेम म्हणू नका. प्रॉब्लेम म्हटल्यावर एका अत्यावश्यक नैसर्गिक शरीरक्रीयेविषयी मनात नकारात्मक भावना नाही का निर्माण होतं? पण हा प्रश्न गैरलागूच म्हणायचा. प्रॉब्लेममुळे नकारात्मक भावना नसून; मुळातल्या नकारात्मक भावनेपोटी हा शब्द वापरला जातो. काहीही असो पण हा शब्द वापरू नये असं मला वाटतं. यामुळे मुळातली नकारात्मकता आणखी गडद होते. त्यावर लोकमान्यतेच्या पसंतीची मोहोर उमटते.

ह्या मुळातल्या गैरसमजाचे पडसाद इतरही सर्वमान्य शब्दांमध्ये दिसतात. काही कारणाने पाळीचा त्रास झाला तर पिशवी धुतात/साफ करतात. याचा वैद्यकीय अर्थ पिशवीच्या आतलं अस्तर खरवडून काढून टाकतात. हेतू हा की रक्तस्त्राव थांबावा, तपासणीसाठी अस्तराचा तुकडा मिळावा आणि नव्याने तयार होणारे अस्तर एकसाथ, एकसमान तयार व्हावे. पण हे सारे व्यक्त करणारा शब्दच नाहीये. क्युरेटींग हा इंग्रजी शब्द रूढ आहे पण त्यामागचा हा भाव कुणालाच कळत नाही. सर्रास पिशवी धुणे /साफ करणे वगैरे चालू असतं.

एकदा पाळी हा प्रॉब्लेम ठरला की पुढे सगळे ओघानेच येतं. पाळी म्हणजे शरीरात महीनाभर साठलेली घाण बाहेर टाकण्याची एक क्रिया, हे ही मग पटकन पटते. समाजानी पाळी आणि अपावित्र्याचा संबंध जोडला आहे, यात काही आश्चर्य नाही. मलमूत्राच्या वाटेशेजारीच पाळीची वाट आहे. मलमूत्रविसर्जन ही तर निश्चितच उत्सर्जक क्रिया आहे. चक्क शरीरातील घाण वेळोवेळी बाहेर टाकणारी क्रिया. अज्ञानापोटी समाजाने पाळीलाही तेच लेबल लावलं. खरंतर शरीरातील पेशी सातत्याने मरत असतात आणि नव्याने तयार होत असतात. आपली त्वचा झडते, पुन्हा येते, केस झडतात पुन्हा येतात, लाल पेशींचे आयुष्य १२० दिवसांचे असतं; तसंच काहीसं हे आहे. गर्भपिशवीचे अस्तर ठराविक काळ गर्भधारणेला आधार ठरू शकते. मग ते निरुपयोगी ठरतं. बाहेर टाकलं जातं, पाळी येते. पुन्हा नव्यानं अस्तर तयार होतं. (मासिक चक्रं). मुद्दा एव्हढाच की मासिक पाळी ही उत्सर्जक क्रिया नाही. पण कित्येक स्त्रियांना आणि पुरुषांना असं वाटतं की महिनाभराची सगळी घाण गर्भपिशवीत साठते आणि ती महिनाअखेरीस बाहेर टाकली जाते.

अशा बायकांसाठी वेगळी झोपडी, वेगळी जागा, वेगळं अन्न चार दिवस बाहेर बसणं, पूजाअर्चा, देवळात जाणं बंद, पाचव्या दिवशी  अंघोळ करणं, पाळीच्या वेळी धार्मिक कार्यात सहभागी न होणं या सगळ्या रूढी आणि परंपरा याचाच परीपाक आहेत. जात कोणतीही असो, धर्म कोणताही असो याबाबतीत सर्व धर्म भलतेच समान आहेत.

पाळीच्या या चार दिवस विश्रांतीचं समर्थन करणारीही जनता आहे. ‘तेवढंच त्या बाईला जरा सूख, जराशी विश्रांती…’ वगैरे. म्हणजे एरवी श्वास घ्यायलाही फुरसत नाही एवढा कामाचा रामरगाडा! अपावित्र्यातून निपजलेली ही विश्रांती; आदरभावातून, ऋणभावनेने मिळालेली नाही ही. घराला विटाळ होऊ नये म्हणून ही बाकी घरानी केलेली तडजोड आहे. त्या बाईप्रती आदर, तिच्या कामाप्रती कृतज्ञता, तिच्या घरातील सहभागाचा सन्मान कुठे आहे इथे? नकोच असली विश्रांती. हे बक्षीस नाही, बक्षिसी आहे ही! उपकार केल्यासारखी दिलेली ही बक्षिसी बाईनी नाकारायला हवी.

का होतं, कसं होत वगैरे काहीही जीवशास्त्र माहीत नसताना पाळी हा प्रकार भलताच गोंधळात टाकणारा होता, आदिमानवाला आणि त्याच्या टोळीतल्या स्त्रियांना. महिन्याच्या महिन्याला रक्तस्त्राव होतो, चांद्रमासाप्रमाणेच की हे, निश्चितच दैवी अतिमानवी योजना ही. जखम-बिखम काही नाही, वयात आल्यावर स्त्राव होतो, म्हातारपणी थांबतो, गरोदरपणी थांबतो…! किती प्रश्न, किती गूढ, किती कोडी. पण म्हणून आजही आपण आदिमानवाचीच री ओढायची म्हणजे जरा जास्तच होतंय!

पाळी येण्यामागचं विज्ञान समजलं, पाळीवर परिणाम करणाऱ्या गोळ्याही निघाल्या. पण आपण याचा उपयोग सजगपणे करणार नाही. आपण या गोळ्या आपल्या शरीराबद्दलच्या, पाळीच्या अपावित्र्याच्या पारंपारिक कल्पना दृढ करण्यासाठी वापरणार! वा रे आपली प्रगती! वा रे आपली वैज्ञानिक दृष्टी!

पण समाजानं जरी अपावित्र्य चिकटंवलं असलं तरी ते तसंच चालू ठेवलं पाहिजे असं थोडंच आहे? निसर्गधर्मानुसार आलेली पाळी चालत नाही आणि औषध घेऊन पुढे गेलेली चालते, हे ठरवलं कोणी? ही बंधनं विचारपूर्वक नाकारायला नकोत? ‘देहीचा विटाळ देहीच जन्मला; सोवळा तो झाला कवण धर्म? विटाळा वाचून उत्पतीचे स्थान, कोण देह निर्माण, नाही जगी’ असं संत सोयराबाईनी विचारलं आहे.

हे असलं काही बोललं की प्रतिपक्षाची दोन उत्तरं असतात. एक, पुरुषप्रधानतेमुळे बायकांचे मेंदू पुरुषांच्याच ताब्यात असतात; आणि दुसरं समजा घेतल्या गोळ्या आणि ढकलली पाळी पुढे तर बिघडलं कुठं?

पहिल्या प्रश्नाचं उत्तर असं की ही समाजरचना अमान्य करण्याचे पहिलं पाऊल म्हणून या गोष्टीकडे बघा. गोष्ट साधीशीच आहे. ठामपणे सांगीतल तर पटणारी आहे. स्वतःला पटली असेल तर ठामपणे सांगता येतेच पण मुळात स्वतःचीच भूमिका गुळमुळीत असेल तर प्रश्नच मिटला.

‘घेतल्या गोळ्या तर बिघडतं काय?’ या प्रश्नाचं उत्तर असं की, म्हातारी मेल्याचं दुःख नाही पण काळ सोकावतो! आई करते म्हणून थोरली  करते आणि ताई करते म्हणून धाकटी! डोकं चालवायचंच नाही असं नकळत आणि आपोआप होत जातं

हे सारं कुठेतरी थांबायला हवं. स्वताःच्या आणि परस्परांच्या शरीराकडे निरामय दृष्टीने स्त्री-पुरुषांना पहाता यायला हवं. कुणीतरी कुठूनतरी सुरुवात करायला हवी.

डॉ. शंतनू अभ्यंकर

साभार :http://shantanuabhyankar.blogspot.in

Are you too experiencing a mental burn out?

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Are you experiencing –

Stress? Insomnia? Anxiety? Irritation? Anger? Depression?

Forgetfulness? Low motivation? Poor concentration? Attention deficiency?

Low performance? Negativity in your behaviour?

Poor appetite? Constant feelings of tiredness and fatigue?

Wondering why?

Have you noticed how extra heating burns the toast?

Similarly, extra mental exertion burns out the mind.

The Result – A MENTAL BURNOUT.

Burnout is the loss of motivation, a growing sense of emotional depletion, cynicism and a state of vital exhaustion.

So how can you fuel your mind, and keep it running to the best of its capacity? Here are a few tips we have for you:

  1. Check your stress levels – Are you feeling anxious, worried, frustrated, helpless? You can get yourself tested.
  2. Self-Introspection – Ask yourself, “Why am I burning out?”
  3. Socialize outside your professional group.
  4. Rediscover nature and spend some more time in natural surroundings like gardens, waterfalls, beaches and the like.
  5. Help others be happy and healthy. This will help give you feelings of satisfaction, positivity, and contentment. Helping someone cross a road, helping a child with some homework, or helping your mother or any other family member with household chores are examples of things you can do to help others.
  6. Limit uses of devices and gadgets. Keeping time limits is very helpful, like not taking work related calls after 10:00 PM.
  7. Take a vacation. Once in 5 – 6 months is helpful. The goal is not to go to the best destination, the goal is to have quiet time where you cut off from daily hassles of life, irrespective of the destination.
  8. Rediscover your passions and hobbies and learn to relax. Having a hobby like painting or playing a musical instrument is a meditative activity.
  9. Redistribute and revaluate your roles at work and home. Negotiating these with your family members is important so that too much work is not assigned by default to just one person.
  10. Exercise or do yoga – Do some sort of physical activity and find an activity that nourishes your soul.

Here are a few precautions you need to take on your journey of healing from a burnout:

  1. While you’re recovering from your burnout, avoid taking on any new commitments or responsibilities. This can be done for a limited period of time – just till you are sufficiently out of the burnout phase and are feeling better mentally and emotionally.
  2. Take help of support groups (but only if they are therapeutic groups) or friends. Don’t be afraid to open up. Talking and pouring out certain troubles can have a healing effect, and you may gain newer ideas and perspectives from others in the therapeutic group.
  3. Learn to live a balanced life and don’t overdo either work or play. Most important point!

These few simple steps could help you turn your life around and bring back the creativity, inspiration and motivation that had gone missing from your mind.

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This blog was initially published at http://www.acciohealth.com/learn/are-you-burning-yourself-out/

5 things to know about Mental Health

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Mental health is a state of well-being in which every individual realizes his or her own potential, can cope with the normal stresses of life, can work productively and fruitfully, and is able to make a contribution to her or his community.

Mental health shows the level of psychological and emotional well-being. Our behaviour is guided by our mental health at every stage of life. Healthy, sound and good mental health is a boon as it provides the ability to enjoy life. However, mental illnesses are very common these days. According to the WHO, nearly half of the world’s population are affected by mental illness with an impact on their self-esteem, relationships and ability to function in everyday life.  

Physical and mental health complement each other: Physical and mental health are closely associated. Recent studies have proved that a number of physical  illnesses actually root from a mental health problem. These are known as Psychosomatic problems.

The body and the mind are intricately connected: In other words, what you do to your body affects your mind. Physical conditions can directly cause symptoms of mental illness and vice versa.

Balanced Personality: From childhood to old age, mental health plays an important role in one’s life. Our personality, attitude, thought process and emotions are formed on the basis of our mental health condition. Therefore, it is important to take care of our mental health for a balanced and happy life.

Traditional mental health fitness outlook: From old times, yoga and meditation were included in our culture as a part of our lifestyle. It shows our understanding of the importance of mental health. Even today, yoga is considered as the best non-medicated treatment which aids in maintaining one’s mental health.

Modern life style: There is a general view that mental health problems are a result of modern lifestyle. But, mental health problems have always existed. The nature and severeness of problems however, may change overtime. In today’s fast paced life, the problem has become more predominant. Thus, more care and attention needs to be directed towards this topic.

 -Dr. Rekha Rani, Chief of Psychology, AccioHealth

This blog was published on http://www.acciohealth.com/learn/what-you-should-know-about-mental-health/

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